
1977 के चुनाव में जनता पार्टी की जीत हुई थी (Photo-AI)
Congress Governments Dismissal 1977: आपातकाल के बाद 1977 में हुए आम चुनाव में जनता पार्टी की जीत हुई और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। इंदिरा गांधी और कांग्रेस के लिए यह चुनाव बड़ा झटका था। इंदिरा अपनी सीट तक नहीं बचा पाईं थीं। नई सरकार के कुछ महीने शांति से बीते, लेकिन उसके बाद एक खबर ने पूरी सरकार की नींद उड़ा दी। यकीन कर पाना मुश्किल था, लेकिन इनकार भी नहीं किया जा सकता था। दरअसल, देसाई सरकार के नौ राज्यों में कांग्रेस की सरकारों को बर्खास्त करने के फैसले और उस पर कार्यवाहक राष्ट्रपति बीडी जत्ती की असहमति ने एक ऐसा माहौल निर्मित किया कि सरकार डर एवं आशंका में घिर गई।
मोरारजी देसाई सरकार में गृह मंत्री चरण सिंह चाहते थे कि नौ राज्यों में कांग्रेस सरकारों को बर्खास्त किया जाए। इसके पीछे उनका तर्क था कि आम चुनाव में इंदिरा गांधी की हार के बाद, इन राज्य की सरकारों ने भी शासन करने का अपना जनादेश खो दिया है। चरण सिंह का यह तर्क अजीब था, लेकिन वे इस पर कैबिनेट को राजी करने में सफल रहे। वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी ने अपनी किताब How Prime Ministers Decide में लिखा है- कैबिनेट ने राज्य विधानसभाओं को भंग करने की सिफारिश कार्यवाहक राष्ट्रपति बासप्पा दनप्पा जत्ती के पास भेजी। जत्ती ने अपनी सहमति देने से इनकार कर दिया और ऐसा एक बार नहीं, बल्कि दो बार हुआ।
29 अप्रैल 1977 को उन्होंने सरकार को सूचित किया कि उन्हें इस मामले पर विचार करने के लिए अतिरिक्त समय चाहिए। इससे सरकार में खलबली मच गई। आखिरकार, जत्ती तो केवल एक औपचारिक प्रमुख थे। वे जानबूझकर फैसले में देरी कर रहे थे। उनके हस्ताक्षर से इनकार करने पर एक संवैधानिक संकट पैदा हो सकता था, जिससे चुनी हुई सरकार का कामकाज रुक सकता था।
कार्यवाहक राष्ट्रपति के इस रुख से प्रधानमंत्री देसाई चिंतित हो गए। उन्होंने 30 अप्रैल 1977 को कैबिनेट की एक आपातकालीन बैठक बुलाई। मंत्रियों की घबराहट साफ देखी जा सकती थी; उन्हें चिंता थी कि कार्यवाहक राष्ट्रपति आगे क्या कदम उठा सकते हैं। वे जानते थे कि जत्ती इंदिरा गांधी के वफादार थे और उन्हीं के चलते इस पद तक पहुंचे थे। हालांकि किसी मंत्री ने खुलकर यह बात नहीं कही, लेकिन सबके मन में एक सवाल था- क्या सशस्त्र बलों के सर्वोच्च कमांडर के रूप में जत्ती सेना को बुलाकर नई सरकार को गिरा सकते हैं? हालांकि, रक्षा मंत्री जगजीवन राम ने अपने कैबिनेट सहयोगियों के डर को दूर करने की कोशिश की, लेकिन उनकी घबराहट कायम रही।
जॉर्ज फर्नांडीस सरकार में संचार मंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। उनके पास एक के बाद एक दो फोन आए और चिंता का लेवल एकदम से हाई हो गया। देर रात फर्नांडीस को इंटेलिजेंस ऑफिसर वसंत वी. नागरकर का फोन आया। फर्नांडीस की तरह ही, नागरकर की पृष्ठभूमि भी समाजवादी थी और वे इमरजेंसी के विरोधी थे। उन्होंने फर्नांडीस को खबर दी कि ‘कुछ पक रहा है'। IB में उनके साथी कांग्रेस नेताओं की फोन कॉल पर नज़र रखे हुए थे। उन्होंने जॉर्ज से सावधान रहने को कहा। उन्होंने सीधे तौर पर तो नहीं कहा, लेकिन उनका इशारा तख्तापलट की आशंका की ओर था। जैसे ही फर्नांडीस ने फोन रखा, फोन फिर बज उठा। इस बार उनके समाजवादी साथी मधु लिमये लाइन पर थे। उन्हें भी इस बारे में सतर्क कर दिया गया था। नागरकर और लिमये के फोन आने के बाद, जॉर्ज फर्नांडीस भी आशंकाओं में घिर गए।
