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माधवराव सिंधिया: सोनिया गांधी के करीबी नेता, जिनके PM बनने की थी चर्चा; विमान हादसे ने थाम दिया राजनीतिक सफर

Sonia Gandhi: अटल बिहारी वाजपेयी को हराने से लेकर सोनिया गांधी के करीबी बनने और प्रधानमंत्री पद की चर्चा तक, जानिए माधवराव सिंधिया की पूरी राजनीतिक कहानी और वह विमान हादसा जिसने 25 साल पहले उनका सफर खत्म कर दिया।
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भारत

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Pratiksha Gupta

•

Sep 30, 2026

Madhavrao Scindia PM

माधवराव सिंधिया और सोनिया गांधी

Madhavrao Scindia Biography: राजनीति की बिसात पर अक्सर कहा जाता है कि किस्मत से ज्यादा और वक्त से पहले किसी को कुछ नहीं मिलता। भारतीय राजनीति में यह कहावत ग्वालियर के पूर्व राजघराने के वारिस और कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे माधवराव सिंधिया पर सटीक बैठती है। ग्वालियर के राजघराने से आने वाले सिंधिया ने चुनावी राजनीति में कदम रखा, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे दिग्गज नेता को हराया और सोनिया गांधी के भरोसेमंद संसदीय सहयोगी बने। 30 सितंबर 2001 को एक विमान हादसे में 56 साल की उम्र में उनकी मौत ने उनका राजनीतिक सफर अचानक खत्म कर दिया। आज उनके निधन के 25 साल बाद भी राजनीतिक गलियारों में यह सवाल गूंजता है अगर माधवराव सिंधिया जीवित होते, तो क्या 2004 में मनमोहन सिंह की जगह वे देश के प्रधानमंत्री बनते?

26 की उम्र में संसद पहुंचे, फिर कभी नहीं हारे चुनाव

26 मार्च 1945 को जन्मे माधवराव सिंधिया की पढ़ाई ग्वालियर के मशहूर सिंधिया स्कूल और फिर ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से हुई। राजशाही की तमाम सुख-सुविधाएं होने के बावजूद उन्होंने बेहद कम उम्र में लोकतांत्रिक राजनीति का कठिन रास्ता चुना। वर्ष 1971 में महज 26 साल की उम्र में उन्होंने पहला लोकसभा चुनाव जीता। इसके बाद उन्होंने लगातार 9 बार संसद का चुनाव जीता और अपने पूरे जीवन में कभी लोकसभा चुनाव नहीं हारे। 1971 में जनसंघ के समर्थन से जीतने के बाद, 1977 में वे कांग्रेस में शामिल हो गए। उनकी मां विजयाराजे सिंधिया जनसंघ और भाजपा के बड़े नेताओं में शामिल थी, लेकिन माधवराव ने अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाई।

जब अटल बिहारी वाजपेयी को दी शिकस्त

1984 के लोकसभा चुनाव की वह घटना आज भी भारतीय राजनीति में याद की जाती है। कांग्रेस ने आखिरी वक्त में माधवराव सिंधिया को ग्वालियर से भाजपा के दिग्गज नेता अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ मैदान में उतार दिया। बताया जाता है कि जब राजमाता विजयाराजे सिंधिया से पूछा गया कि वे इस चुनाव में बेटे का साथ देंगी या वाजपेयी का, तो उन्होंने हंसकर कहा था कि दोनों ही मेरे बेटे हैं। इस बयान को सिंधिया के पक्ष में देखा गया और माधवराव ने यह मुकाबला करीब 1.75 लाख वोटों के भारी अंतर से जीत लिया।

रेल मंत्री बनकर चलाई 'शताब्दी एक्सप्रेस'

