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ये हैं यूपीे की टाप दलित हस्तियां

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Anil Ankur

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Updated: 25 Jan 2016, 5:52 PM IST


लखनऊ. यूपी दलितों के षोषण के लिए भले ही बदनाम रही हो, लेकिन यूपी में हाल के वर्षों में ऐसे भी दलित हुए हैं जिन्हेंने दलितों का नाम न केवल रोषन किया बिल्क यूपी में राज भी किया। इनमें सबसे ज्यादा लोकप्रिय नाम मायावती का है।

पष्चिम उत्तर के गौतमबुध्द नगर के बादलपुर गांव की रहनेवाली मायावती ने षुरूआत में काफी गरीबी झेली और कठिनाइयों का सामना किया। मायावती एक भारतीय महिला राजनीतिज्ञ हैं और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमन्त्री रह चुकी हैं। वे बहुजन समाज पार्टी बसपा की अध्यक्ष हैं। उन्हें भारत की सबसे युवा महिला मुख्यमंत्री के साथ.साथ सबसे प्रथम दलित मुख्यमंत्री भी होने का श्रेय प्राप्त है। वे चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं और उन्होंने सत्ता के साथ.साथ आनेवाली कठिनाइओं का सामना भी किया है। उन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत एक स्कूल शिक्षिका के रूप में की थी लेकिन कांशी राम की विचारधारा और कर्मठता से प्रभावित होकर उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया। उनका राजनैतिक इतिहास काफी सफल रहा और 2003 में उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव हारने के बावजूद उन्होने सन 2007 में फिर से सत्ता में वापसी की। अपने समर्थको में बहन जी के नाम से मशहूर मायावती 13 मई 2007 को चौथी बार उत्तर प्रदेश का मुख्यमन्त्री बनीं और पूरे पाँच वर्ष शासन के पश्चात सन 2012 का चुनाव अपनी प्रमुख प्रतिद्विन्द्वी समाजवादी पार्टी से हार गयीं।

माया का ष्षुरूआती जीवन
मायावती उर्फ़ चंदावती देवी का जन्म 15 जनवरी 1956 को दिल्ली में हुआ था। उनकी माता का नाम रामरती और पिता का नाम प्रभु दयाल था। प्रभु दूरसंचार केंद्र में अफसर थे। मायावती के 6 भाई हैं। उन्होंने कालिंदी कॉलेजए दिल्लीए से कला में स्नातक की उपाधि ली और फिर दिल्ली विश्वविद्यालय से एलण्एलण्बी और बीण् एड भी किया। उनके पिता उन्हें कलेक्टर बनाना चाहते थे और इसके लिए उन्होंने अपना बहुत सारा वक़्त भारतीय प्रशासनिक सेवा की तैय्यारी में लगा दिया। इसी दौरान उन्होंने शिक्षिका के रूप में कार्य करना शुरु किया।


राजनैतिक जीवन
सन 1984 तक मायावती ने बतौर शिक्षिका काम किया। वे कांशी राम के कार्य और साहस से काफी प्रभावित थी। 1984 में जब कांशी राम ने एक नए राजनैतिक दल ष्बहुजन समाज पार्टीष् का गठन किया तो मायावती शिक्षिका की नौकरी छोड़ कर पार्टी की पूर्णकालिक कार्यकर्त्ता बन गयीं। उसी साल उन्होंने मुज्ज़फरनगर जिले की कैराना लोक सभा सीट से अपना पहला चुनाव अभियान आरंभ किया। सन 1985 और 19 87 में भी उन्होने लोक सभा चुनाव में कड़ी मेहनत की। आख़िरकार सन 1989 में उनके दल ष्बहुजन समाज पार्टीष् ने 13 सीटो पर चुनाव जीता और उसके बाद पीछे मुडकर नहीं देखा।

मता प्रसाद आईएएस
मुख्य सचिव रहे माता प्रसाद ने आईएएस परीक्षा में दलित आरक्षण का लाभ नहीं लिया था और सामान्य कंडीडेट की हैसियत से उन्होंने परीक्षा पास की थी। उन्हें बसपा सरकार में उत्तर प्रदेष का मुख्य सचिव भी बनाया गया था। उन्हें यूपीएससी का अध्यक्ष भी बनाया गया।

