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कौन था उम्र में बड़ा वो ‘दोस्त’ जिससे दिल की हर बात कर लेते थे APJ Abdul Kalam!

APJ Abdul Kalam Birth Anniversary: पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के बचपन से जुड़ी प्रेरक कहानी, जिसमें नाव बनाने की प्रक्रिया ने उन्हें इंजीनियरिंग की दुनिया से परिचित कराया। जानिए कैसे अहमद जलालुद्दीन की दोस्ती और मार्गदर्शन तथा बहन ज़ोहरा के त्याग ने उनके सपनों को उड़ान देने में अहम भूमिका निभाई।
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पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम। फोटो-ANI

APJ Abdul Kalam Birth Anniversary: पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलामके पिता ने जब रामेश्वरम और धनुषकोडी के बीच नाव चलाने का फैसला लिया, तब कलाम साहब को कोई ऐसा मिला, जिससे वह अपने मन की हर बात कर सकते थे। उम्र में बड़ा, लेकिन किसी हमउम्र की तरह उन्हें सुनने वाला- अहमद जलालुद्दीन। अब्दुल कलाम का बचपन रामेश्वरम में बीता। समुद्र की लहरों का शोर, पुल से गुजरती ट्रेन, आसमान में मंडराते पक्षी और हवा में घुली नमक की महक, उनके जीवन का अहम हिस्सा थे। यहां मौजूद लगभग हर घर का समुद्र से कोई न कोई नाता था। कलाम साहब के परिवार की आर्थिक स्थिति कुछ खास अच्छी नहीं थी। इसलिए उनके पिता ने रामेश्वरम और धनुषकोडी के बीच नाव चलाने का फैसला लिया। हालांकि, नाव खरीदने के लिए ढेर सारे पैसों की जरूरत थी, जो उनके पास नहीं थे। वो कहते हैं, आवश्यकता, आविष्कार की जननी होती है, अब्दुल कलाम के पिता ने इस कहावत को सही साबित किया। नाव बनाने की तैयारी शुरू हुई, ये वो पहला आविष्कार था जिसके कलाम साहब गवाह बने। 

नाव के निर्माण के साथ हुआ  इंजीनियरिंग की दुनिया से पहला परिचय

रामेश्वरम द्वीप से धनुषकोडी लगभग बाईस किलोमीटर दूर है। रामेश्वरम प्राचीन काल से ही एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल रहा है। माना जाता है कि जब भगवान राम माता सीता को बचाने के लिए लंका जा रहे थे, तो यहीं से लंका तक पुल का निर्माण किया था। रामायण के कुछ संस्करणों के अनुसार, लंका से अयोध्या लौटते समय भगवान राम, लक्ष्मण और माता सीता यहां रुके थे और भगवान शिव की पूजा की थी। रामेश्वरम आने वाले तीर्थयात्री धनुषकोडी भी जाते थे। यहां 'सागर-संगम' में स्नान करना पवित्र माना जाता है। यह संगम बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर के मिलने का स्थान है। वर्तमान में धनुषकोडी सड़क मार्ग से जुड़ गया और तीर्थयात्री वैन से वहां जा सकते हैं, लेकिन कलाम साहब के बचपन के समय उस द्वीप तक पहुंचने का एकमात्र साधन थी– नाव। परिवार की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए अब्दुल कलाम के पिता ने नाव चलाने का फैसला लिया। उन्होंने समुद्र के किनारे खुद ही वह नाव बनानी शुरू कर दी। लकड़ी और धातु के टुकड़ों से एक नाव को आकार लेते देखना, इंजीनियरिंग की दुनिया से कलाम साहब का पहला परिचय था।

कलाम के जीवन में हुई अहमद जलालुद्दीन की एंट्री, जो देते उनके हर सवाल का जवाब

नाव बनाने के काम में मदद के लिए अब्दुल कलाम के पिता ने अहमद जलालुद्दीन को बुलाया। जलालुद्दीन, एपीजे कलाम के चचेरे भाई थे। उनसे उम्र में बढ़े थे, लेकिन वह किसी दोस्त की तरह उनसे अपने मन की बात कह सकते थे। अपनी आत्मकथा ‘My Journey Transforming Dreams Into Actions’ में अब्दुल कलाम ने लिखा है– मैं हर दिन, उस जगह बेसब्री से जाने का इंतज़ार करता जहां नाव बन रही होती थी। लकड़ी के लंबे टुकड़ों को ज़रूरत के हिसाब से काटा जाता, सुखाया जाता, चिकना किया जाता और फिर आपस में जोड़ दिया जाता। नाव के ढांचे और उसके अंदर के हिस्सों को बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली लकड़ियों को आग पर तपाकर मज़बूत किया जाता था। धीरे-धीरे, हमारी आंखों के सामने नाव का निचला हिस्सा, फिर किनारे और पूरा ढांचा तैयार होने लगा।

