
के. आर. मुण्डियार
कोविड-19 वायरस ने देश-दुनिया को भले ही झकझोर कर रख दिया। हम संक्रमण का कहर झेल रहे हैं, लेकिन इस वायरस ने हमें बहुत-कुछ सीखने की राह पर चला दिया है। हमें अभी भी कोरोना (Corona)की हर स्थिति का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। जब तक वैश्विक महामारी के वायरस के इलाज की वैक्सिन नहीं आ जाती है, हमें इसके साथ रहकर व लड़ते हुए जीवन जीना पड़ेगा। सोशल डिस्टेंस से रहना हो या मेडिकल प्रोटोकॉल की पालना करना हो, यह हमने बखूबी सीख भी लिया है। अब तो छोटे बच्चे से लेकर बड़ों तक ने जिन्दगी में एक साथ कई दिनों तक कर्फ्यू एवं लॉकडाउन में रहना भी सीख लिया। इस लॉकडाउन के खुलने से पहले चिन्ता यह है कि हमने जो सीखा है, लॉकडाउन खुलने के बाद कहीं उसे भूल नहीं जाएं।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कोविड-19 के संक्रमण की यह जंग कुछ दिन की नहीं, बल्कि यह लड़ाई लम्बी है। जनता कफ्र्यू के बाद लॉकडाउन के तीन चरण देख चुके हैं। कई राहत व शर्तों की गाइडलाइन के साथ लॉकडाउन-4 भी आ गया। शासन-प्रशासन को भी ऐसा माहौल बनाना होगा कि आमजन सहजता से कोविड से संघर्ष करते हुए जीवन जी सकें।
यह बात जरूर है कि हमने लॉकडाउन व सोशल डिस्टेंस की पालना के जरिए कोरोना की जंग पर शिकंजा जरूर कस दिया है, लेकिन हालात अभी सुधरे नहीं हैं, बल्कि खतरा उतना ही है। राजस्थान के जयपुर, कोटा, अजमेर, जोधपुर सहित 8 जिले तो अभी तक संक्रमण के कारण रेड जोन में हैं। इसलिए वहां पर लॉकडाउन बढ़ाने के अलावा हमारे पास कोई विकल्प नहीं है। जो शहर या क्षेत्र ओरेंज या ग्रीन जोन में आ चुके हैं या सरकार ने जिन शहरों व क्षेत्रों में कफ्र्यू या लॉकडाउन खोलकर राहत दी है, इसका मतलब यह नहीं है कि वहां पर हमने कोरोना को जीत लिया है। दरअसल में हमें यह भ्रम कतई नहीं पालना है, बल्कि हमें कोरोना से बचाव के लिए उतना ही सतर्क रहना है। साथ ही हमें देश में कोरोना की जंग लडऩे में अहम भूमिका निभा रहे कर्मवीरों व स्वाथ्यकर्मियों, पुलिस जवानों का शुक्रिया अदा करते रहना चाहिए, क्योंकि वे लंबे समय से अपने घर-परिवार से दूर रहकर हम सभी को सुरक्षित रखे हुए हंै। हमें कोरोना की जंग को पूरी तरह जीतने के लिए सोशल डिस्टेंस एवं मेडिकल प्रोटोकॉल की पालना कई सालों तक करनी होगी।
इस कोरोना काल से देश की स्थिति को पटरी पर लाने में कई साल लग जाएंगे। जो दर्द हमने इन दिनों में झेला है, उससे निपटने के लिए हमें भी अपनी जीवनशैली में कई बदलाव करने पड़ेंगे। इन दिनों जिस तरह हमने कम जरूरतों में रहना सीख लिया हैं तो क्यों नहीं, हम भविष्य में भी कम जरूरतों की जीवन शैली का अनुसरण ही कर लें। हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हमारे पास जितना है, हजारों के पास तो उतना भी नहीं हैं। ऐसे लोग भी है, जिनके पास दो वक्त की रोटी के इंतजाम भी नहीं हैं। यदि हम सामर्थ्यवान है तो सोशल डिस्टेंस की पालना के साथ आस-पास में किसी गरीब की मदद में आगे आना चाहिए।
kr.mundiyar@epatrika.com
Published on:
27 May 2020 07:23 am
