
पोकरण फील्ड फायरिंग रेंज में आए दिन हो रहे हादसे।
पोकरण. वर्ष 1974 व 1998 में हुए परमाणु परीक्षणों के बाद पूरे विश्व में पहचान बनाने वाली पोकरण फील्ड फायरिंग रेंज में आमजन की लापरवाही भारी पड़ रही है और हादसों से सांसों की डोर टूट रही है। आए दिन हो रहे हादसों के बावजूद लोग जागरुक होने की बजाय अपनी जान की बाजी लगा रहे है। गौरतलब है कि पोकरण कस्बे से जैसलमेर जाने वाले मार्ग के उत्तर दिशा में पोकरण फील्ड फायरिंग रेंज स्थित है। सैंकड़ों किमी लम्बे-चौड़े भू-भाग में फैले रेंज क्षेत्र में आम व्यक्ति का आवागमन पूरी तरह से प्रतिबंधित है। यदि कोई व्यक्ति पकड़ा जाता है तो उसके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई का भी प्रावधान है। आसपास आबादी गांवों के लोग कई बार भूलवश, कई बार पशुओं की तलाश करने तो कई बार स्क्रैप के लालच में रेंज में जाते है और जिंदा बम की चपेट में आने से उनकी मौत हो जाती है। बीते कुछ वर्षों में यहां कई हादसे हो चुके है। बावजूद इसके न तो लोग जागरुक होकर सचेत हो रहे है, न ही रेंज में प्रवेश करना बंद कर रहे है।
मवेशी चराने जाते है पशुपालक
रेंज के एक तरफ पोकरण-जैसलमेर रोड तो दूसरी तरफ रामदेवरा-नाचना रोड लगती है। साथ ही रेंज के आसपास कई गांव आबाद है। ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालन मुख्य व्यवसाय है और रेंज में हरी घास होने के कारण पशु रेंज में प्रवेश कर जाते है। कई बार रास्ता भटक जाने और देर तक पशु के घर नहीं पहुंचने पर पशुपालक उनकी तलाश में पीछे जाते है। इसी प्रकार कुछ पशुपालक मवेशी लेकर रेंज में चराने के लिए जाते है। इस दौरान रेंज में बिखरे स्क्रैप में जिंदा बम की चपेट में आने से उनकी मौत हो जाती है।
लालच में भी गंवाते है जान
रेंज के आसपास आबाद कुछ गांवों के लोग छोटे से लालच में भी अपनी जान गंवा देते है। कई बार हादसा इस कारण होता है कि लोग स्क्रैप चुराने के बहाने जिंदा बम ले आते है। जिसे खोलने के प्रयास में बम विस्फोट हो जाता है और व्यक्ति की मौत हो जाती है। इसी प्रकार रेंज के बीच में कई पुराने रास्ते है, जो वर्षों पूर्व लोगों के आवागमन में काम आते थे। रेंज की स्थापना के बाद इन रास्तों पर आवागमन प्रतिबंधित कर दिया गया, लेकिन आज भी लोग इन्हीं मार्गों से चोरी-छिपे आवागमन करते है। आवागमन के दौरान वाहनों के जिंदा बम की चपेट में आ जाने और उनके फट जाने से भी हादसे होते है।
यूं रह जाते है निष्क्रिय बम
पोकरण फील्ड फायरिंग रेंज भारत के बड़े रेंज क्षेत्रों में से एक है। इसे चार भागों ए, बी, सी व डी में बांटा गया है। खेतोलाई, धोलिया व लाठी के पास स्थित रेंज क्षेत्र में थल सेना एवं चांधन क्षेत्र के पास स्थित रेंज क्षेत्र में वायुसेना के युद्धाभ्यास होते है। विशेष रूप से सर्दियों के मौसम में देश के कई हिस्सों से बटालियनें यहां आती है और युद्धाभ्यास किया जाता है। नई तोप, बंदूक, गोलो के साथ अन्य हथियारों का परीक्षण भी यहीं पर होता है। कई बार तोप व बंदूक से निकली गोलियां रेत में धंस जाती है और जिंदा ही रह जाती है। चारों तरफ रेत का समंदर होने के कारण बम व गोलियां गिरने के बाद आंधी से उन पर रेत की चादर चढ़ जाती है। जिसके कारण स्क्रैप ठेकेदार को नजर नहीं आते और जिंदा बम भी स्क्रैप में जाने से बच जाते है।
कई बार हो चुके है हादसे
रेंज क्षेत्र के पास चाचा, खेतोलाई, धोलिया, लाठी, चांधन, भादरिया, नाचना, सत्याया, अजासर, चांदसर, बरड़ाना, लोहारकी, मावा, रामदेवरा, गोमट आदि गांव लगते है। इन गांवों के पशुपालकों के मवेशी रेंज में चरने के लिए जाते है। जिनके बम की चपेट में आने से हादसे हो जाते है। इसी प्रकार चाचा व खेतोलाई गांव से दो अलग-अलग रास्ते निकलते है। खेतोलाई से सीधे लोहारकी और चाचा से रामदेवरा-राठौड़ा फांटा तक दोनों सीधे रास्ते और इनकी दूरी भी कम है। लोग कम दूरी के लालच में पोकरण होकर जाने की बजाय इन रास्तों का उपयोग करते है। इस दौरान स्क्रैप के लालच में लोग जिंदा बम उठा लेते है और हादसे का शिकार हो जाते है। यही नहीं इन रास्तों पर दबे जिंदा बम की चपेट में आने से भी हादसे होते है।
Published on:
26 Jun 2023 07:38 pm
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