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भीमा—कोरेगांव हिंसा: सुप्रीम कोर्ट का SIT गठन से इनकार, जारी रहेगी सामाजिक कार्यकर्ताओं की नजरबंदी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, आरोपी यह तय नहीं कर सकते हैं कि उनके मामले की जांच कौन सी एजेंसी और कैसे करेगी।

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Bhima Koregaon violence

भीमा-कोरेगांव मामला

नई दिल्‍ली। भीमा-कोरेगांव मामले में सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी को लेकर विशेष जांच दल (एसआईटी) जांच की मांग सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा, इस मामले में लोगों की गिरफ्तारी उनके प्रतिरोध की वजह से नहीं हुई है। आरोपी कानूनी प्रावधानों के तहत राहत के लिए निचली अदालत जा सकते हैं।

भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में हुई सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी पर सुनवाई कर रही बेंच में शामिल जस्टिस एएम खानविलकर ने कहा कि आरोपी यह तय नहीं कर सकते हैं कि कौन सी एजेंसी उनके मामले की जांच करे और कैसे करे। पीठ ने अपने फैसले में कहा कि इस मामले में जांच अधिकारी पहले की तरह जांच करते रहेंगे।

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आरोपियों को नजरबंदी से राहत नहीं
भीमा-कोरेगांव मामले पर प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्‍यक्षता में जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच सुनवाई कर रही है। फैसला सीजेआई दीपक मिश्रा और जस्टिस खानविलकर ने बहुमत से सुनाया है। दो जजों ने SIT जांच की मांग खारिज कर दी और पांचों आरोपियों की उनके घर पर नजरबंदी भी चार हफ्ते बढ़ा दी है।

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जस्टिस चंद्रचूड़ की अलग राय
दूसरी ओर, जस्टिस चंद्रचूड़ ने अपने दो सहयोगी जजों के फैसले से अलग फैसला दिया है। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र पुलिस पर संदेह है कि क्या वे इस मामले में सही से जांच कर सकते हैं या नहीं, इसलिए एसआईटी जांच की जरूरत है।

इन लोगों ने दायर की थी याचिका
गौरतलब है कि इतिहासकार रोमिला थापर, अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक और देवकी जैन, समाजशास्त्री प्रो. सतीश पांडे और मानवाधिकार कार्यकर्ता माजा दारूवाला ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर इन सामाजिक कार्यकर्ताओं की तत्काल रिहाई तथा उनकी गिरफ्तारी की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की थी। कोर्ट ने 20 सितंबर को इस मामले की सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया था।

बीते साल दिसंबर में हुई थी हिंसा
बता दें कि महाराष्ट्र पुलिस ने 31 दिसंबर 2017 को एलगार परिषद के कार्यक्रम के बाद पुणे के भीमा-कोरेगांव में हिंसा के मामले में दर्ज शिकायत की जांच के दौरान कई स्थानों पर छापे मारे थे। इसी क्रम में 28 अगस्त को पुणे पुलिस ने माओवादियों से कथित संबंधों को लेकर कवि वरवरा राव, अधिवक्ता सुधा भारद्वाज, सामाजिक कार्यकर्ता अरुण फरेरा, गौतम नवलखा और वर्णन गोंसाल्विस को गिरफ़्तार किया था। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद पांचों सामाजिक कार्यकर्ता 29 अगस्त से अपने घरों में नजरबंद हैं।

पुलिस ने कहा था उसके पास सबूत हैं
इस मामले में पुणे पुलिस ने अदालत में बताया था कि आरोपियों के खिलाफ उसके पास पुख्‍ता सबूत हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र पुलिस को मामले में चल रही जांच से संबंधित केस डायरी पेश करने के लिए कहा। वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर, अश्विनी कुमार और प्रशांत भूषण ने कोर्ट में कहा था कि यह मामला मनगढ़ंत है और पांचों कार्यकर्ताओं की आजादी के संरक्षण के लिए सुरक्षा दी जानी चाहिए।


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