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Human Story: बेटियों की पढ़ाई में रुकावट बना पैसा तो ढाल बन खड़ी हो गई निसा

फीस भरने के लिए पैसा नहीं होने से जिन बालिकाओं ने स्कूल छोड़ा, उनकी फीस भर वापस उन्हें स्कूल लेकर आई व्याख्याता शमसुन निशा।
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कोटा

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Zuber Khan

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Updated: 26 Dec 2017, 7:24 AM IST

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कोटा . धन-दौलत, सोना-चांदी वक्त आने पर खर्च हो सकता है, पर ज्ञानधन कभी कम नहीं होता। यह जितना खर्च होता, उतना ही बढ़ता है। पैसा किसी की पढ़ाई में बाधा बने उससे पहले ही ढाल बन जाती है विज्ञान नगर की शमसुन निसा।
छावनी- रामचन्द्रपुरा स्थित राजकीय सीनियर सैकण्डरी स्कूल में उर्दू की व्याख्याता निसा बेटियों की छूटती पढ़ाई की डोर जोडऩे में अहम भूमिका निभा रही हैं। उन्हें स्कूल में कोई जरूरतमंद बेटी नजर आती है तो उसकी मदद को जुट जाती हैं। उन्होंने कई बेटियों की फीस जेब से भरकर शिक्षा की राह दिखाई। वह जिस भी स्कूल में पढ़ाती हैं, इस बात का ध्यान रखती हैं कि कहीं कोई बेटी किसी कारण से पढ़ाई छोडऩे को तो मजबूर नहीं। निसा अब तक करीब 40 बेटियों की शिक्षा में मदद कर चुकी हैं। इनमें से दो छात्राएं आज शिक्षक बन चुकी हैं।

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बेटियों की सफलता से बढ़ा हौसला
व्याख्याता शमसुन निसा ने बताया कि तंगहाली व फीस जमा नहीं करवा पाने पर मासूम की आंखों में समाज में अपना वजूद खोने का डर, चेहरे पर लाचारी व बहते आंसू देख कलेजा मुंह को आ गया। उसी वक्त ठान लिया, कुछ भी हो मासूमों को तालीम से दूर नहीं होने दूंगी। बेटियों की सफलता देख हौसला बढ़ गया। अब यही प्रयास रहता है कि कोई बेटी पैसों के अभाव में पढ़ाई नहीं छोड़े।

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पिता से मिली प्रेरणा
निसा 25 साल से छात्राओं की शिक्षा से टूटी डोर जोड़ रही है। उन्हें इसकी प्रेरणा अपने पिता अब्दुल हनीफ से मिली है। वे बताती हैं पिता भी शिक्षक थे और वह भी स्कूलों में बच्चों की मदद किया करते थे। हमें यही सीख देते आज हम इनकी मदद करेंगे तो यह बच्चे बुलंदियों को छू लेंगे। उनकी एक बात हमेशा याद रहती है, प्रतिभाशाली विद्यार्थी अभावों से जूझ सकते हैं लेकिन टूट नहीं सकते।

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फैमिली फीलिंग : सब उठाएं ऐसी जिम्मेदारी
निसा के पति डिप्टी चीफ इंजीनियर जाकिर हुसैन ने बताया कि शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करने और सहयोग से बढ़कर कोई पुण्य नहीं। ईश्वर ने दिया है तो इसका कुछ भाग अच्छाई में लगाना चाहिए। उन्होंने जिनकी फीस जमा करवाई, वे शिक्षक बनकर घर आईं तो काफी खुशी मिली। इस्लाम भी यही पैगाम देता है। हर इंसान ऐसे बच्चों का जिम्मा उठाए तो कोई बेटी अशिक्षित नहीं रहेगी।

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