डॉ. एसएन कुरील
डॉ. एसएन कुरील प्रसिद्ध पीडियाट्रिक सर्जन हैं। वह राजधानी स्थित केजीएमयू के पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग के एचओडी व संस्थान के चीफ प्रॉक्टर भी हैं। उनकी प्रसिद्धि ऐसी है कि लंदन से भी उनके पास मरीज रेफर किये जाते हैं। एक दलित होकर उन्होंने चिकित्सा जगत में एक बड़ा मुकाम हासिल किया है।
13 दिसम्बर को 2013 को डॉ. एसएन कुरील को एक्सट्रॉफी एपीस्पेडियास (बच्चों में होने वाली जन्मजात विकृति जिसमें पेशाब की थैली व नली दोनों ही खुली रहती है ) पर शोध किया है जो कि अमेरिकन जर्नल यूरोलॉजी गोल्ड के प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ था। ये घटना उत्तर भारत में चिकित्सा जगत में एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी।
यह पहला मौका था जब किसी भारतीय पीडियाट्रिक सर्जन के शोध को जर्नल के कवर पेज पर स्थान मिला था। इसी के साथ विश्व में केजीएमयू के पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग को वैश्विक पहचान मिली । इसके साथ ही एक्सट्रॉफी एपीस्पेडियास के उपचार के लिए विकसित की गई ऑपरेशन की तकनीक सीखने के लिए देश ही नहीं विदेशों तक से विशेषज्ञ केजीएमयू आ रहे हैं।
डॉ. कुरील ने बताया कि एक्सट्रॉफी एपीस्पेडियास पर उनके आधा दर्जन शोध पत्र अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हो चुके हैं। इस शोध को आधार बनाकर डॉ. कुरील ने तीन नई सर्जिकल तकनीक विकसित की हैं जिसमें से एक नोवेल स्किन मैनेजमेंट तकनीक भी यूरोलॉजी गोल्ड में शोध पत्र के रूप में प्रकाशित हुई है। उनके इन शोधों को डॉ. केसी सोगानी गोल्ड मेडल सहित कई शोध सम्मान मिल चुके हैं।

आईपीएस बृजलाल पूर्व डीजीपी
सिद्धार्थनगर के छोटे से गांव गुजरौलिया खालसा के बेहद गरीब परिवार में जन्मे बृजलाल अनुसूचित जाति की कोरी जाति से वास्ता रखते हैं। वह यूपी के पूर्व डीजीपी रह चुके हैं एवं तेज-तर्रार आईपीएस अधिकारीयों में गिने जाते हैं। बृजलाल 1977 बैच के आईपीएस अधिकारी रहे हैं। पुलिस महकमे में शायद ही कोई ऐसा जिला हो, जहां की पुलिस या फिर अपराधी बृजलाल के नाम से परिचित न हो।
IPS Brijlal
हमेशा कानून-व्यवस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई
सरकारें चाहे जो रही हों, चाहे भाजपा या फिर खुद समाजवादी पार्टी या फिर बसपा, हर सरकार ने उनकी प्रशासनिक क्षमता, अपराधियों से जूझने और फिर उसे अंजाम तक पहुंचाने की प्रवृत्ति के चलते उन्हें हमेशा कानून-व्यवस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी। बृजलाल को वैसे बसपा सरकार की सख्त कानून-व्यवस्था का चेहरा भी माना जाता था।

पुलिस सेवा में कई बार करना पड़ा दिक्कतों का सामना

बृजलाल की ईमानदारी के चलते कई बार उन्हें पुलिस सेवा में दिक्कतों का सामना भी करना पड़ा। तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने उन्हें 1991 में मेरठ में एसएसपी बनाया था। सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने 1989 में इटावा का एसएसपी भी बनाया। वह पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी की सरकार में लखनऊ के एसपी सिटी बनाए गए। उनकी पहली तैनाती 1982 में बतौर एसपी जालौन रही। जालौन में तैनाती के दौरान उन्होंने कई दस्यु गिरोहों जैसे पूरन सिंह, मलखान सिंह जैसे कुख्यात गिरोहों से मोर्चा लिया था। वह सबसे लंबे समय तक पहले प्रदेश एडीजी कानून-व्यवस्था, फिर स्पेशल डीजी और फिर डीजीपी बनाए गए।​ उन्हें अक्टूबर 2011 में बृजलाल को प्रदेश का डीजीपी बनाया था। वह नवंबर 2014 में सेवानिवृत्त हुए।