कई सालों बाद, अपने काम के दौरान, मैंने रॉकेट और मिसाइलें बनाना सीखा। इस इंजीनियरिंग की नींव जटिल गणित और वैज्ञानिक शोध पर टिकी थी। लेकिन समुद्र के किनारे बन रही वह नाव, जो तीर्थयात्रियों और मछुआरों को इधर-उधर ले जाती थी... कौन कह सकता है वह कोई मामूली बात थी? नाव बनने की इस प्रक्रिया ने मेरे जीवन पर एक और तरह से गहरा असर डाला। इसने अहमद जलालुद्दीन को मेरे जीवन में ला दिया। वे मुझसे काफी बड़े थे, फिर भी हमारी दोस्ती हो गई। उन्होंने मेरे अंदर सीखने और सवाल पूछने की गहरी इच्छा को पहचान लिया था। वे हमेशा मेरी बातें धैर्य से सुनते और मुझे सही सलाह देते थे। वे अंग्रेज़ी पढ़ना-लिखना जानते थे और मुझसे वैज्ञानिकों, आविष्कारों, साहित्य और चिकित्सा के बारे में बात करते थे। रामेश्वरम की गलियों में, समुद्र के किनारे, या उस नाव के पास- जो धीरे-धीरे आकार ले रही थी। उनके साथ टहलते हुए, मेरे मन में नए विचार और महत्वाकांक्षाएं पनपने लगीं। नाव का यह काम बहुत सफल रहा।

नाव में सेनानियों से सुनीं श्रीराम की कहानियां

अब्दुल कलाम को जब भी मौका मिलता वह नाव की सवारी करने पहुंच जाते और यात्रियों से श्रीराम के साहस की कहानियां सुनते। रामेश्वरम से धनुषकोडी की यात्रा में उन्होंने जाना कि कैसे श्रीराम ने अपनी वानर सेना की मदद से लंका तक पुल बनाया; कैसे वे माता सीता को वापस लाए और रामेश्वरम में रुके, ताकि रावण को मारने के पाप का प्रायश्चित कर सकें; और कैसे हनुमान को उत्तर दिशा से एक बड़ा शिवलिंग लाने के लिए भेजा गया, लेकिन जब उन्हें आने में बहुत देर हो गई, तो सीता ने इंतज़ार न करते हुए अपने हाथों से ही एक शिवलिंग बनाया और शिव की पूजा की। ये कहानियां अलग-अलग भाषाओं और रूपों में उनके आस-पास गूंजती रहती थीं, क्योंकि लगभग पूरे भारत से लोग उनकी नाव की सवारी करते थे।

जब दोस्त ने ही दी पिता को सलाह कि कलाम को भेजें बड़े स्कूल

किताब में अब्दुल कलाम ने अपने ‘दोस्त’ के बारे में यूं लिखा है कि अहमद जलालुद्दीन हमारे लिए ताज़ी हवा के झोंके की तरह थे। उन्होंने मिडिल स्कूल तक पढ़ाई की थी, अंग्रेज़ी पढ़-लिख सकते थे और सबसे बढ़कर, जीवन को देखने का उनका नज़रिया व्यापक और खुला था। वे रामेश्वरम के तटों से परे की दुनिया को जानने के लिए उत्सुक रहते थे और बहुत जल्दी हमारे परिवार के रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा बन गए थे। जलालुद्दीन मुझे बहुत पसंद करते थे। वे मेरी जिज्ञासाओं को प्रोत्साहित करते और मेरे सवालों के जवाब तलाशने की पूरी कोशिश करते। मेरे आसपास जो कुछ भी होता था, उसे लेकर मेरे मन में हमेशा सवाल उठते रहते थे– जैसे पक्षी क्यों उड़ते हैं, बारिश कैसे होती है, रेल के इंजन कैसे काम करते हैं और ऐसे ही न जाने कितने सवाल। जलालुद्दीन समझ गए थे कि रामेश्वरम के स्कूल में पढ़ाई करते हुए मैं जल्द ही वहां की शिक्षा की सीमाओं से आगे निकल जाऊंगा। उन्होंने मेरे पिता से चर्चा की कि मुझे रामनाथपुरम भेजना ज़रूरी है, जहां एक बड़ा और बेहतर स्कूल था।

