
Employment Growth in India: Photo AI
Employment Growth in India: भारत में कंपनियों का कारोबार बढ़ रहा है। कई क्षेत्रों में कमाई और उत्पादन के आंकड़े बेहतर हो रहे हैं, लेकिन नौकरी तलाश रहे युवाओं के लिए अच्छी नौकरी पाना अब भी आसान नहीं है। नौकरीपेशा लोगों के सामने भी छंटनी, सीमित भर्तियों और काम का बढ़ता दबाव जैसी चुनौतियां हैं।
यही आज की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा सवाल है, जब कंपनियां आगे बढ़ रही हैं, तो रोजगार के नए अवसर उसी रफ्तार से क्यों नहीं बढ़ रहे? इसकी वजह सिर्फ मशीनों और तकनीक का बढ़ता इस्तेमाल नहीं है। कारोबार का तरीका बदलना, कंपनियों का कम कर्मचारियों में ज्यादा काम लेना, कौशल की कमी और छोटे कारोबारियों के सामने पूंजी की मुश्किलें भी इसकी वजह हैं।
इसका असर केवल नौकरी चाहने वालों पर नहीं पड़ता। छोटे दुकानदारों और उद्यमियों के लिए भी कारोबार बढ़ाना आसान नहीं है। ऐसे में केंद्रीय बजट 2026-27 में घोषित SME Growth Fund जैसे कदम छोटे और मझोले कारोबारों के विस्तार में कितनी मदद कर सकते हैं, यह समझना भी जरूरी है।
भारत की अर्थव्यवस्था में सेवाक्षेत्र की भूमिका लगातार बढ़ी है। आईटी, वित्त, व्यापार, संचार और अन्य सेवाएं देश की आर्थिक गतिविधियों का बड़ा हिस्सा हैं। आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के अनुसार, देश के कुल सकल मूल्यवर्धन (GVA) में सेवाक्षेत्र की हिस्सेदारी करीब 55.3% थी, जबकि यह क्षेत्र लगभग 30% लोगों को रोजगार देता है। यानी सेवाओं से अर्थव्यवस्था को बड़ा योगदान मिल रहा है, लेकिन इस क्षेत्र की रोजगार देने की क्षमता उसके आर्थिक योगदान के अनुपात में नहीं है।
नीति आयोग के विश्लेषण में भी यह अंतर सामने आया है। सेवाक्षेत्र देश के कुल उत्पादन में आधे से अधिक योगदान देता है, लेकिन रोजगार में इसकी हिस्सेदारी करीब 30% है। यही वजह है कि अर्थव्यवस्था की तेज वृद्धि अपने आप उतनी ही तेजी से नौकरियां पैदा नहीं करती।
1- तकनीक से कम कर्मचारियों में ज्यादा काम
कंपनियां अब सॉफ्टवेयर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), मशीनों और स्वचालित प्रणालियों का इस्तेमाल बढ़ा रही हैं। इससे कई काम कम समय और कम कर्मचारियों में पूरे हो जाते हैं। इसका फायदा कंपनियों की लागत और काम की गति पर दिखता है, लेकिन कुछ पारंपरिक पदों की जरूरत घट सकती है। हालांकि तकनीक नए काम भी पैदा करती है, लेकिन उनके लिए अलग तरह के कौशल की जरूरत होती है।
2- सेवाक्षेत्र की हर गतिविधि ज्यादा रोजगार नहीं देती
आईटी और वित्त जैसी सेवाओं में कारोबार और कमाई तेजी से बढ़ सकती है, लेकिन हर बार उसी अनुपात में कर्मचारियों की जरूरत नहीं बढ़ती। इसके उलट स्वास्थ्य, शिक्षा, खुदरा कारोबार, पर्यटन और निर्माण जैसे क्षेत्रों में ज्यादा लोगों को काम देने की संभावना होती है। इसलिए केवल सेवाक्षेत्र की वृद्धि देखना काफी नहीं है, यह भी देखना जरूरी है कि वृद्धि किन सेवाओं में हो रही है।