केंद्र ने लंबे समय तक दी सुरक्षा
यूपी के बृजलाल अकेले ऐसे आईपीएस अधिकारी रहे हैं, उन्होंने एसएसपी पीलीभीत रहने के दौरान आतंकियों का पीछा करते हुए वह पंजाब तक पहुंच गए और अपने दो सिपाहियों को मारने वाले आतंकियों को अंजाम तक पहुंचाया। केंद्रीय खुफिया एजेंसियों की सिफारिश पर उन्हें लंबे समय तक सुरक्षा दी गई। इसी वजह से वह आतंकियों की हिट लिस्ट में आए। केंद्र ने उन्हें 25 आदमियों की लंबी-चौड़ी सुरक्षा दस साल तक दी। अब बृजलाल बीजेपी पार्टी का हिस्सा हैं।

कालीचरण सनेही( प्रोफेसर), लखनऊ यूनिवर्सिटी

लखनऊ यूनिवर्सिटी के हिंदी डिपार्टमेंट के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर काली चरण सनेही का नाम उन दलित शिक्षाविदों में गिना जाता है जो दलितों के उत्थान के लिए भरपूर प्रयास कर रहे हैं। कालीचरण ने साल 2000 में रीडर के तौर पर लखनऊ यूनिवर्सिटी जॉइन किया था। इससे पहले वे मध्यप्रदेश में कार्यत थे।

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प्रोफेसर कालीचरण दलितों के उत्थान के लिए हमेशा से प्रयासरत रहे हैं। उनका कहना है कि प्रदेश और केंद्र सरकार को मिलकर दलितों के उत्थान के लिए काम करना चाहिए। इन दिनों दलितों को लेकर काफी चर्चा काफी गरम है। हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला की मौत पर पीएम मोदी ने बीते दिनों लखनऊ में अफसोस जताया था। वहां मोदी-गो-बैक के नारे भी लगे जिसके बाद सूबे की राजनीति गरम हो गई। इस मुद्दे पर प्रोफेसर काली चरण कहते हैं कि केंद्र सरकार दलितों के उत्थान की बात अकसर करती है लेकिन पिछले ढेढ़ साल से किए गए उनके प्रयासों को देखकर तो नहीं लगता कि सरकार की ओर से कोई सार्थक कदम उठाए गए हों। अपने निजी अनुभवों के बारे में वे कहते हैं कि वे पूरी तरह से प्रयास कर रहे हैं कि किसी तरह उत्तरप्रदेश में दलितों का उत्थान हो और वे आगे शिक्षा की फील्ड में आगे बढ़ें।



मुकेश मेसराम, सीनियर आईएएस ऑफीसर

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मुकेश मेसराम यूपी सरकार से सीनय ऑफीर है और वर्तामान में सेल्स टैक्स ऑफीसर के पद पर कार्यरत है। मेसराम ने ये ऊचांइया को पाने के लिए काफी मेहनत की। मेसराम मध्य प्रेदश के बालघाठ के रहने वाले है और इनके पिता जी सरकारी वद्यालाय में अध्यापक थे। मेसराम ने बताया कि मेरा परिवार काफी पड़ा था जिसकी वजह से परिवार के भरण पोषण में समस्या होती थी। हमारी मां तक को परिवार का पेट पालने के लिए दूसरे के यहां मजदूरी करने जाना पड़ती था। शूरूआती दिनों से ही मेसराम का मन पढ़ने लिखने में लगता था। पढ़ने में अच्छे होने के कारण व अपने विद्यालय में सबसे ज्यादा नंबर लाने के चलते मेसराम के ग्रमीण प्रतिभा खोज स्कालर शिप मलि गई जो मेसराम के लिए किसी मौके से कम नहीं थी। इन्हों ने इसका पूरी फायदा उठाया व वे भोपाल पढ़ने चले आए जिसके बाद इन्हों ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा और यूपी सरकार में आईएएस बने। पत्रिका की टीम ने जब मेसराम से उनकी जाति को लेकर कभी हुए भेदभाव के बारे में पूछा तो उन्हों ने बताया कि सीधे तौर पर तो मुझे कभी ऐसे भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ा लेकिन कई लोगों के इस लंबे सफर के विभिन्न पड़ाव में महसूस जरूर कराया कि भारत में जाति भेदबाव लोगों की सीच की जड़ों तक पहुंच चुकी है लोग आप को सामने बले ही कुछ न कहें पर अफनी सोच को पूर्ण रूप से छिपा नहीं पाते है।