सीवर में टूट रही है जीवन की डोर, हर पांचवें दिन एक की मौत

सीवर में टूट रही है जीवन की डोर, हर पांचवें दिन एक की मौत

एक तरफ लोग खुद की फैलाई गंदगी से उफनतेे नालों-सीवरों की ओर देखना पसंद नहीं करते, तो दूसरी ओर ऐसे लोग भी हैं जो इस गंदगी में अपने और परिवार के सुनहरे भविष्य का सपना देखने को मजबूर हैं।

हर पांचवें दिन टूट रहा सपना, सीवर की गंदगी में खो रहा है कोई 'अपना'

नई दिल्ली। एक तरफ लोग खुद की फैलाई गंदगी से उफनतेे नालों-सीवरों की ओर देखना पसंद नहीं करते, तो दूसरी ओर ऐसे लोग भी हैं जो इस गंदगी में अपने और परिवार के सुनहरे भविष्य का सपना देखने को मजबूर हैं। इन्हें सफाई के सिपाही कहें तो गलत नहीं होगा। लेकिन सफाई के लिए गंदगी में उतरने वाले ये सिपाही नियमित रूप से दम तोड़ रहे हैं। राजधानी दिल्ली में ही बीते 10 दिनों के भीतर पांच सफाईकर्मियों की जान चली गई। लेकिन देश में सफाई करने वाले मजदूरों की हालत बहुत दयनीय है और रिपोर्ट बताती है कि जनवरी 2017 से अब तक हर पांचवें दिन एक सफाईकर्मी की मौत हो रही है।

अभी ताजा मामला पश्चिमी दिल्ली के डाबड़ी का है, जहां बीते शुक्रवार को दिल्ली जल बोर्ड के एक सीवर की सफाई के दौरान 37 वर्षीय सफाईकर्मी अनिल की मौत हो गई। अनिल 20 फीट गहरे सीवर में उतरा था और जो रस्सी उसने बांधी थी वो कमजोर थी। सीवर में नीचे उतरने के दौरान रस्सी टूट गई और अनिल गहरे सीवर में गिर गया, जिसमें उसकी कमर की हड्डी टूट गई और दम घुटने से उसकी जान चली गई। बताया जा रहा है कि इस सीवर का घेरा केवल 70 सेंटीमीटर (करीब ढाई फीट) था। जब तक उसे बाहर निकाला जाता उसकी मौत हो चुकी थी।

अनिल के परिवार में वो ही इकलौता कमाने वाला था। मौत से छह दिन पहले ही उसके चार माह के बेटे की निमोनिया से मौत हो गई थी। अपने नवजात बेटे की मौत का दुख झेलने वाली मां के सामने पति की मौत की खबर आई तो वो टूट गई। अनिल के 11, 7 और 3 साल के तीन बच्चे हैं। परिवार के पास इतने पैसे भी नहीं थे कि वो अनिल का क्रिया-कर्म कर सकें। इस घटना ने सोमवार को उस वक्त तूल पकड़ा जब एक पत्रकार ने अनिल के अंतिम संस्कार से पहले की दो तस्वीरें ट्विटर पर शेयर कीं, जिसमें बेटा कफन में लिपटे पिता के शव के चेहरे से कपड़ा हटाकर गाल छूते हुए उसे उठाने की कोशिश कर रहा है लेकिन ठंडे पड़ चुके शरीर में कोई हरकत न होती देख वो पापा-पापा कहकर रोते हुए अपने आंसू पोछ रहा है। यह तस्वीर इंसानियत को झकझोरने वाली है।

 

अनिल से पहले कितनों की जान जा चुकी है

सोशल मीडिया पर इस तस्वीर के शेयर होने के बाद अनिल के परिवार की मदद करने वालों की संख्या बेहद तेजी से बढ़ती चली गई। अब पीड़ित परिवार के पास मदद की अच्छी रकम पहुंचने का दावा किया जा रहा है। हालांकि जिस प्रकार से अनिल के परिवार के पास मदद पहुंची, अब तक गंदगी-सीवर की सफाई के दौरान मरने वाले हर सफाईकर्मी के परिवार के पास ऐसी ही रकम पहुंची हो, ऐसा नहीं है। अनिल से पहले कितने परिवारों की कमाई का आखिरी सहारा, बाप के बुढ़ापे की लाठी, बेटे की अंगुली थामने वाले हाथ, पत्नी का सुहाग, मां की आंखों का चिराग और बेटी के हाथ पीले करने का सपना संजोने वाले सफाईकर्मियों ने अपनी जान दे दी और उनके परिजन आज रोटी को मोहताज हैं, कि संख्या सैकड़ों में होगी।

