2 नवंबर 2026,

सोमवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

विकलांगता को मात दे बनीं दुनिया की सबसे तेज धाविका

अश्वेत परिवार में जन्म लेने के कारण बचपन में ही इन्हें कई तरह के संघर्षों का सामना करना पड़ा।
2 min read
Follow Patrika on Google News
Google source verification

जयपुर

•

image

Archana Kumawat

•

Updated: 15 Jun 2020, 5:50 PM IST

विकलांगता को मात दे बनीं दुनिया की सबसे तेज धाविका

विकलांगता को मात दे बनीं दुनिया की सबसे तेज धाविका

इनका जन्म 1940 में अमरीका के टेनेसी प्रांत में एक गरीब परिवार में हुआ था। पिता ने दो विवाह किए थे। इस तरह 22 भाई-बहिनों में इनका नबंर 20वां था। इनके जन्म के कुछ समय बाद ही परिवार दूसरे शहर में चला गया। यहीं ये पली-बढ़ी और शिक्षा प्राप्त की। अश्वेत परिवार में जन्म लेने के कारण बचपन में ही इन्हें कई तरह के संघर्षों का सामना करना पड़ा। मां घर-घर जाकर काम करती तो पिता कुली का काम किया करते थे। एक बार बचपन में इनके पैरों में बहुत तेज दर्द हुआ। जब इन्हें इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया तो पता चला कि इन्हें पोलियो हो गया है। अब ये केलिपर्स के सहारे चलती थी। डॉक्टर ने भी जवाब दे दिया था कि वे कभी चल नहीं पाएगी। जब ये अपने भाई-बहिनों को खेलते देखती तो बहुत दुखी हो जाती थी। एक दिन वह रोने लगी। मां के पूछने पर उसने बताया कि उसका मन भी खेलने का करता है लेकिन अब वह कभी खेल नहीं पाएगी। तब मां ने कहा कि उसे अपनी बेटी पर गर्व है और एक दिन वह समय भी आएगा, जब वह अपने पैरों से दौड़ेगी। मां हमेशा बेटी का आत्मविश्वास बढ़ाया करती थी।
चढ़ती गईं सफलता की सीढिय़ां
ट्रेनिंग के दौरान एक भी दिन ऐसा नहीं था, जब इन्होंने अपनी प्रैक्टिस मिस की हो। अपनी मेहनत और कोच के मार्गदर्शन में जल्द ही इन्होंने यूथ ओलंपिक टीम में अपनी जगह बना ली थी। 1956 में ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में हुए ओलंपिक्स में उन्होंने 400 मीटर रिले रेस में ब्रोंज मेडल जीता। 1960 में रूस में हुए ओलंपिक में वे पहली अमरीकन महिला बनी, जिन्होंने एक ही ओलंपिक में तीन गोल्ड मेडल जीते। उन्होंने 100 मीटर, 200 मीटर और 400 मीटर रिले रेस जीती और दुनिया की सबसे तेज दौडऩे वाली महिला बनीं। यह महिला कोई और नहीं, बल्कि 60 के दशक की सबसे तेज धाविका विल्मा रुडोल्फ है। अपनी इन उपलब्धियों को श्रेय विल्मा ने हमेशा अपनी मां को दिया, इनका कहना था कि यदि मां ने त्याग नहीं किया होता तो आज वे इस मुकाम तक नहीं पहुंच पाती। 1994 में विल्मा ने दुनिया को अलविदा कहा।