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जब दिल्ली जल उठी: इंदिरा गांधी की हत्या के बाद के 72 घंटे, कैसे राजधानी में भड़की हिंसा ने बदल दिया देश का इतिहास

31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में हिंसा भड़क उठी थी। जानें उन 72 घंटों में क्या हुआ, कैसे 2,733 लोगों की जान गई और जांच में क्या सामने आया।
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भारत

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Anurag Animesh

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Updated: 31 Oct 2026, 9:00 AM IST

Indira Gandhi Death

(AI Image-ChatGpt)

Indira Gandhi Assassination 1984: 31 अक्टूबर 1984 की सुबह प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया था। लेकिन इस हत्या के बाद दिल्ली में जो हुआ, वह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास के सबसे दर्दनाक अध्यायों में शामिल हो गया। अगले कुछ दिनों में राजधानी के कई इलाकों में सिख समुदाय को निशाना बनाया गया। घरों और दुकानों में आग लगाई गई, लोगों पर हमले हुए और बड़ी संख्या में निर्दोष नागरिकों की जान चली गई।इंदिरा गांधी की हत्या उनके दो सिख अंगरक्षकों बेअंत सिंह और सतवंत सिंह ने की थी। इसके बाद फैली हिंसा में हजारों सिख प्रभावित हुए। दिल्ली में ही आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 2,733 लोगों की मौत हुई थी। यह केवल सांप्रदायिक हिंसा की कहानी नहीं थी, बल्कि प्रशासनिक विफलता, राजनीतिक जवाबदेही और न्याय की लंबी लड़ाई का भी इतिहास है।

31 अक्टूबर 1984: प्रधानमंत्री की हत्या और राजधानी में तनाव


31 अक्टूबर 1984 को सुबह करीब 9:20 बजे इंदिरा गांधी अपने आवास से प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर जा रही थीं। इसी दौरान उनके दो सिख अंगरक्षकों बेअंत सिंह और सतवंत सिंह ने उन पर गोलियां चला दीं। उन्हें तुरंत अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) ले जाया गया, जहां उसी दिन उनकी मौत हो गई। इस हत्या के पीछे जून 1984 में हुए ऑपरेशन ब्लू स्टार की पृष्ठभूमि थी। इस सैन्य अभियान में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर परिसर से सशस्त्र उग्रवादियों को निकालने के लिए सेना भेजी गई थी।

इंदिरा गांधी की हत्या की खबर फैलते ही दिल्ली में तनाव बढ़ने लगा। उसी शाम कुछ इलाकों में सिखों के घरों और दुकानों पर हमले शुरू हो गए। न्यायमूर्ति जीटी नानावटी आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली में हिंसा की शुरुआत 31 अक्टूबर की शाम हुई। अगले दो दिन हालात सबसे ज्यादा गंभीर रहे।

इसी दिन राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। देश एक तरफ प्रधानमंत्री की हत्या से सदमे में था, तो दूसरी तरफ राजधानी में सिख समुदाय के खिलाफ हिंसा का खतरा तेजी से बढ़ रहा था।

1 नवंबर: अफवाहों के बीच हिंसा का फैलाव


1 नवंबर की सुबह दिल्ली के कई इलाकों में हालात बेकाबू होने लगे। भीड़ ने सिखों के घरों, दुकानों और धार्मिक स्थलों को निशाना बनाया। कई जगह लूटपाट के बाद आग लगा दी गई। सिख पुरुषों को घरों से बाहर निकालकर पीटने और जिंदा जलाने की घटनाएं सामने आईं। हिंसा के दौरान अफवाहों ने भी आग में घी डालने का काम किया। सिखों पर इंदिरा गांधी की हत्या का जश्न मनाने और पानी में जहर मिलाने जैसे झूठे आरोप फैलाए गए। इन अफवाहों ने पहले से तनावपूर्ण माहौल को और भड़काया।

दिल्ली के त्रिलोकपुरी, सुल्तानपुरी, मंगोलपुरी, पालम कॉलोनी और अन्य इलाकों में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई। कई परिवारों ने गुरुद्वारों और सुरक्षित माने जाने वाले स्थानों में शरण ली। कुछ लोग अपने घर छोड़कर राहत शिविरों की ओर जाने को मजबूर हुए। इस दिन सेना को दिल्ली में तैनात किया गया, लेकिन अलग-अलग इलाकों में हिंसा रोकने के लिए उसकी प्रभावी तैनाती और कार्रवाई को लेकर सवाल उठे।

