नागौर. जिला मुख्यालय पर बेसहारा व जरुरतमंद लोगों के लिए बने रैन बसेरों के संचालन में सर्वोच्च न्यायालय की गाइड लाइन की पालना नहीं हो रही है। सोमवार सुबह पत्रिका स्टिंग में इसका खुलासा हुआ। सर्किट हाउस के पास स्थित रैन बसेरे में पुलिस के जवानों ने डेरा जमाया हुआ है और यहां पहले से ठहरे हुए बेसहारा लोग सर्दी में भी खुले आसमां के नीचे रात काटने को मजबूर है। आलम यह है कि सर्दी से बचाव के लिए इन लोगों को जिम्मेदारों ने बिस्तर तक उपलब्ध नहीं करवाए। मजे की बात यह है कि नगर परिषद के जिम्मेदारो को अभी तक यह भी पता नहीं है कि पुलिस वहां किसकी अनुमति से ठहरी है, जबकि यह केवल बेसहारा व जरुरतमंद लोगों का आश्रय स्थल है।
सडक़ पर गुजारनी पड़ रही रात
रेलवे स्टेशन के पास संचालित रैन बेसेरे में पिछले कुछ दिनों से पुलिस को ठहराया गया है। गुजरात से यहां आए बेसहारा लोग व उनके बच्चे दो दिन यहां रुके लेकिन बाद में पुलिस की टीम आने से एक हॉल में पुरुष व एक में महिला कांस्टेबल को ठहराने के चलते उन लोगों को बाहर कर दिया गया। पीडि़त बच्चों के साथ रैन बसेरे के सामने रोड पर आसमां तले रात काटने को मजबूर है। अल सुबह अलाव तापकर सर्दी से बचने की जद्दोजहद करते नजर आए।
लाखों रुपए हो रहे खर्च
शहर में जरुरतमंद, बेसहारा व बेघर लोगों के लिए लाखों रुपए की लागत से सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन के अनुसार रैन बसेरों का निर्माण करवाया गया है। हकीकत यह है कि इन रेन बसेरों को जरुरतमंदों को लाभ नहीं मिल रहा है। जिला पुलिस अधीक्षक कार्यालय, व्यास कॉलोनी, रेलवे स्टेशन आदि तीन स्थानों पर रैन बसेरों के संचालन पर लाखों रुपए खर्च करने के बावजूद वास्तविक जरुरतमंदों को रैन बसेरों का लाभ नहीं मिल रहा है।
पुलिस का नहीं स्थाई ठिकाना
नागौर शहर में अतिक्रमण हटाने,अवैध खनन के विरुद्ध कार्रवाई करने तो कभी कानून व्यवस्था बनाने के लिए समय-समय पर अन्य शहरों से पुलिस, आरएसी बुलाई जाती है। बाहर से आने वाली फोर्स को ठहराने के लिए प्रशासन व पुलिस की ओर से कोई स्थाई ठिकाना तय नहीं किया गया है। ऐसे में जवानों में यहां-वहां ठहरना पड़ता है। गत माह किसान भवन में पुलिस को ठहराए जाने के चलते समर्थन मूल्य पर मूंग बेचने आए किसानों को ट्रोलियों पर ही रात गुजारनी पड़ी।