
सांकेतिक इमेज (सोर्स-AI Creative)
नागौर. प्रदेश के चिकित्सा मंत्री का गृह जिला होने के बावजूद नागौर में हृदय रोगियों के लिए जरूरी आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं का अभाव बना है। जिले में गंभीर हृदय रोगियों के उपचार के लिए न तो नियमित रूप से इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट उपलब्ध है और न ही ऐसी उन्नत जांच व उपचार सुविधाएं हैं, जिनसे हार्ट अटैक जैसी आपात स्थिति में मरीज को तत्काल उपचार मिल सके। ऐसे में गंभीर स्थिति वाले मरीजों को जोधपुर, जयपुर या बीकानेर जैसे बड़े शहरों के लिए रेफर करना पड़ता है। समय पर उपचार नहीं मिलने से कई मरीजों की जान पर बन आती है। ऐसे में सवाल यह है कि चिकित्सा मंत्री के गृह जिले में ही यदि हृदय रोगियों को प्राथमिक उपचार के बाद भी उन्नत उपचार के लिए बाहर जाना पड़े, तो जिले में आधुनिक कार्डियक चिकित्सा व्यवस्था कब विकसित होगी।
स्थिति यह है कि जिला अस्पताल सहित जिले के सरकारी स्वास्थ्य तंत्र में सामान्य तौर पर ईसीजी जैसी प्रारंभिक जांच की सुविधा तो उपलब्ध है, लेकिन गंभीर हृदय रोगियों के लिए कैथ लैब, एंजियोग्राफी, एंजियोप्लास्टी और समर्पित कार्डियक क्रिटिकल केयर जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। हार्ट अटैक के मरीज के लिए शुरुआती घंटे बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। ऐसे में मरीज को पहले स्थानीय अस्पताल से रेफर किया जाता है और फिर दूसरे शहर तक पहुंचने में लगने वाला समय उपचार की संभावना को प्रभावित कर सकता है।
मेडिकल कॉलेज खुला, पर हार्ट पेशेंट आज भी रेफर
नागौर में मेडिकल कॉलेज की शुरुआत को स्वास्थ्य सेवाओं के लिहाज से बड़ी उपलब्धि बताया गया था, लेकिन पिछले दो साल में सुधार कुछ नहीं हुआ। जमीनी हकीकत यह है कि जिले के हार्ट (हृदय) मरीजों को आज भी जांच से लेकर उपचार तक के लिए जोधपुर, बीकानेर या जयपुर का रुख करना पड़ रहा है। गंभीर मरीजों के लिए यह स्थिति जानलेवा साबित हो सकती है, क्योंकि ‘गोल्डन ऑवर्स’- यानी हार्ट अटैक के बाद के शुरुआती महत्वपूर्ण घंटे अक्सर रास्ते की दूरी में ही खत्म हो जाते हैं। जिला अस्पताल व मेडिकल कॉलेज में अब तक न तो नियमित हृदय रोग विशेषज्ञ (कार्डियोलॉजिस्ट) की नियुक्ति हो पाई है और न ही कैथ लैब (कार्डियक कैथेटराइजेशन प्रयोगशाला) जैसी अत्याधुनिक सुविधा उपलब्ध है।
विशेषज्ञों का अभाव, उपचार अधूरा
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार हार्ट मरीजों के लिए 24 गुणा 7 आपातकालीन सेवाएं, कार्डियक केयर यूनिट (सीसीयू), डिफिब्रिलेटर, प्रशिक्षित स्टाफ और विशेषज्ञ डॉक्टर अनिवार्य होते हैं। इसके अलावा ईसीजी, इकोकार्डियोग्राम (इको), टीएमटी, सीटी कोरोनरी एंजियोग्राफी जैसी जांच सुविधाएं जरूरी हैं, लेकिन नागौर शहर में ईसीजी के अलावा कुछ नहीं है। साथ इन्वेसिव और इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी- जैसे एंजियोग्राफी, एंजियोप्लास्टी, स्टेंटिंग के लिए कैथ लैब आवश्यक होती है। इन सबके अभाव में मरीजों को दूसरे जिलों के बड़े अस्पतालों में भेजा जाता है।
पांच साल में कई मरीजों की मौत, फिर भी व्यवस्था जस की तस
कोरोना महामारी के हृदय रोगियों की मृत्यु का आंकड़ा बढ़ा है। जिले में पिछले पांच वर्षों के दौरान कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें मरीजों की अचानक हृदय गति रुकने या गंभीर हृदयाघात के चलते मौत हुई। परिजनों के अनुसार कई मामलों में मरीज को तत्काल विशेषज्ञ उपचार की जरूरत थी, जिसके कारण उनकी मौत हो गई।
कार्डियक यूनिट की जरूरत
नागौर जैसे बड़े भौगोलिक क्षेत्र वाले जिले में हृदय रोगियों के लिए समर्पित कार्डियक यूनिट की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है। जिला अस्पताल में कार्डियोलॉजिस्ट की नियमित नियुक्ति के साथ कैथ लैब, एंजियोग्राफी, एंजियोप्लास्टी और कार्डियक आईसीयू जैसी सुविधाएं विकसित की जाएं तो गंभीर मरीजों को समय पर उपचार मिल सकता है।
इको जांच शुरू करवाएंगे
जेएलएन अस्पताल में हृदय रोगियों की इको जांच के लिए दो मशीनें मंगवा रहे हैं। साथ ही एक डॉक्टर को इको जांच की ट्रेनिंग करवाएंगे, ताकि अस्पताल में इको जांच की सुविधा शुरू की जा सके। इसके साथ अस्पताल भवन के पीछे जो नई बिल्डिंग बन रही है, उसमें कार्डियक सेंटर की व्यवस्था रहेगी।
- डॉ. रामावतार जाखड़, पीएमओ, जेएलएन अस्पताल, नागौर।
Updated on:
29 Sept 2026 12:28 pm
Published on:
29 Sept 2026 12:28 pm
Copyright © 2026 Patrika Group. All Rights Reserved.