3- कंपनियों की जरूरत और युवाओं के कौशल में अंतर
कई युवा डिग्री और प्रशिक्षण लेने के बाद भी नौकरी पाने में मुश्किल महसूस करते हैं। दूसरी ओर, कंपनियां ऐसे कर्मचारियों की तलाश करती हैं जिन्हें काम का व्यावहारिक अनुभव हो और जो नई तकनीक के साथ काम कर सकें। यानी समस्या केवल नौकरियों की संख्या की नहीं, बल्कि उपलब्ध नौकरियों और युवाओं के कौशल के बीच तालमेल की भी है।
4- कंपनियां विस्तार से पहले उत्पादकता पर जोर दे रही हैं
कारोबार बढ़ाने का मतलब हमेशा नई भर्तियां करना नहीं होता। कंपनियां मौजूदा कर्मचारियों से अधिक काम लेकर, तकनीक अपनाकर या कामकाज के तरीके बदलकर भी उत्पादन और कमाई बढ़ा सकती हैं। ऐसे में कारोबार का आकार बढ़ने के बावजूद कर्मचारियों की संख्या बहुत तेजी से नहीं बढ़ती।
5- छोटे कारोबार बड़े नहीं बन पा रहे
भारत में छोटे और मझोले कारोबार रोजगार देने का बड़ा माध्यम हैं। लेकिन पूंजी की कमी, बैंक से ऋण लेने में मुश्किल, भुगतान में देरी और बाजार तक सीमित पहुंच के कारण कई कारोबार अपनी क्षमता के मुताबिक आगे नहीं बढ़ पाते। जब कारोबार का विस्तार ही नहीं होगा, तो नई भर्तियों के अवसर भी सीमित रहेंगे।
6- संगठित क्षेत्र में भी धीमी हुई रोजगार वृद्धि
अक्टूबर 2026 में प्रकाशित फाइनेंशियल एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जेफरीज की रिपोर्ट में 2,200 से अधिक सूचीबद्ध कंपनियों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इसके अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में इन कंपनियों में कर्मचारियों की संख्या में वृद्धि 1.8% रही, जो पांच साल का सबसे कम स्तर था। इसी रिपोर्ट में वेतन वृद्धि 9.4% बताई गई।
इन आंकड़ों को पूरे देश के रोजगार बाजार की तस्वीर नहीं माना जा सकता, क्योंकि इनका आधार सूचीबद्ध कंपनियां हैं। लेकिन ये संगठित क्षेत्र में भर्ती की धीमी रफ्तार और वेतन में बढ़ोतरी के बीच का अंतर जरूर दिखाते हैं। यानी कंपनियां अपने मौजूदा कर्मचारियों पर अधिक खर्च कर सकती हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वे बड़ी संख्या में नए लोगों को भी नौकरी दे रही हैं।
केंद्रीय बजट 2026-27 में छोटे और मझोले उद्यमों (SME) को आगे बढ़ाने के लिए 10,000 करोड़ रुपये के SME Growth Fund की घोषणा की गई है। इसका उद्देश्य ऐसे कारोबारों को पूंजी उपलब्ध कराना है, जिनमें आगे बढ़ने और बड़े उद्यम बनने की क्षमता है।
इसके अलावा, सूक्ष्म उद्यमों को जोखिम पूंजी उपलब्ध कराने के लिए Self-Reliant India Fund में 2,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि देने का प्रस्ताव भी रखा गया है। 6 अक्टूबर 2026 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने SME Growth Fund के लिए 10,000 करोड़ रुपये की सरकारी प्रतिबद्धता को मंजूरी दी। इस फंड के जरिए छोटे और मझोले उद्यमों में सीधे इक्विटी निवेश किया जाएगा।
