
कौशांबी की शालिनी कुशवाहा को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार (Image: Facebook/shalini.kushwaha.12720)
National Teacher Award 2026: शिक्षक दिवस पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार पाने वाले उत्तर प्रदेश के तीन शिक्षकों की कहानियां इस बात की मिसाल हैं कि सरकारी स्कूलों में बदलाव के लिए हमेशा बड़े बजट की जरूरत नहीं होती। कई बार शिक्षक की पहल, संवेदनशीलता और बच्चों की जरूरत को समझने की क्षमता ही बदलाव की शुरुआत बन जाती है। कौशांबी की शालिनी कुशवाहा, बलिया के डॉ. इफ्तखार खान और गाजियाबाद की डॉ. रेनू त्रिपाठी ने अपने-अपने तरीके से शिक्षा को सिर्फ पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रखा। इनके प्रयासों में बुनियादी सुविधाओं से लेकर कला, विज्ञान और अतिरिक्त शैक्षिक अवसरों तक का विस्तार दिखाई देता है।
कौशांबी के कंपोजिट विद्यालय रसूलाबाद में तैनात शालिनी कुशवाहा की कहानी स्कूल की बुनियादी जरूरतों से शुरू होती है। ट्रेनिंग के दौरान उन्होंने 122 बच्चों को नंगे पैर स्कूल आते देखा। बच्चों की इस स्थिति ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि उन्होंने अपनी जेब से उनके लिए जूते-मोजे खरीदे।
उनकी पहल सिर्फ जूते-मोजे तक नहीं रुकी। पहली तैनाती के दौरान जब उन्होंने बच्चों को दरी पर बैठकर पढ़ते देखा तो उनके लिए कुर्सियों की व्यवस्था कराई। बाद में स्कूल बदलने पर उन्होंने कंप्यूटर, प्रोजेक्टर और आधुनिक टेबल-कुर्सियों जैसी सुविधाएं जुटाकर स्कूल के वातावरण को बेहतर बनाने की कोशिश की। 2022 में राज्य अध्यापक पुरस्कार मिलने पर मिली 25 हजार रुपये की राशि में उन्होंने अपनी सैलरी से 22 हजार रुपये और जोड़े और विद्यार्थियों के लिए यूनिफॉर्म उपलब्ध कराई।
मूल रूप से प्रयागराज के नैनी इलाके की रहने वाली शालिनी कुशवाहा साल 2015 से कोइलहा प्राथमिक विद्यालय में सहायक अध्यापक के पद पर काम कर रही हैं। वह बच्चों को पारंपरिक और उबाऊ तरीकों से पढ़ाने के बजाय खेल-खेल में और विभिन्न गतिविधियों के जरिए शिक्षा देती हैं। उनके इस अनूठे तरीके का ही कमाल है कि स्कूल में बच्चों के एडमिशन में भारी इजाफा हुआ है। साथ ही कक्षा में बच्चों की सीखने की क्षमता और उनकी रोजाना की उपस्थिति भी पहले से काफी बेहतर हो गई है।
बलिया के किकोड़ा गांव के किसान परिवार से आने वाले डॉ. इफ्तखार खान पिछले करीब 27 वर्षों से कला शिक्षक के रूप में काम कर रहे हैं। ललित कला में पीएचडी करने वाले डॉ. खान ने कला शिक्षा को स्कूल की नियमित पढ़ाई तक सीमित नहीं रखा। उनके मार्गदर्शन में विद्यार्थियों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की कला प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया और 50 से अधिक पदक हासिल किए।
उनके काम का सबसे उल्लेखनीय पहलू स्कूल के समय से बाहर बच्चों को शिक्षा देना है। वह पिछले 26 वर्षों से प्रत्येक रविवार को अपने आवास पर ग्रामीण बच्चों को निःशुल्क कला शिक्षा देते आ रहे हैं। इसके लिए दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्रों से बच्चे पहुंचते हैं। डॉ. खान को राज्यपाल और उपराष्ट्रपति से सम्मानित किया जा चुका है। उन्हें नेपाल में 2024 का नोबल टैलेंट इंटरनेशनल अवार्ड भी मिला है।
राजकीय बालिका इंटर कॉलेज, विजय नगर की विज्ञान शिक्षिका डॉ. रेनू त्रिपाठी भी उन शिक्षकों में शामिल हैं जिन्होंने लंबे समय तक सरकारी शिक्षा व्यवस्था में काम करते हुए विज्ञान विषय को छात्राओं के लिए अधिक रुचिकर बनाने पर जोर दिया। करीब 20 वर्षों से शिक्षण कार्य कर रहीं डॉ. त्रिपाठी को 2022 में राज्य शिक्षक पुरस्कार भी मिल चुका है। उन्होंने विज्ञान विषय में छात्राओं की रुचि बढ़ाने और उन्हें बेहतर शैक्षिक अवसर उपलब्ध कराने में योगदान दिया है। उनकी शैक्षिक पृष्ठभूमि भी मजबूत है। उन्होंने एमए, एमएससी, एमएड और पीएचडी सहित कई उपाधियां हासिल की हैं।
Updated on:
07 Sept 2026 05:46 pm
Published on:
05 Sept 2026 02:03 pm
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