30 अक्टूबर 2026,

शुक्रवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

गफलत में न रहें: मस्जिद में नमाज पढ़ना और अयोध्या विवाद दोनों हैं अलग मामले

सुप्रीम कोर्ट में बृहस्पतिवार को मस्जिद में नमाज पढ़ने के मामले की सुनवाई और अयोध्या में टाइटिल विवाद को लेकर हो रही सुनवाई, दोनों ही अलग मामले हैं। जानिए इनकी हकीकत।
3 min read
Follow Patrika on Google News
Google source verification

नई दिल्ली

•

image

Amit Kumar Bajpai

•

Updated: 27 Sep 2018, 12:48 PM IST

Ayodhya Title Case and Namaz in Mosque are different cases in SC

गफलत में न रहें: मस्जिद में नमाज पढ़ना और अयोध्या विवाद दोनों हैं अलग मामले

नई दिल्ली। अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद से पहले गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट एक अहम फैसला सुनाने जा रहा है। दरअसल कोर्ट यह तय करेगा कि मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम के अंतर्गत है या नहीं। कोर्ट यह भी तय करेगा कि 1994 में इस्माइल फारूकी मामले को संवैधानिक पीठ के पास भेजा जाए या नहीं। हालांकि इस मामले में एक गफलत यह भी है कि फैसला राममंदिर वाले मुददे पर आना है। ऐसे में यह संशय दूर करना जरूरी है कि दोनों मामले अलग हैं। बस दोनों का संबंध अयोध्या विवाद से है और अयोध्या का विवाद अभी भी सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है।

अयोध्या की विवादित जमीन पर मालिकाना हक किसका है, इस पर सुनवाई होनी बाकी है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को आने वाला फैसला मुस्लिम पक्षकारों की ओर से दी गई उस दलील से जुड़ा है, जिसमें 1994 में इस्माइल फारूकी मामले का हवाला दिया गया था। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसले में कहा था कि मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं है। मुस्लिम पक्ष की दलील थी कि इस फैसले की समीक्षा होनी चाहिए, क्योंकि कोर्ट ने बिना पर्याप्त पक्ष सुने फैसला दिया था। इसके चलते मस्जिद में नमाज पढ़ने के मामले को पहले संवैधानिक बेंच के पास भेजा जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट गुरुवार को इसी मसले पर फैसला देगा।

वहीं, देशभर को अयोध्या विवाद में सुप्रीम कोर्ट के जिस फैसले का इंतजार है वो जमीन पर मालिकाना हक से जुड़ा है। 6 दिसंबर 1992 को राम मंदिर आंदोलन के तहत अयोध्या में विवादित ढांचा ढहा दिया गया था। इसके बाद कई मुकदमे चले। जबकि टाइटिल विवाद पर सुप्रीम कोर्ट को फैसला सुनाना बाकी है।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 30 सितंबर 2010 को दिए अपने फैसले में कहा था कि तीन गुंबदों में जहां फिलहाल रामलला की मूर्ति है वो बीच का हिस्सा हिंदुओं का होगा। वहीं, दूसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़े को दिया गया, जिसमें सीता रसोई और राम चबूतरा शामिल है। जबकि एक तिहाई हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया गया था। हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। इस पर 9 मई 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगाते हुए यथास्थिति बहाल कर दी थी।

इसके बाद टाइटिल विवाद को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई शुरू हुई और तमाम कागजात के अनुवाद हुए। हालांकि सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्षकारों की ओर से केस लड़ रहे वकील कपिल सिब्बल की इस दलील से विवाद खड़ा कर दिया कि सुनवाई की इतनी जल्दी क्यों ह़ै। उन्होंने इस मामले की सुनवाई 2019 के बाद करने की अपील की थी। कपिल सिब्बल ने कहा था कि यह साधारण जमीन विवाद नहीं है, इसलिए इस पर सुनवाई 2019 के बाद होनी चाहिए।

वहीं, इस मामले में हिंदू पक्षकारों की ओर से पेश वकील हरीश साल्वे का कहना था कि यह मामला सात वर्षों से अदालत में लंबित है। अदालत को बाहर क्या हो रहा है इससे मतलब नहीं होता, इसलिए जुलाई 2019 तक सुनवाई टाल देने से गलत संदेश जाएगा।

दोनों मामलों का क्या है मतलब

अगर सर्वोच्च न्यायालय में बृहस्पतिवार को पांच न्यायाधीशों की पीठ मस्जिद में नमाज के मामले को संवैधानिक बेंच के पास भेजने का फैसला देती है, तो अयोध्या विवाद का मामला टल जाएगा। अगर सर्वोच्च न्यायालय इस्माइल फारूकी मामले पर दोबारा विचार किए जाने की जरूरत से इनकार कर देती है तो अयोध्या में टाइटिल विवाद को लेकर चल रहे मामले की सुनवाई चलती रहेगी। कुल मिलाकर देखें तो यह दोनों मामले हैं तो एक-दूसरे से बिल्कुल अलग, लेकिन जुड़े हुए हैं।