यहां एक बात समझना जरूरी है कि SME Growth Fund सामान्य बैंक ऋण योजना नहीं है। इसके तहत पात्र उद्यमों को इक्विटी यानी कारोबार में हिस्सेदारी के रूप में पूंजी उपलब्ध कराने की व्यवस्था है। इसका मकसद उन कंपनियों को आगे बढ़ाना है, जिन्हें विस्तार के लिए निवेश की जरूरत है।
किसी छोटे कारोबारी के लिए दुकान या इकाई का विस्तार करना, नई मशीन खरीदना, उत्पादन बढ़ाना या नए बाजार तक पहुंच बनाना आसान नहीं होता। इसके लिए पूंजी की जरूरत पड़ती है। यदि उसे सही समय पर निवेश मिल जाए, तो वह अपने कारोबार को आगे बढ़ा सकता है और नए लोगों को काम पर रख सकता है।
लेकिन इस फंड का लाभ हर छोटे दुकानदार को अपने आप नहीं मिलेगा। इसका मुख्य उद्देश्य विकास की क्षमता रखने वाले पात्र छोटे और मझोले उद्यमों में निवेश करना है। इसलिए सामान्य दुकानदार और इस फंड के लिए पात्र उद्यमी के बीच अंतर समझना जरूरी है।
सिर्फ पूंजी उपलब्ध करा देना भी रोजगार बढ़ाने की गारंटी नहीं है। कारोबारियों को तकनीकी सहायता, प्रशिक्षित कर्मचारी, बाजार तक पहुंच और समय पर भुगतान जैसी सुविधाएं भी चाहिए। तभी कारोबार का विस्तार टिकाऊ हो सकेगा और नई नौकरियां पैदा होने की संभावना बढ़ेगी।
रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए सबसे पहले उन क्षेत्रों को मजबूत करना होगा, जहां ज्यादा लोगों को काम मिल सकता है। स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यटन, खुदरा कारोबार, निर्माण और खाद्य प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों में रोजगार की अच्छी संभावनाएं हैं।
दूसरा, कौशल प्रशिक्षण को उद्योगों की वास्तविक जरूरतों से जोड़ना होगा। युवाओं को केवल प्रमाणपत्र देने के बजाय ऐसा प्रशिक्षण मिलना चाहिए, जिससे वे काम शुरू करने के लिए तैयार हो सकें। इसके लिए अप्रेंटिसशिप और काम के दौरान प्रशिक्षण को बढ़ावा देना जरूरी है।
तीसरा, छोटे कारोबारियों की मुश्किलें कम करनी होंगी। उन्हें पूंजी, तकनीक, बाजार और समय पर भुगतान की सुविधा मिलेगी, तो वे अपने कारोबार का विस्तार कर सकेंगे। इसके साथ महिलाओं और ग्रामीण युवाओं के लिए भी रोजगार के अवसर बढ़ाने होंगे।
ऐसे में सवाल लाजमी है कि अर्थव्यवस्था की असली तरक्की कितनी नौकरियां पैदा कर रही है? कंपनियों का कारोबार बढ़ना अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत है, लेकिन इसका फायदा आम लोगों तक पहुंचना भी उतना ही जरूरी है। यदि उत्पादन और कमाई बढ़े, लेकिन नई नौकरियां न बनें, तो विकास का लाभ सीमित लोगों तक रह सकता है।
SME Growth Fund जैसे कदम छोटे और मझोले उद्यमों को विस्तार के लिए पूंजी दे सकते हैं। लेकिन असली कसौटी यह होगी कि इस निवेश से कितने कारोबार आगे बढ़ते हैं, कितने नए कर्मचारी काम पर रखे जाते हैं और युवाओं को कितने बेहतर अवसर मिलते हैं। आखिरकार अर्थव्यवस्था की मजबूती केवल कंपनियों के मुनाफे से नहीं मापी जा सकती।
Published on:
31 Oct 2026, 9:20 AM IST
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