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सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के खिलाफ हैं बेंच की इकलौती महिला जज

महिलाओं के अधिकार के नाम पर शुरू हुए इस मामले में फैसला सुनाने वाली पांच जजों की पीठ में मौजूद इकलौती महिला जज इंदू मल्होत्रा ने ही इसका विरोध किया।
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नई दिल्ली

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Pritesh Gupta

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Updated: 28 Sep 2018, 4:36 PM IST

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सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के खिलाफ हैं बेंच की इकलौती महिला जज

नई दिल्ली। केरल स्थित विश्व-प्रसिद्ध सबरीमाला अय्यप्पा मंदिर में महिलाओं को प्रवेश की इजाजत मिल गई है। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सर्वसम्मति से नहीं लिया गया। रोचक बात यह है कि फैसला सुनाने वाली पांच जजों की पीठ में मौजूद इकलौती महिला जज इंदू मल्होत्रा ने ही इसका विरोध किया। उल्लेखनीय है कि इससे पहले इस मंदिर में 10 से 50 वर्ष तक की महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगी हुई थी।

...इसलिए जस्टिस मल्होत्रा ने किया विरोध

जस्टिस इंदू मल्होत्रा का मानना है कि महिलाओं को प्रवेश की अनुमति तो दूर इस याचिका पर सुनवाई ही नहीं होनी चाहिए थी। उनका मानना है, 'यह बात कोर्ट नहीं तय करेगा कि धार्मिक परंपराएं खत्म होनी चाहिए या नहीं। जिन मामलों से लोगों की धार्मिक भावनाएं गहराई से जुड़ी होती हैं, उनमें कोर्ट को दखल नहीं देना चाहिए।' उन्होंने संविधान का जिक्र करते हुए कहा, 'अनुच्छेद-25 सबरीमाला मंदिर और अय्यप्पा देवता को संरक्षण प्रदान है, जबकि अनुच्छेद-14 के आधार पर किसी धर्म की प्रथा और मान्यताओं का परीक्षण नहीं किया जा सकता।'

'समानता के लिए धार्मिक परंपराओं का परीक्षण नहीं हो सकता'

जस्टिस मल्होत्रा ने आगे कहा, 'भारत विविधताओं वाला देश है। संविधान सभी लोगों को अपनी-अपनी मान्यताओं को मानने का अधिकार देता है। कोर्ट को उसमें किसी प्रकार से दखल नहीं देना चाहिए, जब तक कि कोई उस धर्म या वर्ग से पीड़ित न हो। समानता के अधिकार के आधार पर भी धार्मिक परंपराओं का परीक्षण नहीं किया जा सकता है। ऐसे में यह कोर्ट के बजाय श्रद्धालुओं पर निर्भर करता है कि वे किस प्रथा को जरूरी मानते हैं और किसे नहीं।'

...अब तक इसलिए वर्जित था प्रवेश

सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल तक की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध की परंपरा सदियों पुरानी बताई जाती है। इसके पीछ तर्क है कि आमतौर पर इस उम्र में महिलाओं को मासिक धर्म (पीरियड्स) होता है। हिंदू धर्म की मान्यताओं के मुताबिक इस अवधि को अपवित्र माना जाता है। इस दौरान उन्हें पूजा करने, रसोई में जाने आदि से भी रोका जाता है। लिहाजा मंदिर में 10 से 50 साल तक की महिलाओं के जाने पर रोक थी, हालांकि सभी मंदिरों में ऐसा नहीं होता। लेकिन अक्सर खुद ही मासिक धर्म की अवधि में धार्मिक कार्यों से परहेज करती हैं।

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