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यहाँ राक्षस कालयवन हो गया था भस्म, भगवान कृष्ण का इस तरह नाम पड़ा था रणछोड़

भगवान कृष्ण से जुड़े कई प्रसंग आम लोगों में बहुत चर्चित हैं।
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ललितपुर

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Laxmi Narayan Sharma

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Updated: 22 Mar 2018, 5:08 PM IST

Lalitpur news

ललितपुर. भगवान कृष्ण से जुड़े कई प्रसंग आम लोगों में बहुत चर्चित हैं। एक ऐसा ही चर्चित प्रसंग हैं भगवान कृष्ण और राक्षस कालयवन के बीच हुआ युद्ध, जब भगवान कृष्ण का नाम रणछोड़ पड़ गया। बुंदेलखंड के ललितपुर में भगवान कृष्ण और राक्षस कालयवन की लड़ाई से जुड़ा स्थल मौजूद है जिसे रणछोड़ धाम के नाम से जाना जाता है। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर वेतवा नदी के तट पर स्थित रणछोड़ धाम जनपद के प्रचीन मन्दिरों में से एक है।

बारहवीं शताब्दी का है मंदिर

यह मन्दिर बारहवी शताब्दी के लगभग का माना जाता है जिसमें भगवान कृष्ण की अद्वितीय प्रतिमा के दर्शन होते हैं। यह स्थान प्राकृतिक सौंदर्य से घिरे वातावरण में स्थित है। इस मंदिर के पास एक प्रसिद्ध मचकुंद की गुफा भी मौजूद है जहां पर ऋषि मुचकुंद ने अपना आश्रम बनाया था और उन्हीं के क्रोध के कारण राक्षस कालयवन का संहार हुआ था। वर्तमान समय में यह मंदिर पुरातत्व विभाग के अधीन है।

भगवान कृष्ण से जुड़ी है कहानी

पौराणिक कथा के अनुसार मान्यता है कि इस मन्दिर में विराजमान भगवान कृष्ण को रणछोड़ कहते हैं। ऐसा कहा जाता हैं कि यवन देश का राक्षस कालिया यवन ने जब मथुरा में आकर भगवान कृष्ण को युद्ध के लिए ललकारा तो वह राक्षस की ललकार सुनकर अपने महल से बाहर आ गए और उन्होंने कालयवन से कहा कि यहां पर मेरी और तुम्हारी दोनों सेनाएं हैं। अगर हमने युद्ध किया तो हमारी सेनाओं का संहार हो जाएगा। इसीलिए युद्ध सिर्फ हम दोनों के बीच होना चाहिए। इस पर राक्षस कालयवन तैयार हो गया। कृष्ण ने कहा कि मैं यहां से भागता हूं और जिस जगह तुम मेरा पीतांबर पकड़ लोगे वहीं हम दोनों युद्ध करेंगे।

मथुरा से यहाँ पहुंचे भगवान कृष्ण

इसके बाद भगवान कृष्ण वहां से लड़ाई छोड़कर भागे और भागते हुए जनपद ललितपुर के मचकुंद गुफा के पास आए जहां ऋषि मचकुंद गहरी नींद में सो रहे थे। ऋषि मचकुंद को वरदान था कि उनकी नींद पूरी होने से पहले यदि कोई भी उन्हें जगाएगा तो जिस पर उनकी पहली नजर पड़ेगी वह जलकर भस्म हो जाएगा। यह बात भगवान कृष्ण को मालूम थी। जैसे ही वे मुचकुंद गुफा के पास आए, उन्होंने ऋषि मुचकुंद के ऊपर अपना पीतांबर डाल दिया और वहां से रणछोड़ मंदिर पर आ कर रुक गये।

कालयवन राक्षस हो गया भस्म

जैसे ही राक्षस कालयवन मुचकुंद गुफा के पास आया और उसने भगवान कृष्ण का पीतांबर देखा तो उसने उस पीतांबर को खींचकर लात मारकर ऋषि को जगा दिया। जैसे ही ऋषि की आंख खुली उनकी पहली नजर राक्षस कालयवन पर पड़ी और वह जलकर भस्म हो गया। यह स्थान मुचकुंद गुफा के नाम से प्रसिद्ध है और इसी के पास बना हुआ रणछोड़ मंदिर भी भगवान कृष्ण के उपनाम रणछोड़ के नाम से प्रसिद्ध है। कृष्ण रण छोड कर भागते हुये यहाँ तक आये थे इसी कारण इस क्षेत्र को रणछोड़ धाम कहा गया है और भगवान कृष्ण के इस रुप को रणछोर कहते हैं।

हर साल लगता है मेला

यह धाम अपनी प्राचीन धरोहर को सहेजे नये युग में नये-नये मंन्दिर के निर्माण और धार्मिक अनुष्ठानों के लिये भी जाना जाता है। यहां मकर सक्रांति पर भव्य मेला लगता है और प्रति वर्ष आठ दिवसीय मेला और धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन होता है। मकर सक्रांति पर सीमावर्ती मध्य प्रदेश के अलावा अन्य प्रदेशों से भी बहुत से श्रद्धालु इस स्थान पर दर्शन करने आते हैं।

बस और ट्रेन की है सुविधा

रणछोड़ मंदिर तक पहुंचने के लिए बस और ट्रेन की सुविधा उपलब्ध है। मध्य प्रदेश के सागर जनपद के बीना रेलवे स्टेशन या उत्तर प्रदेश के ललितपुर रेलवे स्टेशन पर उतरकर यहाँ पहुंचा जा सकता है। बीना रेलवे स्टेशन से प्राइवेट टैक्सी या चार पहिया वाहन से यहाँ पहुंचा जा सकता है जबकि ललितपुर रेलवे स्टेशन से भी प्राइवेट टैक्सी की सुविधा ली जा सकती है।

धौर्रा स्टेशन के निकट है मंदिर

ललितपुर जिला मुख्यालय से रणछोड़ धाम की दूरी लगभग 50 किलोमीटर है जो थाना जाखलौन के अंतर्गत धौर्रा चौकी से 5 किलोमीटर है। रणछोड़ धाम मंदिर जाने के लिए सड़क मार्ग का रास्ता है लेकिन ग्राम धौर्रा से 5 किलोमीटर दूर अंदर जंगल में कच्चे मार्ग से होकर मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। दिल्ली-मुंबई रेल लाइन पर एक छोटा सा स्टेशन धौर्रा मौजूद है लेकिन इस स्टेशन पर केवल पैसेंजर गाड़ी ही रुकती है। धौर्रा रेलवे स्टेशन पर पैसेंजर गाड़ी के माध्यम से आकर यहां से केवल 5 किलोमीटर दूर रणछोड़ धाम मंदिर पहुंचा जा सकता है। इस रेलवे स्टेशन से मंदिर के लिए टैक्सियां मिल जाती है।