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14 सितंबर हिंदी दिवस: क्यों पाकिस्तान ने हिंदी को दुश्मन की भाषा माना

Hindi Diwas: 1947 के विभाजन के बाद पाकिस्तान में हिंदी को किस तरह शिक्षा, साहित्य और सार्वजनिक जीवन से धीरे-धीरे बाहर किया गया, जबकि विभाजन से पहले लाहौर, रावलपिंडी, कराची और अन्य क्षेत्रों में हिंदी का मजबूत शैक्षिक एवं साहित्यिक आधार था।
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Hindi Ban in Pakistan

पाकिस्तान से गायब होती हिंदी (Photo-IANS)

Hindi Diwas 2026: 14 अगस्त 1947 के बाद पाकिस्तान ने भाषा को जोड़ने का औजार नहीं, काटने की तलवार बना लिया। हिंदी को शत्रु की भाषा घोषित कर स्कूल-कॉलेज, प्रेस और सार्वजनिक जीवन से बाहर कर दिया गया। उसी नीति ने उर्दू को अकेली राष्ट्रभाषा ठहराया। एक ऐसी जुबान को जो न पंजाब की माटी की थी, न सिंध की, न बंगाल की। पूर्वी पाकिस्तान की बहुसंख्यक बांग्ला को दरकिनार किया गया।

1948 में ढाका में जिन्ना का ऐलान हुआ-“राज्य की भाषा उर्दू होगी, कोई और नहीं” और 21 फरवरी 1952 को ढाका यूनिवर्सिटी  की गोलीबारी ने साबित कर दिया कि भाषा पर जबरदस्ती राष्ट्र नहीं बनता, टूटता है। हिंदी के साथ हुआ व्यवहार उसी सोच का पश्चिमी अध्याय था। आज हिंदी दिवस के मौके पर हम वरिष्ठ स्तंभकार विवेक शुक्ला की हाल ही में रिलीज किताब ‘1947 विभाजन के शेष सवाल’ का एक चैप्टर आपके साथ शेयर कर रहे हैं। किताब के इस अंश में विवेक शुक्ला ने पाकिस्तान और हिंदी को लेकर अपनी बात कही है। हम किताब का ये संपादिक अंश ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर रहे हैं।

यशपाल, भीष्म साहनी, कृष्णा सोबती, देवेंद्र सत्यार्थी, उपेंद्रनाथ अश्क और नरेंद्र कोहली समेत दर्जनों हिंदी लेखक बंटवारे से पहले मौजूदा पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के स्कूल-कॉलेजों में हिंदी सीख चुके थे या उन्होंने अपना रचनाकर्म वहीं शुरू कर दिया था। लाहौर तब पंजाब की सांस्कृतिक राजधानी था। 1947 तक वहां कई हिंदी प्रकाशन सक्रिय थे और हिंदी के प्रसार-प्रचार के लिए कई संस्थाएं जुटी हुई थीं। धर्मपुरा स्थित हिंदी प्रचारिणी सभा का योगदान इनमें कभी भुलाया नहीं जा सकता।

पाकिस्तान बनते ही लाहौर से निकलने वाले हिंदी प्रकाशन बंद हो गए। उस दौर में पंजाब में उर्दू और पंजाबी का वर्चस्व अवश्य था, पर हिंदी ने अपने लिए जगह बना रखी थी। लाहौर से ‘आर्य गजट’, ‘प्रकाश’ और ‘अमर भारत’ जैसे हिंदी अखबार निकलते थे। इनकी प्रसार संख्या हजारों में थी। बंटवारे के बाद स्कूल-कॉलेजों में हिंदी की कक्षाएं समाप्त हो गईं। लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज, फोरमैन क्रिश्चियन कॉलेज, खालसा कॉलेज, दयाल सिंह कॉलेज और डीएवी कॉलेज में हिंदी स्नातकोत्तर स्तर तक पढ़ाई जाती थी। रावलपिंडी के डीएवी कॉलेज और गॉर्डन कॉलेज में भी हिंदी पढ़ी-पढ़ाई जा रही थी।

‘दिनमान’ और ‘संडे मेल’ के संपादक त्रिलोक दीप ने हिंदी रावलपिंडी के अपने स्कूल में सीखी थी। गॉर्डन कॉलेज की वार्षिक पत्रिका में हिंदी का अलग सेक्शन होता था। रावलपिंडी में रहकर ही बलराज साहनी, भीष्म साहनी और हिंदी फिल्मों के गीतकार आनंद बख्शी ने हिंदी जानी-समझी। मार्च 1947 के रावलपिंडी दंगों की पृष्ठभूमि पर भीष्म साहनी ने ‘तमस’ लिखा। यह उपन्यास कुल पांच दिनों की कथा है, पर उसके प्रसंग उसे बीसवीं सदी के लगभग सौ वर्षों की कहानी बना देते हैं। उनकी कहानी ‘अमृतसर आ गया है’ भी विभाजन की पृष्ठभूमि पर बेजोड़ है। रावलपिंडी के गॉर्डन कॉलेज में पढ़ते हुए मेरे पिता श्री गोपाल कृष्ण शुक्ला ने हिंदी पढ़ी थी। वे उसी कॉलेज पत्रिका के हिन्दी सेक्शन के संपादक भी रहे।