अगली बार सफाई करवाने से पहले सौ बार सोचें

यह घटना सबक देने वाली है। न केवल सरकार, प्रशासन को इससे सबक लेना चाहिए बल्कि आम नागरिक को भी यह समझना चाहिए कि गंदगी साफ करने के लिए किसी व्यक्ति को सीवर में न जाने दें। अपने प्रशासन से मशीन के जरिये सफाई की मांग करें। अगर कहीं से कोई मदद न मिले और केवल सफाईकर्मी से ही काम कराने की मजबूरी हो तो उसके पुख्ता सुरक्षा उपकरणों के साथ पूरी सावधानी बरतते हुए ही ऐसा किया जाए। क्योंकि आप नहीं जानते होंगे कि आपका सीवर साफ करने अकेला एक आदमी नहीं बल्कि उसका पूरा परिवार जा रहा है, जो उसके बगैर कहीं का नहीं होगा।

यूं तो कोई भी व्यक्ति गंदगी में नहीं उतरना चाहता लेकिन गरीबी के चलते वो ऐसा करने पर मजबूर होता है। पिछले कुछ वर्षों में इस बात पर भी जोर दिया गया कि लोगों की जगह मशीनों से सीवर-नालों की सफाई कराई जाए। कई जगहों पर मशीनों को इस्तेमाल भी किया जाने लगा। लेकिन फिर भी पूरी तरह से देश भर में सफाई में मशीनों का इस्तेमाल व्यापक रूप से होना बाकी है। परिणामस्वरूप सफाईकर्मियों को गंदगी साफ करनी पड़ रही है और इस कड़ी में उनकी जान भी जा रही है।

 

Death

हर पांचवें दिन 1 सफाईकर्मी गवां रहा अपनी जान

जनवरी 2017 से अब तक औसतन हर पांचवें दिन सीवर, नाले, सेप्टिक टैंक की सफाई करने वाले सफाईकर्मी की मौत हो रही है। एक प्रमुख अंग्रेजी मीडिया की रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है। यह चौंकाने वाली जानकारी दिल्ली-एनसीआर में हुईं छह सफाईकर्मियों की मौत के बाद सामने आई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि यह आंकड़े राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग (एनसीएसके) से जुटाए गए हैं।

संसद द्वारा सफाई कर्मचारियों के विकास के लिए बनाए गए कानून के तहत एनसीएसके का गठन किया गया था। मीडिया रिपोर्ट में बताया गया है कि 2017 से अब तक कुल 123 सफाईकर्मियों की जान चली गई है। यह आकड़े प्रमुख रूप से अखबारों की सूचनाओं और राज्य सरकार की संख्याओं पर आधारित हैं। अधिकारियों ने दावा किया है कि क्योंकि आंकड़े पूरी तरह से नहीं मिल सके, इसलिए वास्तविक संख्या ज्यादा हो सकती है।

बढ़ भी सकते हैं यह आकड़े

इस मामले से जुड़े एक अधिकारी ने बताया, "यह आंकड़े कुछ राज्यों से मिली जानकारी और ज्यादातर अंग्रेजी-हिंदी अखबारों की खबरों पर आधारित हैं। हो सकता है कि ऐसी ही कुछ घटनाओं की जानकारी क्षेत्रीय भाषाओं के अखबारों में भी छपी हों, लेकिन हम उन्हें नहीं ले सके।" एनसीएसके के आंकड़ों में 13 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हुई मौतों की जानकारी दी गई है।

वर्ष 2011 में की गई सामाजिक-आर्थिक जाति सूचकांक (एसईसीसी) के मुताबिक महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों के 65 हजार 181 घरों में प्रत्येक में कम से कम एक व्यक्ति सफाईकर्मी था। देश के ग्रामीण इलाकों में मौजूद ऐसे 1 लाख 82 हजार घरों के हिसाब से यह संख्या 35 फीसदी है और यह आंकड़े सर्वाधिक हैं। हालांकि एसईसीसी के आंकड़ों में शहरी भारत को शामिल नहीं किया गया है, जहां पर सीवर की सफाई अक्सर होती है। इस सूची में मध्य प्रदेश दूसरे नंबर पर है और यहां 23 हजार 105 घरों में प्रत्येक में कम से कम एक व्यक्ति सफाईकर्मी है।

गौरतलब है कि कुछ माह पूर्व दिल्ली हाईकोर्ट ने सीवर सफाई के कार्य को मशीन से किए जाने की डीजेबी की योजना जानने के बाद उम्मीद जताई थी, इससे व्यक्तियों द्वारा खुद से की जाने वाली सफाई की समस्या दूर होगी और इस काम में लगे कर्मियों का भविष्य बेहतर होगा।

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