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14 साल बाद बसपा की राजनीति में बहुत बड़ा बदलाव, मायावती खुद करने जा रही हैं ये काम

भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बाद बहुजन समाज पार्टी ही इकलौती ऐसी पार्टी है, जिसकी राष्ट्रीय राजनीति में सक्रियता है...
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लखनऊ

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Hariom Dwivedi

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Updated: 11 Jul 2018, 2:19 PM IST

Mayawati

14 साल बाद बसपा की राजनीति में बहुत बड़ा बदलाव, मायावती खुद करने जा रही हैं ये काम

लखनऊ. 2014 के लोकसभा चुनाव में भले ही बसपा खाता खोलने में नाकाम रही थी, लेकिन इस बार मायावती किंग मेकर की भूमिका में जरूर नजर आ रही हैं। वजह उनमें आया बदलाव है। मायावती इस बार 14 साल का 'सियासी वनवास' खत्म कर 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। इतना ही नहीं गेस्ट हाउस कांड के बाद, बसपा पहली बार समाजवादी पार्टी को सपोर्ट कर रही है। इसके अलावा वह पार्टी संगठन को नये सिरे खड़ा करने में जुटी हैं। बसपा इतिहास में पहली बार है कि जब मायावती ने दो राष्ट्रीय को-ऑर्डिनेटर बनाये हैं।

सूत्रों की मानें तो मायावती 2019 का लोकसभा चुनाव अंबेडकरनगर या बिजनौर सीट से लड़ सकती हैं। 14 साल पहले वर्ष 2004 मायावती आखिरी बार अंबेडकरनगर से सांसद चुनी गई थीं। तबसे अब तक मायावती ज्यादातर चुनावी समर में न उतरकर पार्टी की बागडोर संभालती रही हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा की करारी हार से पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा है, इसे देखते हुए मायावती ने खुद मैदान में उतरने की ठानी है। ऐसा करके वह पार्टी कार्यकर्ताओं और वोटर्स को एक पॉजिटिव संदेश देना चाहती हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती अब तक 1998, 1999 और 2004 सांसद चुनी जा चुकी हैं।

बसपा का गढ़ रहा है अंबेडकरनगर
वर्ष 2003 में जब मायावती ने बहुजन समाज पार्टी की कमान संभाली थी, तब उन्होंने चुनाव नहीं लड़ने का फैसला लिया था। उस वक्त से वह राज्यसभा या विधानपरिषद सदस्य रही हैं। पार्टी रणनीतिकारों का मानना है कि मायावती के खुद चुनावी मैदान में उतरने से पार्टी कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा नया जोश भरेगा। इसलिए इस बार वह लोकसभा चुनाव लड़ना चाहती हैं। इत्तेफाक से हालात भी अनुकूल हैं। हालांकि, अभी ये तय नहीं हुआ कि मायावती अंबेडकरनगर या बिजनौर में से किस सीट पर चुनाव लड़ेंगी। अंबेडकरनगर हमेशा से ही बसपा का गढ़ रहा है, वहीं पश्चिमी यूपी की बिजनौर सीट पर सपा का प्रभाव माना जाता है।

विपक्षी एकता की अहम कड़ी हैं मायावती
2017 के विधानसभा चुनाव में हारने के बाद से मायावती हर कदम फूंक-फूंक कर रख रही हैं। उत्तर प्रदेश में जहां वह चिर-प्रतिद्वंदी पार्टी सपा से गठबंधन की चर्चा आगे बढ़ा रही हैं, वहीं दूसरे राज्यों में गठजोड़ की संभावनाएं तलाश रही हैं। वह छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी से भी मिल रही हैं, वहीं मध्य प्रदेश में इसी साल होने वाले चुनाव पर नजर बनाये हैं। आपको बता दें कि भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बाद बहुजन समाज पार्टी ही इकलौती ऐसी पार्टी है, जिसकी राष्ट्रीय राजनीति में सक्रियता है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भले ही बसपा का सूपड़ा साफ हो गया था, लेकिन वोट शेयर के मामले में वह तीसरे नंबर पर रही थीं। विपक्ष के लिये मायावती कितनी अहम हैं। यहा कर्नाटक में एचडी कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में देखने को मिला था। समारोह के दौरान मायावती और सोनिया गांधी का गर्मजोशी से मिलना साफ करता है कि विपक्ष के लिये मायावती कितनी जरूरी हैं।

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