दरअसल, लड़ाई हक की नहीं। पूरी तरह से सत्ता हस्तांरण की है। बेटा हर काम में स्वतंत्रता चाहता है। बाप नसीहतों के साथ बंदिशें देता है। बेटे की सोच आधुनिक है। बाप की पुरातन। सफलता की डोर पकडऩे के दोनों के फार्मूले भी अलग-अलग हैं। मुलायम अखिलेश को अपना इकलौता उत्तराधिकारी मानते हैं। लेकिन, अखिलेश सिर्फ उत्तराधिकार के हक से संतुष्ट नहीं। उन्हें तो सर्वाधिकारी बनना है। यानी जो कुछ भी पिता का है, वह सब कुछ उनका हो। वे फैसले लेने का स्वतंत्र अधिकार चाहते हैं। बार-बार की टोका-टाकी टीपू को पसंद नहीं। यानी उन्हें घर से लेकर पार्टी तक सर्वेसर्वा का हक चाहिए। जबकि मुलायम को लालकृष्ण आडवाणी हो जाना पसंद नहीं। वे अभी मार्गदर्शक की भूमिका में नहीं आना चाहते। अखिलेश चाहते हैं इम्तिहान उनका है तो फैसला भी उनका होना चाहिए। बहरहाल, अखिलेश का एक पसंदीदा डायलॉग है, हारकर जीतनेवाले को बाज़ीगर कहते हैं। सब कुछ गंवाकर, अपनी ही पार्टी से बेदखल होकर 24 घंटे के भीतर ही वे विजेता के रूप में सामने आए। टीपू ने इस बार तलवार निकाली तो डराने के लिए नहीं, चलाने के लिए। और साबित किया कि अखिलेश दबता नहीं, लड़ता है।