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टूटी सड़कों पर चलना हुआ मुश्किल तो बढ़ते प्रदूषण से हाल-बेहाल

अज्ञानता-यातायात के नियमों से अनजान हैं या उनकी पालना नहीं करने की खा ली कसम ट्रैफिक सेंस को लेकर भी नागौर जिला अभी काफी पिछड़ा है। आलम यह है कि वाहन मोड़ते समय अधिकांश चालक इंडीकेटर तक नहीं दे रहे।
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मुसीबत

नागौर. टूटी सड़कों के साथ अतिक्रमण ही नहीं अवैध पार्किंग यातायात पुलिस के लिए मुसीबत है तो हादसों का कारण भी बन रही हैं।

नागौर. टूटी सड़कों के साथ अतिक्रमण ही नहीं अवैध पार्किंग यातायात पुलिस के लिए मुसीबत है तो हादसों का कारण भी बन रही हैं।

सूत्रों के अनुसार नागौर शहर के विजय वल्लभ चौराहा समेत अन्य सड़कें ही नहीं जिले में अनेक क्षतिग्रस्त हैं। जरा सी बारिश में पानी भर जाता है तो ऐसे में तेज गति से चलते वाहन या तो पलट जाते हैं अथवा किसी दूसरे वाहन से भिड़ जाते हैं। टूटी सड़कों पर वाहन चालकों का चलना दूभर है तो उड़ती धूल आमजन के लिए मुसीबत बनी हुई है। रही-सही कसर फैलते प्रदूषण ने पूरी कर दी। आलम यह है कि दस साल में वाहनों की संख्या चौगुनी हो गई, लेकिन प्रदूषण मुक्त वाहन का सर्टिफिकेट लेने की कोई जहमत नहीं उठा रहा। टैक्सी हो या अन्य कई वाहन भले ही काला धुआं छोड़ रहे हों पर उनको पकडऩे के साधन-संसाधन तक नहीं हैं।

वैसे तो कई साल से प्रदूषण जांच केंद्र के वाहन मालिक व चालक अपने वाहन का प्रदूषण सर्टिफिकेट बनवा सकते हैं, लेकिन नागौर जिले में बिना इसके काला धुआं छोड़ते वाहन दौड़ लगा रहे हैं। बताया जाता है कि कई साल पुराने वाहन तो बिना इस सर्टिफिकेट के चल रहे हैं। बढ़ता प्रदूषण लोगों की मुश्किल बढ़ा रहा है ,जबकि सरकार अथवा स्वयंसेवी संस्था तक ने कभी इसको लेकर कोई अध्ययन नहीं किया।

यातायात नियमों से अनजान भी

यातायात से जुड़े पुलिसकर्मी ही नहीं अन्य लोग भी मानते हैं कि नागौर जिले में कई चालक नियमों से अनजान हैं। कलक्ट्रेट सर्किल पर ट्रेफिक पुलिसकर्मी होने के बावजूद दाएं-बाएं से वाहन ले जाते हुए कई लोग दिख जाते हैं। यही नहीं ट्रैफिक लाइट नहीं है यदि ट्रैफिक पुलिसकर्मी भी कोई संकेत देता है तो एक बारगी कई चालक समझ ही नहीं पाते। गाड़ी मोड़ते समय इण्डीकेटर का उपयोग करने में भी लोग फिसड्डी हैं।

घायलों को अस्पताल ले जाने में भी पीछे

बात यहीं खत्म नहीं होती, तकरीबन तीन साल पहले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने घायलों को अस्पताल पहुंचाने वाले को पांच हजार का इनाम और पुलिस की तमाम झंझटों से मुक्त किया था। इसके लिए पूरे जिले की हर माह एक रिपोर्ट मुख्यालय को भी देनी पड़ती है। मजे की बात है कि तकरीबन तीन साल में आधा दर्जन नाम ही इस इनाम के लिए आगे भेजे गए हैं जबकि हादसे के बाद अधिकांश जगह घायलों को अस्पताल तक ले जाने के लिए पुलिस का ही इंतजार करते देखा गया है।