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जोशीमठ, मसूरी जैसा हाल न हो जाए दार्जिलिंग का – अंधाधुंध निर्माण से पारिस्थिकीय तंत्र पर मंडराता खतरा

इस साल हिमाचल और उत्तराखंड के कई शहरों में भूस्खलन और धंसान ने राष्ट्रीय सुर्खियां बटोरी हैं। अंधाधुंध बेतरतीब निर्माण को इन राज्यों के कई शहरों की सूरत और भाग्य बदलने के लिए जिम्मेदार बताया जा रहा है। यही हाल पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग में कई क्षेत्रों में है। भूस्खलन के मामले में संवेदनशील दार्जिलिंग की पहाडिय़ां भी आज नहीं तो कल अपनी छाती पर हो रहे अवैध निर्माण का बदला ले सकती हैं।
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कोलकाता

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Paritosh Dubey

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Updated: 1 Oct 2023, 9:10 PM IST

जोशीमठ, मसूरी जैसा हाल न हो जाए दार्जिलिंग का - अंधाधुंध निर्माण से पारिस्थिकीय तंत्र पर मंडराता खतरा

जोशीमठ, मसूरी जैसा हाल न हो जाए दार्जिलिंग का - अंधाधुंध निर्माण से पारिस्थिकीय तंत्र पर मंडराता खतरा

कोलकाता. दार्जिलिंग की शांत और सर्द वादियों में सिर्फ चाय के बागान और हेरिटेज घोषित की गई ट्वाय ट्रेन ही नहीं है। यहां पहाडिय़ों की छाती छीलकर उगा कांक्रीट का जंगल भी तैयार हो गया है। परंपरागत लकड़ी के मकानों की संख्या में तेजी से कमी आई है। वन काटे गए हैं। निर्माण के नियमों की अनदेखी हुई है। इन सबके बीच दार्जिलिंग में सन 1968 में भारी बारिश के बाद हुए भूस्खलनों की घटनाएं याद कर लोग कांप उठते हैं। उस वर्ष दार्जिलिंग जिले में 52 घंटों के भीतर एक हजार मिलीमीटर की भारी बारिश हुई थी। जिसके परिणामस्वरूप 60 किमी लंबे राजमार्ग पर 91 जगहों पर भूस्खलन हुआ था। मृतकों की संख्या एक हजार से ज्यादा बताई गई थी। हिमालयीन भूस्खलन का अध्ययन कर रहे विशेषज्ञ मानते हैं कि पांच दशक पहले हुई घटना चेतावनी दी, जिसे अब तक नजरअंदाज किया जा रहा है। पहाड़ों में कांक्र ीट के जंगल तैयार हो गए हैं। भारी बारिश हुई तो भूस्खलन से होने वाले नुकसान की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
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राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 10 बना संवेदनशील
दार्जिलिंग और पूरे भारत को सिक् िकम से जोडऩे में महत्वपूर्ण निभाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 10 पर भूूस्खलन नियमित हो गया है। इस क्षेत्र को भूस्खलन के लिए संवदेनशील माना गया है। एनएच- 10 रणनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह चीन की सीमा पर स्थित राज्य सिक्किम को जोडऩे वाली प्रमुख सडक़ है। दार्जिलिंग के सांसद राजू बिस्ता के मुताबिक केंद्रीय सडक़ परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने राजमार्ग के पुनर्निर्माण के लिए लगभग एक हजार करोड़ रुपये आवंटित किए हैं।
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नियमों को अंगूठा दिखाकर हो रहे निर्माण
आवास निर्माण मानदंडों का दार्जिलिंग व अ ासपास के पहाड़ी शहरों में खुले आम उल्लंंघन के आरोप सामने आते रहे हैं। पहाड़ों में निर्माण कार्य को लेकर विशेषज्ञों का मानना है कि 30 डिग्री से अधिक ढलान पर कोई निर्माण नहीं होना चाहिए, लेकिन पहाड़ के सभी शहरों में कहीं कहीं 65 डिग्री ढलान पर भी बहुमंजिला इमारतें तन गई हैं।
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मास्टर प्लान का भी अभाव
ब्रिटिश सरकार ने 1930 के दशक में दार्जिलिंग शहर के पांच वर्ग किमी के क्षेत्र में 20 से तीस हजार आबादी के लिए मास्टर प्लान बनाया था अब शहर तीन गुने से ज्यादा हो गया है। आबादी कई गुना बढ़ गई है और पर्यटकों की संख्या बढ़ रही है लेकिन शहर के बुनियादी ढांचे में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है। यहां तक की मास्टर प्लान भी कागजों पर ही है।
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कैसे कम हो सकती है भूस्खलन की विभीषिका
स्थानीय विशेषज्ञ कहते हैं कि तिनधरिया जैसे क्षेत्रों में कोयला खदानों को तुरंत बंद किया जाना चाहिए। वनों का क्षेत्रफल बढ़ाने के हर संभव प्रयास होने चाहिए। वन किसी भी प्राकृतिक आपदा में पहली रक्षा पंक्ति हैं। इसके साथ ही ढलानों पर मवेशी चराने पर प्रतिबंध लगाना होगा। वहीं तकनीक का प्रयोग कर रॉक बोल्टिंग (बोल्ट से चट्टानों को जोड़े रखना) और कम समय में पहाड़ों में हुई तेज बारिश के समय नीचे बहकर आते पानी को नियंत्रित करने के लिए रिप्रैप ड्रेन (सीढ़ी नुमा नाले ) बनाने का सुझाव देते हैं। इसके साथ ही पहाड़ी इलाकों में ऐसी फसलों को लगाया जाना चाहिए जिनकी जड़े गहरी होती हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि दार्जिलिंग का जनसंख्या घनत्व अधिक है, यहां वर्षा अधिक होती है, नदियों और नालों की संख्या अधिक है जिससे जोखिम बढ़ता है। एकमात्र राहत की बात यह है कि दार्जिलिंग भूकंप की दृष्टि से जोन- 4 में आता है, जबकि उत्तराखंड जोन- 5 में है।
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वर्ष 2026 तक शुरू हो जाएगी चेतावनी प्रणाली
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) वर्ष 2026 में उत्तर बंगाल के पहाड़ी इलाकों समेत देश भर में संभावित भूस्खलन की प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली शुरू करने की योजना पर काम कर रहा है। एजेंसी, ने पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग और कलिम्पोंग, तमिलनाडु के नीलगिरी में प्रयोग के आधार पर ऐसी चेतावनियां प्रसारित करना शुरू कर दिया है। जीएसआइ पहले ही भूस्खलन की संभावना वाले पहाड़ी क्षेत्रों के लिए राष्ट्रव्यापी भूस्खलन संवेदनशीलता मानचित्र तैयार कर चुकी है। भूस्खलन की दृष्टि से संवेदनशील समझा गया क्षेत्रफल लगभग 4.3 लाख वर्ग किलोमीटर में में फैला हुआ है, जो देश के भूभाग का 12.6 प्रतिशत है और 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में फैला हुआ है।
जीएसआइ के मुताबिक उत्तर-पश्चिमी हिमालय का पर्वतीय क्षेत्र (जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड), उत्तर-पूर्व का उप-हिमालयी भूभाग (सिक्किम, पश्चिम बंगाल-दार्जिलिंग, असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड) , त्रिपुरा, पश्चिमी घाट क्षेत्र (महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल) और पूर्वी घाट क्षेत्र (आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु का अराकू क्षेत्र) भूस्खलन के प्रति संवेदनशील हैं।

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