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VIDEO…अवैध कब्जा करने वालों को क्यों बचाने में लगी हुई राज्य सरकार…!

Nagaur. राज्य सरकार पारंपरिक जलस्रोतों को बचाने के लिए समिति की मिली रिपोर्ट का अब तक क्रियान्वयन नहीं कर पाई है।
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Nagaur news

Why is the state government engaged in saving the illegal occupants...!

नागौर. राज्य सरकार पारंपरिक जलस्रोतों को बचाने के लिए समिति की मिली रिपोर्ट का अब तक क्रियान्वयन नहीं कर पाई है। समिति की ओर से तकरीबन 20 साल पहले राज्य सरकार को रिपोर्ट सौंपी गई थी। समिति का गठन खुद राज्य सरकार ने उच्चतम न्यायालय की सलाह पर किया था।

समिति की सिफारिश लागू होती तो बदल जाती तस्वीर
राज्य सरकार बीस सालों के बाद भी पारंपरिक जलस्रोतों को बचाने में न केवल विफल रही है, बल्कि समिति की ओर से इनको बचाने के लिए दी गई रिपोर्ट को आज भी लागू करने में आनाकानी कर रही है। वर्ष 2003 में एक जनहित याचिका के माध्यम से पारंपरिक जलस्रोतों के बचाए जाने के प्रकरण में सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय ने राज्य सरकार को समिति का गठन करने की सलाह दी थी। ताकि पारंपरिक जलस्रोतों को बचाया जा सके। समिति में उस दौरान सिंचाई विभाग के निदेशक रहे वाईसी अग्रवाल, वाटरशेड विकास व मृदा संरक्षण विभाग के संयुक्त सचिव निदेशक एलबीएल माथुर एवं अधीक्षण खनन अभियंता राकेश हिरत को शामिल किया गया था। समिति ने प्रदेश में पारंपरिक जलस्रोतों के स्थिति की जांच करने के साथ ही इसको बचाने के लिए लागू किए जाने वाली सिफारिशें राज्य सरकार को सौंप दी थी। जानकारों का कहना है कि सरकार ने समिति से मिले निष्कर्ष के आधार पर की गई सिफारिशें लागू करती तो निश्चित रूप से पारंपरिक जलस्रोतों का न केवल संरक्षण हो सकता था, बल्कि पानी की कमी से जूझ रहे प्रदेश को इस संकट से भी छुटकारा मिल गया होता।

समिति की ओर से यह की गई थी मुख्य सिफारिशें...
समिति की सिफारिशों में नाला, नदियों, सहायक नदियों आदि जैसे जल निकासी चैनलों के रूप में दिखाई गई 15 अगस्त 1947 को सरकार के रूप में घोषित भूमि का रूपांतरण अवैध घोषित होना चाहिए। जलग्रहण क्षेत्र के आकार के आधार पर उपयुक्त दूरी पर निर्माण स्तंभों द्वारा जलग्रहण क्षेत्रों का सीमांकन सहायता से किया जाना चाहिए। जल निकासी चैनलों का सीमांकन होना चाहिए। गैर-आबादी वाले क्षेत्रों में उपयुक्त दूरी पर खंभे लगाकर या जल निकासी चैनल के आकार और उसके महत्व के आधार पर बगल की दीवार का निर्माण करके किया जा सकता है। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में, जल निकासी चैनलों का सीमांकन अनिवार्य रूप से उचित ऊंचाई और मोटाई की दीवारों का निर्माण करके किया जाना चाहिए।. सरकारी स्वामित्व वाली झीलों एवं अन्य जल निकायों में उनके डूब क्षेत्र में निजी व्यक्तियों के खातेदारी अधिकार को सरकार के स्वामित्व में लाया जाए।. जलग्रहण क्षेत्रों में जल निकासी चैनलों का निरीक्षण इंजीनियरिंग पेशेवरों और पटवडिय़ों द्वारा किया जाना चाहिए। नाले में जहां-जहां रुकावटें हैं, उन्हें पुलिया बनाकर, नालों को गहरा और चौड़ा कर उपयुक्त रूप से दूर किया जाना चाहिए। जहां भी कोई निर्माण कार्य हो, जिससे जल निकासी नालियों में पानी के बहाव में बाधा उत्पन्न हो सकती है। वहां सिंचाई विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र प्राप्त करना होगा। सबसे गहरे नाले तल से 2 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले एनीकटों की पहचान की जानी चाहिए। 2 मीटर से अधिक ऊंचाई को नष्ट किया जाना चाहिए। जहां-जहां आवासीय कॉलोनियों का निर्माण जल निकासी नालियों में प्रवाह को बाधित कर रहा है। वहां अवरोध को हटाया जाना चाहिए। नालों को और गहरा निर्मित किया जाना चाहिए। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में झीलों, तालाबों, जल निकायों की परिधि पर, जल निकाय की परिधि पर पक्की नाली का निर्माण किया जाना चाहिए ताकि जल निकाय में घरेलू, औद्योगिक और अन्य अपशिष्टों का प्रवेश रोका जा सके। मृदा संरक्षण कार्य के लिए उपयुक्त दिशा-निर्देश जारी करना चाहिए। जिला प्रशासन को विभिन्न प्रकार के अपशिष्ट पदार्थों के डंपिंग के लिए स्थान निर्दिष्ट करना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति अपशिष्ट पदार्थ को अन्य स्थानों पर, विशेषकर जल निकासी नालियों में फेंकता पाया जाता है, तो कानून में उपयुक्त दंड का प्रावधान किया जाना चाहिए। सरकार को इस मामले में जागरूकता पैदा करने के लिए आवश्यक कदम उठाने चाहिए। मार्बल स्लरी को निर्माण सामग्री के रूप में, गड्ढों आदि को भरने के लिए उपयोग करने की संभावना तलाशी जानी चाहिए, जैसा कि मक्खी के निपटान के लिए किया गया है
इनका कहना है...
कमेटी की सिफारिशों को लोगों के कल्याणकारी हित के लिए लागू करना आवश्यक है। पारंपरिक जलस्रोतों का जो क्षरण हुआ है। उसको पुर्नजीवित करने के प्रयास करने के साथ भूजल नीति को लागू करना अच्छा कदम होगा।
डॉ. विकास पावडिय़ा, कृषि अर्थशास्त्री, कृषि महाविद्यालय नागौर