
वीरान पड़ी कृषि उपज मंडी परिसर।
पोरसा. सरकार किसानों को कृषि उपज का वाजिब मूल्य दिलाने के लिए तमाम योजनाएं लागू कर रही हैं, लेकिन पोरसा मंडी से जुड़े किसानों के लिए यह योजनाएं बेमानी साबित हो रही हैं। रबी फसल लेने के बाद किसान उसे बाजार में बेचने को विवश हो रहे हैं, जबकि हर साल इन दिनों मंडियों में किसानों की आमद चरम पर होती है।
कारण जानने पर पता चला कि एक दर्जन से अधिक कर्मचारी पदस्थ होने के बावजूद अधिकांश ड्यूटी पर नहीं आते। शाम को व्यापारियों से संपर्क कर कुछ ट्रॉली खरीद की रसीदें काटकर पल्ला झाड़ लेते हैं। ऐसे में किसानों को दोहरी चपत लग रही है। बाजार में व्यापारी अव्वल तो सस्ते दर से कृषि उपज खरीदते हैं, उसके अलावा तौल में भी गड़बड़ी की जाती है। सरसों का भाव सरकार ने चार हजार रुपए क्विंटल घोषित किया है। 100 रुपए बतौर प्रोत्साहन राशि दिए जा रहे हैं, लेकिन पोरसा मंडी से जुड़े किसानों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। मजबूरी में किसान बाजार में 3400-3500 रुपए क्विंटल के हिसाब से सरसों बेच रहे हैं। गेहूं में भी यही स्थिति है। दो हजार रुपए क्विंटल सरकारी भाव होने के बावजूद बाजार में 1500-1600 रुपए क्विंटल या इससे भी सस्ता बेचने को मजबूर हो रहे हैं। अधिकारियों के दिलचस्पी न लेने से मंडी में किसान भी नहीं जा रहे हैं। किसानों का कहना है कि सुबह 10 बजे तक मंडी आ जाते हैं। दो घंटे बाद तक भी जब कोई बोली लगाने नहीं आता तो मजबूरी में बाजार जाकर अपनी उपज बेचनी पड़ती है। इसमें प्रति क्विंटल 500-500 रुपए तक का घाटा हो रहा है। मंडी कर्मचारियों के समक्ष अध्यक्ष भी बेवश नजर आ रहे हैं। गुरुवार को एसडीएम आरएस वाकना ने भी मंडी का निरीक्षण किया और खरीद की जानकारी ली। हालांकि कर्मचारियों ने बताया कि बुधवार को 25 ट्रॉली खरीद हुई थी, लेकिन गुरुवार को एक भी किसान न होने से संदेह पर एसडीएम ने अभिलेख जांच के लिए ले लिए हैं और मंडी प्रबंधन को व्यवस्थाएं सुधार कर खरीद और तौल शुरू करने के निर्देश दिए हैं।
स्वीकृति के बिना चले जाते हैं अवकाश पर
मंडी समिति में तैनात कर्मचारी अक्सर नदारद रहते हैं। बचाव में एक आवेदन रख देते हैं। यदि कोई निरीक्षण करने पहुंच जाए तो आवेदन रखा मिल जाता है। यदि किसी ने नहीं देखा तो वापस आकर उपस्थिति दर्ज कर देते हैं। गुरुवार को मंडी कर्मचारियों के उपस्थिति पत्रक में तीन कर्मचारी महावीर सिंह इंदौरिया, लाखन सिंह मौर्य व देवराम गुप्ता के हस्ताक्षर 18 अप्रैल को भी नहीं थे। सचिव राजेंद्र सिंह कौरव के भी हस्ताक्षर नहीं थे। हालांकि बाद में जब एसडीएम आरएस वाकना मंडी पहुंचे तो एक कर्मचारी से बोलकर उसमें टूर लिखवा दिया। अशोक राजपूत, राजेश कुमार के भी हस्ताक्षर 18 अप्रैल में नहीं थे।
सरकार को बड़ी चपत
किसान मंडी की बजाए कस्बे में व्यापारियों को उपज बेच रहे हैं। इसका ३० प्रतिशत वे मंडी में दर्शा देते हैं और टैक्स जमा करा देते हैं। जबकि 70 प्रतिशत की चोरी कर रहे हैं। अधिकारियों से सांठगांठ की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। प्रशासन इस बिंदु पर भी जांच कर रहा है।
क्या कहते हैं किसान
हम 22 किमी दूर बरवाई से सरसों लेकर मंडी पहुंचे, लेकिन यहां बोली लगाने, तौल करने का इंतजाम नहीं था। मजबूरी में हमने 3500 रुपए क्विंटल में बाजार में बेची है।
बृजराज सिंह, किसान बरवाई
हम तो चाहते हैं कि उपज का सही दाम मिले, लेकिन मंडी में खरीदारी न होने से मजबूरी में बेचनी पड़ रही है। अधिकारियों को इस ओर ध्यान देना चाहिए।
कमलेश सिंह, किसान सांगोली
मंडी में खरीद न होना चिंता का विषय है। सचिव और बाकी स्टाफ से बात करेंगे। किसानों के हित में बनी मंडी फसल आवक के समय भी वीरान पड़ी रहे, अच्छी बात नहीं है।
छत्तर सिंह तोमर, अध्यक्ष कृषि उपज मंडी समिति पोरसा
Published on:
21 Apr 2018, 8:00 PM IST
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