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सत्र शुरू होते ही प्राइवेट स्कूल ने शुरू की ये पॉलिसी, अभिभावकों के उड़े होश

नए सत्र के साथ ही शुरू हुई निजी स्कूलों की कमीशनखोरी
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मुजफ्फरनगर

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Iftekhar Ahmed

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Updated: 28 Mar 2018, 12:36 PM IST

DAV public school Budhana

मुजफ्फरनगर. उत्तर प्रदेश में नये शिक्षा सत्र के शुरू होने से पहले अभिभावकों को एक बार फिर शिक्षा के दलालों से दो चार होना पड़ेगा। यूँ कहिये कि जिसे कभी शिक्षा के मंदिर का नाम दिया जाता था, आज वे प्राइवेट स्कूल पूरी तरह शिक्षा माफ़ियाओं और कमीशन खोरों के चंगुल में फंस चुके हैं। इसका ताजा उदाहरण जनपद मुजफ्फरनगर के बुढ़ाना कस्बे में देखने को मिला। यहां डीएवी पब्लिक स्कूल में किताबों की कमीशन खोरी का खुला खेल चल रहा है। इस स्कूल प्रशासन की मनमानी को देखकर अभिभावकों में गुस्सा देखने को मिल रहा है, क्योंकि इस स्कूल में पढ़ने वाले छात्रों का किताबों का स्टॉक मार्केट में नहीं मिल रहा है। दरअसल, इस काम को स्कूल प्रशासन ने कमीशन के लालच में शामली के एक ठेकेदार को सौंपा है, जो स्कूल के बराबर में एक दुकान खोलकर किताबे बेच रहा है। अभिभावकों का आरोप है कि जो कोर्स मार्केट में 2-3 हजार रुपये में मिल सकता है। वह कोर्स यहां 4-5 हजार में अभिभावक अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए खरीदने को मजबूर हैं। इससे साफ जाहिर है कि स्कूल प्रबंधक छात्रों के कोर्स पर हजारों रुपयों का कमीशन खा रहा है।


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मामला बुढाना कस्बे के डीएवी पब्लिक स्कूल का है। यहां प्रदेश सरकार स्कूलों की स्थिति को सुधारने के लिए उन पर बजट बनाकर एक अलग ही प्रभाव में उन पर मोटा पैसा खर्च कर रही है, लेकिन प्रदेश सरकार की सर्व शिक्षा अभियान योजना को प्राइवेट स्कूल संचालक पलीता लगाने में लगे हुए हैं। कस्बे में स्थित डीएवी पब्लिक स्कूल प्रशासन ने चांदी को सोने का भाव देने के लिए एक बड़ा प्लेन सोचा और 2018 में नए छात्रों को मिलने वाला कोर्स मार्केट में ना भेज कर शामली के एक ठेकेदार सचिन जैन को सौंप दिया। जहां मार्केट में मिलने वाला 2 या 3 हजार का कोर्स स्कूल प्रशासन की बड़ी मिलीभगत के चलते 4 या 5 हजार रूपये में बिना छूट के छात्रों के अभिभावकों को मिल रहा है। इसको लेकर छात्रों के अभिभावकों में स्कूल प्रशासन की मनमानी को देखते हुए रोष भरा हुआ है।

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स्कूल प्रबंधन की मनमानी से नाराज अभिभावकों में खासी नाराजगी है। दरअसल, सरकारी प्राथमिक स्कूलों की हालत खस्ता है। अगर अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाना है तो चांदी का भाव सोना समझ कर देना होगा। बच्चों के भविष्य की बात है। अभी स्कूल प्रशासन की मिलीभगत से स्कूल के जड़ में खोली गई लोकल प्राइवेट दुकान से ही छात्रों के अभिभावक कोर्स की किताबें खरीद रहे हैं।

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अगर कोई अभिभावक कोर्स पर कुछ छूट की बात करता है तो दुकान ठेकेदार कोर्स को कई और से खरीद लेने की बात करते हैं, लेकिन अभिभावकों को यह किताब किसी भी मार्केट में नहीं मिल रही, क्योंकि यह स्कूल प्रशासन ने किसी मार्केट या फिर बाजार में सप्लाई ही नहीं की है।

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