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‘वोटरों पर बोझ डालने के बजाय उनके पास जाइए’. दिल्ली SIR पर मुख्य न्यायाधीश नायडू की EC को नसीहत

Delhi SIR: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली मतदाता सूची SIR मामले में चुनाव आयोग से कहा है कि तार्किक विसंगति की वैधता पर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है। कोर्ट ने समयसीमा बढ़ाने और फॉर्म 6-8 को लेकर अहम निर्देश दिए हैं। CJI सूर्यकांत ने कहा कि लोगों पर बोझ डालने के बजाय आयोग को खुद उनके पास पहुंचना चाहिए, क्योंकि रोजगार के लिए लोग अपने पते बदलते रहते हैं।
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भारत

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Pratiksha Gupta

•

Updated: 29 Oct 2026, 9:06 AM IST

Gyanesh Kumar SIR Case

Gyanesh Kumar SIR Case: AI Creative

Delhi Voter List: दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग (ECI) को कड़ी फटकार लगाई है और कई निर्देश दिए हैं। अदालत ने साफ किया है कि मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए 'तार्किक विसंगति' (Logical Discrepancy) को आधार बनाने की वैधता पर अभी उसका फैसला आना बाकी है। साथ ही कोर्ट ने चुनाव आयोग से यह भी कहा कि लोगों पर अपना पता बदलने की जानकारी देने का बोझ डालने के बजाय आयोग को खुद उन तक पहुंचना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि दिल्ली जैसे बड़े शहर में लोग रोजगार के लिए लगातार अपने ठिकाने बदलते रहते हैं। ऐसे में यह मानकर नहीं चला जा सकता कि मतदाता पुराने पते पर ही रह रहा होगा।

'तार्किक विसंगति' के आधार पर नाम काटना सही या गलत?

सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना—इस मामले की सुनवाई कर रही है। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने स्पष्ट किया कि बिहार में एसआईआर (SIR) की वैधता को बरकरार रखते समय यह मुद्दा अदालत के सामने नहीं था।
अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग ने सॉफ्टवेयर के जरिए कुछ पैटर्न तैयार किए हैं, जैसे छह से अधिक भाई-बहन होना, नाम की वर्तनी में अंतर या माता-पिता के साथ आयु में बड़ा अंतर। लेकिन इन तकनीकी विसंगतियों को सीधे तौर पर नाम काटने का आधार बना देना और पहले से वोटर रहे लोगों को दोबारा नए सिरे से फॉर्म 6 भरने के लिए मजबूर करना सही नहीं है। वहीं, जिन लोगों ने दिल्ली के भीतर ही अपना पता बदला है, उन्हें फॉर्म 8 जमा करने की पूरी अनुमति दी जानी चाहिए।

'फॉर्म 6 और फॉर्म 8 को पत्थर की लकीर न समझें'

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने चुनाव आयोग के वकील से कहा कि प्रक्रिया के नाम पर आम जनता को परेशान करना सही नहीं है। उन्होंने कहा कि बिहार SIR में हमने कहा था कि आयोग के पास कुछ अवशिष्ट शक्तियां हैं, लेकिन आप फॉर्म 6 को नहीं छू सकते। फॉर्म 6, 7 और 8 तयशुदा हैं। आप इनमें अपनी मर्जी से मनचाहा बदलाव नहीं कर सकते, हालांकि इनमें कुछ नई जानकारियां जोड़ी जा सकती हैं। कोर्ट ने यह सवाल भी उठाया कि जो नाम साल 2003 की मतदाता सूची में जांचे जा चुके थे, उन्हें इतने साल बाद अचानक 'तार्किक विसंगति' का हवाला देकर दोबारा कैसे खोला जा सकता है? बेंच ने कहा कि पश्चिम बंगाल में इसे एक अंतरिम व्यवस्था के तौर पर अनुमति दी गई थी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि अदालत ने इसकी कानूनी वैधता पर अपनी मुहर लगा दी है।

मुख्य न्यायाधीश की दो टूक, 'लोगों पर बोझ मत डालिए'

दिल्ली में SIR के मुद्दे पर मुख्य न्यायाधीश ने चुनाव आयोग के वकील डी.एस. नायडू से कहा कि दिल्ली जैसे बड़े शहर में लोग रोजगार और काम के लिए लगातार अपना ठिकाना बदलते रहते हैं। ऐसे में यह मानकर नहीं चला जा सकता कि मतदाता सूची में दर्ज पुराने पते पर ही व्यक्ति रह रहा होगा। मुख्य न्यायाधीश ने कहा, 'लोगों पर आपके पास आने का बोझ डालने के बजाय, आप उनके पास जाइए।' इस पर नायडू ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति अपना पता बदलता है, तो उसे इसकी जानकारी देनी होती है, ताकि मतदाता सूची में बदलाव किया जा सके। अगर व्यक्ति ऐसा नहीं करता, तो रिकॉर्ड में उसका पुराना पता ही दर्ज रहता है।

चुनाव आयोग का पक्ष और अगली समयावधि

चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि इस पूरी प्रक्रिया पर विचार किया जाएगा। आयोग ने मौखिक रूप से यह आश्वासन भी दिया कि दावा और आपत्ति फॉर्म जमा करने की 30 अक्टूबर की समयसीमा को बढ़ाया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई दो हफ्ते बाद तय की है। साथ ही, अदालत ने उम्मीद जताई है कि चुनाव आयोग बिना किसी सख्त आदेश के खुद ही जनता हित में तारीखें आगे बढ़ाएगा और इसे एक सतत प्रक्रिया के रूप में चलाएगा ताकि किसी भी वैध मतदाता का नाम सूची से न कटे।