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अखिलेश को उत्तराधिकारी नहीं, बनना है सर्वाधिकारी

मुलायम अखिलेश को अपना इकलौता उत्तराधिकारी मानते हैं। लेकिन, अखिलेश सिर्फ उत्तराधिकार नहीं, सर्वाधिकारी चाहते है।
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Nitin Srivastva

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Dec 31, 2016

akhilesh yadav

akhilesh yadav

महेंद्र प्रताप सिंह

लखनऊ. शनिवार को अखबारों में उत्तर प्रदेश सरकार का एक विज्ञापन छपा। इबादत थी-इरादा सच्चा है तो सब हो सकता है। यह बात कही गई मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की तरफ से। शाम होते-होते राजधानी की सडक़ों पर कुछ बैनर भी देखने को मिले। लिखा था- अखिलेश दबता नहीं, लड़ता है। यह महज इत्तेफाक है। या सोची समझी रणनीति। इसे तो अखिलेश और उनके रणनीतिकार जानें। लेकिन, यह तो तय है कि परिवार की हालिया जंग में अखिलेश का कद बहुत ऊंचा हो गया है। वे बड़े जनाधार वाले नेता के रूप में उभरे हैं। नेता जी से बड़े नेता। वे अपनी ऐसी छवि गढऩे में कामयाब हुए जो गलत कामों के लिए लड़ता है। पिता और पार्टी से भिड़ता है। अपनी बातें मनवाता है। शनिवार को भी कुछ ऐसा ही हुआ।


अब तक बेटे के लिए कठोर रहे नेताजी एकाएक मुलायम हो गए। पिछले 24 घंटे से जिस तरह सडक़ों पर अखिलेश समर्थकों का हुजूम उमड़ा उसको उन्होंने देखा। पार्टी कार्यालय में शिवपाल ने बैठक बुलाई। बैठक में दो दर्जन ही विधायक आए। इसके निहितार्थ को उन्होंने समझा। वे सामने तो नहीं आए। लेकिन 45 मिनट की बैठक में बाप-बेटे के मन का मैल काफी हद तक धुल गया। टकराव टल गया। भद पिटी चचा शिवपाल की। उनकी भी सामने आने की हिम्मत नहीं हुई। ट्विट कर अखिलेश और रामगोपाल का निष्कासन रद होने की जानकारी दी। जब अखिलेश समर्थकों ने जश्र मनाना शुरू कर दिया। तब ने सामने आए। बोले-पार्टी में सब कुछ ठीक हो गया।


पार्टी में रह-रहकर बवंडर उठता है। फिर सब कुछ शांत हो जाता है। सवाल है बाप-बेटे चाहते क्या हैं। अखिलेश के पास सरकार है। युवा नेताओं की फौज है। परिवार के सभी जवान नेता उनके साथ हैं। चाचा रामगोपाल सलाहकार हैं। मुलायम उन्हें अपना उत्तराधिकारी मानते हैं। जबकि, मुलायम के पास प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं की फौज है। सरकार में न रहकर वह सरकार है। दोनों के पास सब कुछ है। फिर झगड़ा किस बात का?


दरअसल, लड़ाई हक की नहीं। पूरी तरह से सत्ता हस्तांरण की है। बेटा हर काम में स्वतंत्रता चाहता है। बाप नसीहतों के साथ बंदिशें देता है। बेटे की सोच आधुनिक है। बाप की पुरातन। सफलता की डोर पकडऩे के दोनों के फार्मूले भी अलग-अलग हैं। मुलायम अखिलेश को अपना इकलौता उत्तराधिकारी मानते हैं। लेकिन, अखिलेश सिर्फ उत्तराधिकार के हक से संतुष्ट नहीं। उन्हें तो सर्वाधिकारी बनना है। यानी जो कुछ भी पिता का है, वह सब कुछ उनका हो। वे फैसले लेने का स्वतंत्र अधिकार चाहते हैं। बार-बार की टोका-टाकी टीपू को पसंद नहीं। यानी उन्हें घर से लेकर पार्टी तक सर्वेसर्वा का हक चाहिए। जबकि मुलायम को लालकृष्ण आडवाणी हो जाना पसंद नहीं। वे अभी मार्गदर्शक की भूमिका में नहीं आना चाहते। अखिलेश चाहते हैं इम्तिहान उनका है तो फैसला भी उनका होना चाहिए। बहरहाल, अखिलेश का एक पसंदीदा डायलॉग है, हारकर जीतनेवाले को बाज़ीगर कहते हैं। सब कुछ गंवाकर, अपनी ही पार्टी से बेदखल होकर 24 घंटे के भीतर ही वे विजेता के रूप में सामने आए। टीपू ने इस बार तलवार निकाली तो डराने के लिए नहीं, चलाने के लिए। और साबित किया कि अखिलेश दबता नहीं, लड़ता है।