जॉर्ज फर्नांडीस ने अपने राजनीतिक सचिव रवि नायर को नई दिल्ली के हाई-सिक्योरिटी वाले इलाकों का जायजा लेने के लिए भेजा। फर्नांडीस की सरकारी गाड़ी उस दिन वापस जा चुकी थी, इसलिए नायर ने किसी का टू-व्हीलर लिया और उसी से चक्कर लगाने निकल पड़े। उस रात जब वे लुटियंस दिल्ली में घूम रहे थे, तो उनके दिमाग में 'कैप पुत्श' (Kapp Putsch) की घटना याद आ गई। 1920 में जर्मनी में राष्ट्रीय सरकार को गिराने के लिए किया गया तख्तापलट का प्रयास। उस घटना का मकसद नई-नई बनी वाइमर रिपब्लिक को खत्म करके उसकी जगह एक तानाशाही सरकार स्थापित करना था। लेकिन नायर को आर्मी हेडक्वार्टर, सेंट्रल टेलीग्राफ ऑफिस, ऑल इंडिया रेडियो या संसद भवन के आसपास कोई भी संदिग्ध गतिविधि नहीं दिखी। वे वापस लौटे और फर्नांडीस को बताया कि 'सब कुछ ठीक है'। इसके बाद सरकार की जान में जान आई।
तख्तापलट के विचारों और आशंकाओं को आम चुनाव से पहले के घटनाक्रम से भी बल मिला। उस समय सत्ता के गलियारों में यह चर्चा थी कि सेना प्रमुख ने इंदिरा गांधी को प्रस्ताव दिया था कि अगर वह चुनाव हार जाती हैं और विपक्ष उनके घर के बाहर कोई मार्च आयोजित करता है, तो वह उनकी सुरक्षा के लिए नई दिल्ली में सेना की टुकड़ियां तैनात कर देंगे। उन्होंने इंदिरा गांधी से कहा था कि भीड़ बेकाबू होकर उनके आवास पर हमला कर सकती है। हालांकि, इंदिरा गांधी ने इससे इनकार करते हुए कहा था – आप मेरी चिंता मत कीजिए। बस मेरे बच्चों का ध्यान रखिएगा।
इसी तरह, खुफिया एजेंसी R&AW (रॉ) के प्रमुख आर. एन. काओ ने भी उन्हें ऐसा ही एक प्रस्ताव दिया था। उन्होंने कहा था– ‘मेरे पास कई सशस्त्र अर्धसैनिक बल हैं, और अगर हिंसा होती है, तो मैं उन्हें दिल्ली बुला सकता हूं’। ऐसे में मोरारजी देसाई सरकार के मन में यह आशंका बैठ गई थी कि इंदिरा गांधी के वफादार कार्यवाहक राष्ट्रपति कोई बड़ा खेल कर सकते हैं। 30 अप्रैल 1977 को ही रक्षा मंत्री जगजीवन राम ने अपने कैबिनेट सहयोगियों के डर को दूर करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि सेना की ओर से किसी तरह की कार्रवाई की संभावना नहीं है। हालांकि, उन्होंने यह जरूर बताया कि इमरजेंसी के दौरान तत्कालीन रक्षा मंत्री बंसी लाल सेना प्रमुख से मिले थे और उनसे इमरजेंसी का समर्थन करने को कहा था। लेकिन सेना प्रमुख, जनरल तपेश्वर नारायण रैना ने ऐसा करने से मना कर दिया था।
जगजीवन राम ने सहयोगियों से कहा कि सेना की पेशेवर निष्ठा पर कोई शक नहीं किया जाना चाहिए। राम के भरोसा दिलाने के बावजूद, उस दिन कई मंत्रियों के मन में एक अजीब सी घबराहट बनी रही, जो तब शांत हुई जब जॉर्ज फर्नांडीस ने यह पक्का कर लिया कि सबकुछ ठीक है।
| राज्य | चुनाव में विजेता |
|---|---|
| उत्तर प्रदेश | जनता पार्टी |
| मध्य प्रदेश | जनता पार्टी |
| राजस्थान | जनता पार्टी |
| हिमाचल प्रदेश | जनता पार्टी |
| हरियाणा | जनता पार्टी |
| बिहार | जनता पार्टी |
| ओडिशा | जनता पार्टी |
| पश्चिम बंगाल | CPI(M) |
| पंजाब | अकाली दल |
अगले दिन यानी 1 मई 1977 को, जॉर्ज फर्नांडीस अपने राजनीतिक सचिव रवि नायर सहित 200-300 समाजवादी युवाओं को लेकर सड़क पर उतरे राष्ट्रपति भवन तक मार्च करते हुए जत्ती के इस्तीफे की मांग की। बताया जाता है कि जनता सरकार ने जत्ती को सख्त चेतावनी दी। इमरजेंसी के दौरान पारित किए गए विवादास्पद 42वें संविधान संशोधन का हवाला दिया, जिसमें यह प्रावधान था कि राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद की सलाह माननी होगी। आखिरकार, जत्ती को झुकना पड़ा। उस रात, उन्होंने नौ राज्य विधानसभाओं को भंग करने के आदेश पर हस्ताक्षर कर दिए। देसाई सरकार ने इन राज्यों में 11 जून 1977 को नए चुनाव कराने की घोषणा की। इनमें से सात राज्यों - उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, बिहार और ओडिशा में जनता पार्टी सत्ता में आई। पश्चिम बंगाल और पंजाब में दो गैर-कांग्रेसी दलों CPI(M) और अकाली दल ने जीत हासिल की। जबकि कांग्रेस को हर जगह करारी हार का सामना करना पड़ा।
Updated on:
5 Nov 2026, 3:41 PM IST
Published on:
5 Nov 2026, 3:41 PM IST
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