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मैहर के मां शारदा मंदिर की कहानी, सुनहरी गाय और राजा के सपने से जुड़ी है मान्यता

मैहर के मां शारदा मंदिर का इतिहास सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताओं और लोककथाओं से जुड़ा है। जानें देवी सती के हार की कथा, आल्हा की 12 साल की तपस्या, सुनहरी गाय से जुड़ी कहानी, प्राचीन प्रतिमा की मान्यता और शारदीय नवरात्र में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के बारे में।
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Maihar Maa Sharda Temple

मैहर मां शारदा मंदिर

Maihar Maa Sharda Temple: मैहर का मां शारदा मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सदियों पुरानी आस्था, पौराणिक मान्यताओं और वीर आल्हा-ऊदल की लोकगाथाओं का केंद्र भी है। त्रिकूट पर्वत पर करीब 600 फीट ऊंचाई पर विराजीं मां शारदा के दर्शन के लिए श्रद्धालु सालभर पहुंचते हैं। शारदीय और चैत्र नवरात्र में आस्था का मेला लगता है। मान्यता है कि यह स्थान 51 शक्तिपीठों में है। मंदिर की पहचान मां के दर्शन के साथ उस इतिहास से भी जुड़ी है, जिसमें देवी सती के हार के गिरने, आल्हा की कठोर तपस्या और प्राचीन प्रतिमा की स्थापना की कथाएं पीढिय़ों से सुनाई जाती रही हैं।

पुजारी दीपक पांडेय बताते हैं कि पौराणिक कथा के अनुसार देवी सती के देह त्याग के बाद भगवान शिव उनके शरीर को लेकर शोक में विचरण कर रहे थे। मान्यता है कि इसी दौरान देवी सती का हार त्रिकूट पर्वत पर गिरा था। इसी वजह से इस स्थान को माई का हार कहा जाने लगा, जो कालांतर में मैहर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। मंदिर को शक्तिपीठ के रूप में भी श्रद्धा के साथ देखा जाता है। शक्तिपीठों की अलग-अलग धार्मिक सूचियों में स्थानों की संख्या और नामों में अंतर मिलता है।

आल्हा ने 12 वर्ष की थी तपस्या


मैहर की धार्मिक मान्यताओं में बुंदेलखंड के वीर योद्धा आल्हा और ऊदल का विशेष स्थान है। लोकमान्यता है कि आल्हा ने त्रिकूट पर्वत पर 12 वर्षों तक मां शारदा की तपस्या की थी। वे मां को शारदा माई कहकर पुकारते थे। जनश्रुति के अनुसार, उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर मां ने उन्हें अमरत्व का वरदान दिया था। यह भी मान्यता है कि आल्हा आज भी मां के दर्शन करने आते हैं और मंदिर में सबसे पहले पूजा करते हैं। हालांकि, यह लोकविश्वास है, जिसका स्वतंत्र ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। मंदिर के आस-पास स्थित आल्हा तालाब और अखाड़ा इस वीरगाथा से जुड़े प्रमुख स्थल माने जाते हैं।

सुनहरी गाय के पीछे गुफा तक पहुंचा था ग्वाला


मां शारदा के प्राकट्य से जुड़ी एक प्रचलित लोककथा तत्कालीन राजा दुर्जन सिंह जूदेव के समय की बताई जाती है। एक ग्वाला जंगल में गायें चराने जाता था। एक दिन उसने अपने झुंड में सुनहरी गाय देखी, जो शाम होते ही गायब हो जाती थी। लगातार ऐसा होने पर उसने गाय का पीछा किया। मान्यता है कि गाय पहाड़ी की चोटी पर स्थित गुफा में चली गई। वहां प्रतीक्षा करते ग्वाले को एक वृद्ध महिला के दर्शन हुए। ग्वाले ने उनसे अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए कुछ मांगा। कथा के अनुसार, वृद्धा ने उसे जौ के दाने दिए, जो घर पहुंचने पर हीरे-मोती बन गए। ग्वाले ने यह घटना राजा को बताई। मान्यता है कि उसी रात राजा को स्वप्न में मां शारदा के दर्शन हुए।

प्राचीन प्रतिमा से जुड़ा है मंदिर का इतिहास


मां शारदा मंदिर की प्राचीनता को लेकर विक्रम संवत 559 में प्रतिमा की स्थापना का उल्लेख मिलता है, यह संवत लगभग 502 ईस्वी के आस-पास बैठता है। हालांकि, प्रतिमा की स्थापना और वर्तमान मंदिर भवन के निर्माण की तिथि अलग-अलग हो सकती है। एक अन्य धार्मिक मान्यता के अनुसार, आदि गुरु शंकराचार्य ने भी यहां पूजा-अर्चना की थी। मंदिर के विकास में मैहर रियासत के राजपरिवार के योगदान का भी उल्लेख मिलता है।

10-12 लाख की भीड़ आने का अनुमान


शारदीय नवरात्र में मां शारदा के दर्शन के लिए देशभर से श्रद्धालु मैहर पहुंचते हैं। इस वर्ष करीब 10 से 12 लाख श्रद्धालुओं के आने का अनुमान है। सुबह 3 बजे मंदिर के पट खुलेंगे। 4 बजे से दर्शन का सिलसिला शुरू होगा, जो रात 10 बजे तक चलेगा। षष्ठी से नवमी तक मां के सोलह शृंगार की परंपरा निभाई जाती है। पर्वत पर स्थित मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालु सीढिय़ों और उपलब्ध अन्य साधनों का सहारा लेते हैं।