हिंदी की पढ़ाई बड़े शहरों तक सीमित नहीं थी। डेरा इस्माइल खान जैसे छोटे शहरों में भी यह चल रही थी। यह क्षेत्र अब खैबर पख्तूनख्वा में आता है। पाकिस्तान से आए हिंदी रचनाकारों की भाषा में उर्दू और पंजाबी का मिश्रण स्वाभाविक था। उन्होंने ‘किंतु-परंतु’ की जगह ‘अगर-मगर’ लिखने से परहेज नहीं किया। सिंध की राजधानी कराची, बलूचिस्तान और अन्य भागों में भी हिंदी पढ़ी-लिखी जा रही थी। हिंदू परिवारों की महिलाएँ घर बैठे ही हिंदी का अध्ययन कर लेती थीं। पाकिस्तान बनने के साथ ये सुविधाएं भी समाप्त हो गईं। कराची विश्वविद्यालय का हिंदी विभाग कभी समृद्ध हुआ करता था। यह बात समझ से परे है कि हिंदी को समाप्त करने के उस अभियान पर वहाँ के बुद्धिजीवी तबके में अभी तक गहराई से अध्ययन क्यों नहीं हुआ।

पाकिस्तान 1947 में दो भागों में बंटा था-पश्चिमी पाकिस्तान और पूर्वी बंगाल। 1947 में पूरे पाकिस्तान की आधी से अधिक जनता की मातृभाषा बांग्ला थी। इसके बावजूद केंद्र ने उर्दू थोप दी। पूर्वी बंगाल में यह ऐलान आग बन गया। छात्रों ने बांग्ला को राज्य भाषा बनाने की माँग की। जनवरी 1952 में संविधान सभा की बेसिक प्रिंसिपल्स कमेटी ने फिर केवल उर्दू की सिफारिश की। 21 फरवरी 1952 को ढाका विश्वविद्यालय के छात्रों ने धारा 144 तोड़कर जुलूस निकाला। पुलिस की गोली से सलाम, बरकत, रफीक, जब्बार समेत कई युवा मारे गए। वही दिन बाद में अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस बना।

1956 के संविधान में बांग्ला को भी राज्य भाषा का दर्जा मिला, पर घाव भर नहीं सका। भाषा पर पश्चिम का दबाव पूर्वी पाकिस्तान की राजनीतिक और आर्थिक उपेक्षा से जुड़ गया और 1971 के विभाजन तक पहुंचा। एक भाषा थोपकर राष्ट्र जोड़ने की कोशिश ने उलटा देश तोड़ दिया। हिंदी के साथ भी वही मानसिकता काम कर रही थी। उसे भारतीय और हिंदू से जोड़कर दुश्मन करार दे दिया गया, जबकि वह भी उपमहाद्वीप की साझा सांस्कृतिक पूंजी थी।

भारत में भी भाषा को लेकर कई आंदोलन चल चुके हैं। भाषा बेहद भावनात्मक मुद्दा है। किसी व्यक्ति से लेकर सरकार तक को इसे विवाद की स्थिति में बहुत सोच-समझकर सुलझाना चाहिए। भाषा का संबंध जाति, धर्म या ओहदे से नहीं होता। सियासी कारणों से जब भी इस मसले से खिलवाड़ हुआ, हालात बद से बदतर हुए।

इस बीच सिंध के हिंदुओं में हिंदी जानने-समझने की दिलचस्पी पैदा हो रही है। वे बड़े-बुजुर्गों से हिंदी सीख रहे हैं। चाहत कम से कम इतनी हिंदी जानने की है कि धार्मिक पुस्तकें पढ़ सकें।

कराची में रहने वाले चंदर कुमार एमबीए हैं और एक एनजीओ से जुड़े हैं। वे सिंध के हिंदुओं के एक जत्थे के साथ दिल्ली आए थे। उन्होंने बताया कि स्कूल-कॉलेजों में हिंदी पढ़ाने की कोई व्यवस्था नहीं है। फिर भी विभाजन के बाद वहां रह गए हिंदी जानने वालों ने अगली पीढ़ियों को हिंदी सिखाई।

वरिष्ठ कथाकार प्रो. प्रताप सहगल कहते हैं कि संबंध सुधरें तो भारत से हिंदी शिक्षक पाकिस्तान के विश्वविद्यालयों में पढ़ाने जाएं और वहां के छात्रों को यहां आने की इजाजत हो। लेखक नज़र अब्बास कहते हैं कि सिंध में उत्तर प्रदेश और बिहार से बसे लोग भी हिंदुओं को हिंदी पढ़ा देते हैं।

चंदर कुमार के अनुसार कम से कम मिडिल क्लास के हिंदू हिंदी सीखते हैं। उनकी मातृभाषा हिंदी नहीं है, फिर भी वे इससे भावनात्मक रूप से जुड़ते हैं।

पाकिस्तानियों की बोलचाल में हिंदी शब्द अब खूब आ रहे हैं। हिंदी फिल्में और टीवी सीरियल इसका बड़ा कारण हैं। एक दौर में लाहौर हिंदी का गढ़ था। वहाँ राजपाल एंड संस जैसे बड़े प्रकाशन भी थे। इस्लामाबाद स्थित नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ मॉडर्न लैंग्वेजेज में हिंदी में डिप्लोमा से लेकर पीएचडी तक की सुविधा है। यानी पाकिस्तान में हिंदी की यह छोटी-सी खिड़की अभी भी खुली हुई है।