
पाली. सरकारी विद्यालयों का शैक्षणिक स्तर ऊंचा उठाने के लिए शिक्षक सम्मेलन शुरू हुए थे। जो अब उद्देश्य से भटक गए हैं। सम्मेलनों में नाम मात्र के शिक्षक आते हैं। शेष महज दो दिन जिला स्तर के व दो दिन प्रांत स्तर के शैक्षिक सम्मेलन में अवकाश का आनन्द लेते हैं। जिले में शुक्रवार को शुरू हुए शैक्षिक सम्मेलनों में तीन स्थानों पर एेसी ही स्थिति सामने आई। शहर के बांगड़ स्कूल व सुल्तान स्कूल में हुए तीन अलग-अलग संघों के सम्मेलन में कुल 489 शिक्षक पहुंचे। जबकि इन संघों के सदस्य शिक्षकों की संख्या 2720 से अधिक है। एेसी ही स्थिति अन्य स्थानों पर हुए सम्मेलनों में भी रही।
अच्छी होती थी आमदनी
शिक्षक संघ बनने के बाद सम्मेलन होने पर अनिवार्यता के कारण सभी शिक्षक आते थे। सम्मेलनों में पंजीयन अधिक होता था। संघों की आमदनी भी बढ़ गई थी, लेकिन बाद अनिवार्यता समाप्त कर दी गई। इससे संघों की आमदनी भी पहले की तुलना में घटी है।
इतनी रही शिक्षकों की उपस्थिति
रेसला शिक्षक संघ : कुल सदस्य 670, सम्मेलन में पहुंचे 200
रेसला पी : कुल सदस्य 250, सम्मेलन में पहुंचे 135
राजस्थान शिक्षक संघ एकीकृत : कुल सदस्य 1800, सम्मेलन में पहुंचे 154
राजस्थान शिक्षक संघ राष्ट्रीय : कुल सदस्य 7000, सम्मेलन में पहुंचे 2000
दबाव नहीं : उपस्थिति प्रमाण पत्र किया बंद
शैक्षिक सम्मेलन शुरू होने पर इसमें भाग लेने वाले शिक्षकों को उपस्थिति प्रमाण पत्र दिया जाता था। जो सम्मेलन के बाद विद्यालय में जमा कराना होता था। राजस्थान शिक्षक संघ एकीकृत के जिलाध्यक्ष नंदकिशोर शर्मा ने बताया कि इस व्यवस्था को बाद में बंद करने के बाद से शिक्षकों ने सम्मेलन से दूरी बना ली। राजस्थान शिक्षक संघ राष्ट्रीय के जिलाध्यक्ष अमरजीतसिंह का कहना है कि शिक्षक सम्मेलन में आने की अनिवार्यता नहीं है। इससे शिक्षक नहीं आते हैं।
15 दिन के अवकाश से मिलते 4 दिन
शिक्षकों को शैक्षणिक कार्यों को पूर्ण करने के लिए वर्ष में पन्द्रह दिन का अवकाश दिया जाता है। इन दिनों में से ही चार दिन शिक्षक सम्मेलन के दिए जाते हैं। इनमें दो दिन जिला स्तर के सम्मेलन व दो दिन प्रांत स्तर के सम्मेलन के लिए होते हैं।
एक्सपर्ट व्यू
शिक्षविद् मोतीलाल व्यास के अनुसार सम्मेलनों से शिक्षकों का मोह भंग होता जा रहा है। इनमें बहुत कम शिक्षक पहुंचते हंै। शिक्षक संघों की संख्या भी बढ़ गई है। माध्यमिक, प्राथमिक, प्रधानाध्यापकों व प्रबोधकों सहित कई संघ बन गए हैं। इससे गुटबाजी बढ़ी है। पदाधिकारी भी निष्क्रिय होते जा रहे हैं। शिक्षक संघों की विचारधारा भी मेल नहीं खाती है। इस कारण ये विघटन की तरफ बढ़ रहे हैं। शैक्षणिक स्तर को बेहतर करना तथा सम्मेलन में आए मुद्दों के बारे में प्रस्ताव बनाकर सरकार को देना व सम्मेलन के निर्णयों को लागू करवाने का उद्देश्य गौण हो गया है।
Published on:
10 Sept 2016 10:19 am
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