जब बहन ने जेवर गिरवी रख कलाम की इंजीनियरिंग फीस भरी

रामनाथपुरम में स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद अब्दुल कलाम ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए मद्रास (अब चेन्नई) जाने का फैसला किया। उन्हें मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) में दाखिला लेना था। तब तक उनकी बहन ज़ोहरा की शादी जलालुद्दीन से हो चुकी थी। वे दोनों कलाम के सपनों और महत्वाकांक्षाओं के सबसे बड़े समर्थक थे। ज़ोहरा चाहती थीं कि उनका भाई अपने सपनों को पूरा करे और इस सफर में जलालुद्दीन उनके मार्गदर्शक बने रहे। हालांकि, एमआईटी की 600 रुपये की एडमिशन फीस कैसी जुटाई जाए, ये सबसे बड़ा सवाल था। आज भले ही यह रकम बहुत छोटी लगे, लेकिन उस समय अब्दुल कलाम के लिए यह लगभग एक लाख रुपये के बराबर थी। एपीजे कलाम को इस संकट से बाहर निकालने में उनकी बहन और जीजा यानी अहमद जलालुद्दीन ने मदद की। दरअसल, कलाम के माता-पिता ने एक-एक पाई जोड़कर बेटी ज़ोहरा के लिए सोने के कुछ गहने बनवाए थे। ज़ोहरा ने एक पल की भी देर किए बिना यह घोषणा कर दी कि वह अपने गहने साहूकार के पास गिरवी रखकर कलाम के दाखिले पैसा उधार लेंगी। उन्होंने इस बात की भी चिंता नहीं की कि शादीशुदा होने के नाते भविष्य में उनके अपने परिवार को इन गहनों की ज़रूरत पड़ सकती है। अहमद जलालुद्दीन भी इस निर्णय में बराबर के साथी रहे।

इस तरह अब्दुल कलाम जीवन की हर परेशानी से लड़ते हुए आगे बढ़ते रहे और देश की सर्वोच्च कुर्सी तक पहुंचे। अपनी आत्मकथा में उन्होंने अहमद जलालुद्दीन का कई बार जिक्र किया है, जो उनके सबसे बड़े मार्गदर्शक बने।

APJ Abdul kalam biography: डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का करियर ग्राफ

वर्ष / अवधिपद / करियर का पड़ावप्रमुख उपलब्धि
1931जन्म, रामेश्वरम, तमिलनाडु15 अक्टूबर को जन्म हुआ।
1954स्नातक, सेंट जोसेफ कॉलेजभौतिकी में स्नातक की पढ़ाई पूरी की।
1960वैज्ञानिक, DRDOएयरोस्पेस इंजीनियरिंग के बाद वैज्ञानिक करियर की शुरुआत की।
1969ISRO में प्रवेशभारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1980SLV-III परियोजना निदेशकस्वदेशी प्रक्षेपण यान से रोहिणी उपग्रह को कक्षा में स्थापित किया।
1982DRDO में वापसीस्वदेशी निर्देशित मिसाइल कार्यक्रम को आगे बढ़ाया।
1983IGMDP का नेतृत्वअग्नि, पृथ्वी सहित प्रमुख मिसाइलों के विकास में अहम योगदान।
1992–1999रक्षा मंत्री के वैज्ञानिक सलाहकाररक्षा अनुसंधान और रणनीतिक मिसाइल कार्यक्रमों में नेतृत्व।
1997भारत रत्नदेश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मानित।
1998पोखरण-II परमाणु परीक्षणपरमाणु परीक्षणों के समन्वय में प्रमुख वैज्ञानिक भूमिका।
1999–2001प्रधान वैज्ञानिक सलाहकारविज्ञान एवं प्रौद्योगिकी से जुड़ी नीतियों और विकास योजनाओं पर काम।
2001अन्ना विश्वविद्यालय में प्रोफेसरशिक्षा, अनुसंधान और युवाओं को प्रेरित करने पर ध्यान।
2002–2007भारत के 11वें राष्ट्रपतिजनता के राष्ट्रपति (People’s President) के रूप में लोकप्रिय हुए।
2007–2015शिक्षक, लेखक और प्रेरक वक्तायुवाओं को विज्ञान, शिक्षा और राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरित किया।
27 जुलाई 2015निधनव्याख्यान देते समय शिलांग में उनका निधन हुआ।

स्रोत: भारत के राष्ट्रपति का आधिकारिक पोर्टल और DRDO।