18 अक्टूबर 2026,

रविवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

डीएमके बना रही तीसरे मोर्चे की रणनीति? कांग्रेस के सामने बढ़ी विपक्षी एकता की चुनौती

डीएमके और कांग्रेस के रिश्तों में बढ़ती दूरी के बीच तीसरे मोर्चे की चर्चा तेज है। जानिए कैसे तमिलनाडु की राजनीति और क्षेत्रीय दलों की रणनीति कांग्रेस के नेतृत्व वाले INDIA ब्लॉक के सामने नई चुनौती खड़ी कर सकती है।
2 min read
Google source verification

भारत

•

image

Anurag Animesh

•

Oct 19, 2026

DMK news

डीएमके-कांग्रेस विवाद

DMK: विपक्षी राजनीति में कांग्रेस की अगुवाई वाले इंडिया ब्लॉक के सामने नई चुनौती उभर रही है। तमिलनाडु की द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) अब कांग्रेस के साथ पुराने रिश्तों को दोबारा मजबूत करने के बजाय राष्ट्रीय स्तर पर एक अलग राजनीतिक मंच की संभावनाएं तलाश रही है। इस पहल से विपक्ष की राजनीति में कांग्रेस के वर्चस्व को चुनौती मिल सकती है। साथ ही, ऐसे क्षेत्रीय दलों को नया विकल्प मिल सकता है, जो भारतीय जनता पार्टी का विरोध तो करते हैं, लेकिन कांग्रेस की अगुवाई वाले गठबंधन में अपनी राजनीतिक भूमिका को लेकर सहज नहीं हैं।

दरअसल, परिसीमन विधेयक को लेकर लंबे समय से डीएमके को लेकर अटकलबाजी चल रही है। इस बीच डीएमके सांसद कनिमोझी ने शिवसेना (उद्धव ठाकरे), एनसीपी(शरदचंद्र पवार) और टीएमसी के नेताओं से मुलाकात की। वहीं दो दिन पहले हुई डीएमके की बैठक में पार्टी अध्यक्ष एमके स्टालिन ने अपने पत्ते खोल दिए। उन्होंने केन्द्र सरकार के विरोध का रास्ता चुना है, लेकिन कांग्रेस से अलग होकर तीसरा मोर्चा बनाकर। कांग्रेस से दूरी बनाकर चलने वाले विपक्षी बीजू जनता दल (बीजेडी), आम आदमी पार्टी (आप) और वाईएसआर कांग्रेस जैसे दल डीएमके के साथ खड़े हो सकते हैं।

तमिलनाडु से करवट ले रही राष्ट्रीय सियासत

डीएमके और कांग्रेस के रिश्तों में दरार की बड़ी वजह तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद बदला राजनीतिक समीकरण है। मई में कांग्रेस ने अभिनेता विजय की तमिलगा वेत्री कषगम (टीवीके) को सरकार बनाने के लिए समर्थन दिया और भविष्य के चुनावों में भी उसके साथ रहने का ऐलान किया। टीवीके भी अब इंडिया ब्लॉक में शामिल हो चुकी है। इससे डीएमके ने इंडिया ब्लॉक से दूरी बनाकर नया रास्ता चुना है।

कांग्रेस के सामने दोहरी चुनौती


कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती केवल डीएमके की पहल नहीं, बल्कि विपक्षी राजनीति में अपने नेतृत्व को स्वीकार्य बनाए रखना है। यदि क्षेत्रीय दल कांग्रेस से अलग साझा मंच बनाने लगते हैं, तो संसद में समन्वय, चुनावी गठबंधन और केंद्र सरकार के खिलाफ संयुक्त आंदोलनों में विपक्ष की एकजुटता कमजोर हो सकती है। दूसरी ओर, कांग्रेस के सामने अपने मौजूदा सहयोगियों को साथ रखने की भी चुनौती है।
तीसरे मोर्चे की राह भी आसान नहीं

क्षेत्रीय दलों को साथ लाना और उन्हें लंबे समय तक एकजुट रखना अलग-अलग चुनौतियां हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सामने चेहरा और भाजपा के खिलाफ साझा रणनीति जैसे सवाल किसी भी नए मोर्चे की राह में बाधा बन सकते हैं।