2 नवंबर: हिंसा का सबसे भयावह दौर


2 नवंबर को भी राजधानी के कई हिस्सों में हिंसा जारी रही। भीड़ सिख परिवारों को निशाना बना रही थी। घरों और दुकानों को जलाने के साथ गुरुद्वारों पर भी हमले किए गए। कई जगह लोगों को बचने के लिए छतों, पड़ोसियों के घरों और धार्मिक स्थलों में छिपना पड़ा। हिंसा का एक भयावह पहलू रेलवे स्टेशनों पर भी दिखाई दिया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित विशेष जांच दल (SIT) की जांच में सामने आया कि 1 और 2 नवंबर को दिल्ली के पांच रेलवे स्टेशनों- नांगलोई, किशनगंज, दयाबस्ती, शाहदरा और तुगलकाबाद पर सिख यात्रियों को ट्रेनों से बाहर खींचकर पीटा गया और उनकी हत्या की गई। जांच दल ने पुलिस की कार्रवाई पर भी गंभीर सवाल उठाए।

इस दौरान पुलिस की भूमिका भी विवादों में रही। कई पीड़ितों ने आरोप लगाया कि पुलिस ने समय पर मदद नहीं की। कुछ मामलों में शिकायतें दर्ज करने और आरोपियों की पहचान करने में भी लापरवाही बरती गई। बाद में नानावटी आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि कई जगह हमले व्यवस्थित तरीके से किए गए और हमलावरों को पुलिस से ज्यादा डर नहीं था।

3 नवंबर: सेना की प्रभावी तैनाती के बाद हालात सुधरने लगे


3 नवंबर तक हिंसा का असर राजधानी के कई इलाकों में दिखाई दे रहा था। सेना की तैनाती और सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किए जाने के बाद हालात धीरे-धीरे सुधरने लगे। नानावटी आयोग के मुताबिक, हिंसा की घटनाएं 5 नवंबर तक जारी रहीं, लेकिन 3 नवंबर से स्थिति में सुधार शुरू हो गया था।

इस बीच हजारों लोग अपने घर छोड़ चुके थे। कई परिवारों के पुरुष सदस्य मारे गए थे और पीछे महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग रह गए थे। लोगों को राहत शिविरों में शरण लेनी पड़ी। जिन परिवारों के घर और कारोबार जला दिए गए थे, उनके सामने जीवन दोबारा शुरू करने की चुनौती थी।

दिल्ली में 2,733 लोगों की मौत, देशभर में 3,325 जानें गईं


1984 की हिंसा में मारे गए लोगों की संख्या को लेकर सरकारी रिकॉर्ड में स्पष्ट आंकड़े मौजूद हैं। गृह मंत्रालय ने 2015 में संसद में दी गई जानकारी में बताया था कि देशभर में 3,325 लोगों की मौत हुई थी। इनमें से 2,733 मौतें अकेले दिल्ली में दर्ज की गई थीं। ये आंकड़े आरके आहूजा समिति की रिपोर्ट पर आधारित थे।

दिल्ली में हिंसा के बाद जांच और जवाबदेही की प्रक्रिया भी लंबी चली। 1985 में न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्रा आयोग गठित किया गया। बाद में 2000 में न्यायमूर्ति जीटी नानावटी आयोग बनाया गया, जिसने फरवरी 2005 में अपनी रिपोर्ट सौंपी। आयोग ने पुलिस की जांच में कमियों और कुछ मामलों में राजनीतिक लोगों की संभावित भूमिका को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं।

ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक, दिल्ली पुलिस ने हिंसा के दौरान हुई 2,733 मौतों के मामलों में केवल 587 एफआईआर दर्ज की थीं। इनमें से 241 मामलों को जांच के बिना बंद कर दिया गया था। बाद में कुछ मामलों को दोबारा खोला गया।

72 घंटे, जिनके सवाल आज भी बाकी हैं


31 अक्टूबर से 3 नवंबर 1984 के बीच के 72 घंटे भारतीय इतिहास में केवल एक प्रधानमंत्री की हत्या के बाद फैली हिंसा के रूप में याद नहीं किए जाते। ये वे दिन थे, जब राजधानी में हजारों नागरिकों की सुरक्षा खतरे में पड़ गई थी और सिख समुदाय को बड़े पैमाने पर निशाना बनाया गया।

इस घटना ने पुलिस की जवाबदेही, प्रशासन की तैयारी, राजनीतिक जिम्मेदारी और न्यायिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए। हिंसा के पीड़ितों और उनके परिवारों को न्याय मिलने में दशकों लगे। कई मामलों में जांच और मुकदमे लंबे समय तक चलते रहे।

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