पाताल लोक जाने का मार्ग है विंध्याचल का यह नागकुंड, स्नान करने से मिलती है सर्प दोष से मुक्ति

पाताल लोक जाने का मार्ग है विंध्याचल का यह नागकुंड, स्नान करने से मिलती है सर्प दोष से मुक्ति

Akhilesh Tripathi | Publish: Jun, 14 2018 04:08:04 PM (IST) Mirzapur, Uttar Pradesh, India

ढाई हजार वर्ष पूर्व यहां नाग वंशीय राजाओं का राज्य था

सुरेश सिंह की रिपोर्ट

मिर्जापुर. विंध्य पर्वत अपने आप में ही रहस्यों का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है। वाममार्गीय और दक्षिणमार्गीय पूजा पद्धति के सबसे बड़े केंद्र विंध्याचल में आज भी ऐसे कई कुंड है, जिसका तिलस्म और रहस्य लोगों को आश्चर्यचकित कर देता है। विंध्य पर्वत पर नाग कुंड आज भी मौजूद है जिसे धरती से पाताल लोक जाने के मार्ग के तौर पर जाना जाता है। यह मार्ग प्राचीन नगरी पम्पापुर वर्तमान विन्ध्याचल में है।

पम्पापुर नागवंशीय राजाओं की राजधानी थी। कहा जाता है कि अब से ढाई हजार वर्ष पूर्व यहां नाग वंशीय राजाओं का राज्य था। माता विंध्यवासिनी नागवंशीय राजाओं की कुल देवी के रूप में पूजी जाती थी। कंतिक के भैरो मंदिर के पास स्थित नाग कुण्ड के बारे में कहा जाता है कि यहां से पाताल लोग जाने का रास्ता है और इसी रास्ते से नाग वंशीय आते जाते थे। पाताल लोक जाने वाले इसी मार्ग को नागकुंड के नाम से जाना है।

बावन पुराण में भी इस बात का जिक्र है कि नागवंशी राजा दानव राज ने इस कुंड का निर्माण करवाया गया था। पुराण के अनुसार नागवंशी राजा को 52 रानियां थीं। उन्हीं के स्नान के लिए राजा ने इस कुंड का निर्माण करवाया गया था। नाग पंचमी पर इस कुण्ड पर विशाल मेला लगता है। इस कुंड के बारे में पुराणों में भी जिक्र है।

यहां के बारे में किदवंतिया है कि इस कुण्ड में स्नान करने पर काल सर्प योग समाप्त हो जाता है। इस कुण्ड को बावन घाट की भी कहा जाता है। कहतें है कि वर्षो पूर्व मां के धाम में दूर दराज से आने वाले भक्त इस कुण्ड से जो बर्तन मांगते थे वह मिल जाता था। इसका प्रयोग कर वापस बर्तन कुंड में डाल देते थे। समय बदलने के साथ लोगों की नियत बदली और नागकुण्ड से बर्तन निकलना बंद हो गया।

इस कुण्ड में चारों तरफ सात कुआं बना हुआ है। इसी एक में पाताल लोक जाने का मार्ग है। आज भी इस कुंड में नागवंशीय राजाओं की निशानी के तौर पर लेखा चित्र अंकित है। इतिहासकार डॉ. के. एम. सिंह बताते हैं कि नागवंशीय राजाओं की राजधानी में नाग कुंडों का अस्तित्व मिलता है, जो उस दौरान काफी महत्वपूर्ण स्थल के तौर पर जाना जाता था। मगर आज इस ऐतिहासिक कुंड कि हालत सरकारी उपेक्षा के कारण खराब हो चुकी है। कुंड का पानी पूरी तरह से सूख चुका है। इसकी सीढ़ियां पूरी तरह से जर्जर हो चुकी है।

कुंड के पास फेंके जा रहे कूड़े के ढ़ेर में इसका अस्तित्व धीरे धीरे समाप्त होता जा रहा है। हालांकि पर्यटन विभाग ने स्थल की महिमा का बखान करते हुए एक बोर्ड लगाया था, वह भी विभागीय लापरवाही से जर्जर होकर टूट चुका है ।

 

 

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