माधवराव केवल एक लोकप्रिय जननेता ही नहीं, बल्कि एक कुशल प्रशासक भी थे। 1984 में राजीव गांधी के मंत्रिमंडल में रेल मंत्री रहते हुए उन्होंने भारतीय रेलवे के कंप्यूटरीकरण और आधुनिकीकरण की नींव रखी। शताब्दी एक्सप्रेस जैसी ट्रेनों की शुरुआत उन्हीं के दौर में हुई। इसके बाद उन्होंने पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार में नागरिक उड्डयन और मानव संसाधन विकास मंत्री के रूप में कार्य किया। जब एक विमान दुर्घटना हुई, तो उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए नागरिक उड्डयन मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था, जो उनकी नैतिक राजनीति का प्रमाण था।

सोनिया गांधी के लिए संसद में सबसे भरोसेमंद चेहरा थे सिंधिया

1998 में जब सोनिया गांधी ने कांग्रेस की कमान संभाली, तब उन्हें संसदीय प्रक्रियाओं और भारतीय राजनीति की बारीकियों में मार्गदर्शन के लिए एक मजबूत सहयोगी की जरूरत थी। माधवराव सिंधिया उनके सबसे करीबी और भरोसेमंद सलाहकार बनकर उभरे।
प्रसिद्ध पत्रकार और लेखक राशिद किदवई की किताब 'द हाउस ऑफ सिंधियाज' के अनुसार, सिंधिया का सोनिया गांधी के साथ एक अनूठा तालमेल था। वे पार्टी के उन गिने-चुने नेताओं में थे, जो निजी बातचीत में सोनिया गांधी को नाम से पुकारते थे और दोनों के बीच पारिवारिक आत्मीयता थी। संसद के भीतर विपक्ष के हमलों का जवाब देना हो, वामदलों और मुलायम सिंह यादव जैसे अन्य दलों से तालमेल बैठाना हो या बहस की कमान संभालना सिंधिया सोनिया गांधी की सबसे बड़ी ताकत थे।

मनमोहन सिंह से ज्यादा लोकप्रियता का दावा, PM पद पर भी थी चर्चा

2001 में अगस्त के आखिरी हफ्ते में फ्रंटलाइन मैगजीन से बात करते हुए जब सिंधिया से एनडीए सरकार की अनिश्चितता और कांग्रेस के भविष्य पर पूछा गया था, तो उन्होंने आत्मविश्वास से कहा था कि यूपी चुनावों तक इंतजार कीजिए, चीजें बदल जाएंगी।
चीजें बदली जरूर, लेकिन 30 सितंबर 2001 को मैनपुरी (यूपी) के पास हुए प्लेन क्रैश में उनकी मौत हो गई। वरिष्ठ पूर्व राजनयिक और राजनेता के. नटवर सिंह ने एक इंटरव्यू में स्पष्ट कहा था कि अगर माधवराव सिंधिया जीवित रहते, तो 2004 में वही देश के प्रधानमंत्री होते।
माधवराव सिंधिया कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) के चुनाव बिना किसी अनौपचारिक गुटबाजी के भारी वोटों से जीतते थे। जन-जनाधार के मामले में वे डॉ. मनमोहन सिंह से कहीं आगे थे। हालांकि, खुद माधवराव जब भी पीएम पद की बात आती तो बेहद सादगी से कहते थे, 'मैं प्रधानमंत्री बनने जितना चालाक नेता नहीं हूं।'

माधवराव सिंधिया के जाने से कांग्रेस में छूटा बड़ा खालीपन

माधवराव सिंधिया और उनके समकालीन राजेश पायलट के असमय निधन ने कांग्रेस की उस 'नर्सरी' को खत्म कर दिया, जो जमीनी और जनाधार वाले राष्ट्रीय नेताओं को तैयार करती थी। आज उनके बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा सरकार में केंद्रीय मंत्री हैं, लेकिन माधवराव सिंधिया की विरासत आज भी भारतीय राजनीति में एक शालीन, विकासवादी और धर्मनिरपेक्ष नेता के रूप में याद की जाती है।