
NRC Demand in Manipur: मणिपुर में पहले NRC या Census? छात्रों के प्रदर्शन से 3 दिन स्कूल बंद (फोटो सोर्स:@meiteiheritage)
Manipur Census 2027: मणिपुर में जनगणना 2027 अब सिर्फ आंकड़े जुटाने की कवायद नहीं रह गई है, बल्कि यह पहचान, आबादी और भविष्य की राजनीतिक हिस्सेदारी से जुड़ा बड़ा मुद्दा बनती जा रही है। NRC को पहले लागू करने की मांग को लेकर इम्फाल में छात्रों और नागरिक संगठनों का विरोध तेज होने के बाद सरकार ने शैक्षणिक संस्थानों को तीन दिनों के लिए बंद करने का फैसला लिया है। इससे साफ है कि जनगणना को लेकर राज्य में प्रशासनिक प्रक्रिया और जमीनी असंतोष आमने-सामने आ गए हैं।
मणिपुर में इस समय सबसे बड़ा सवाल यही है कि पहले जनगणना होगी या उससे पहले नागरिकों का रजिस्टर तैयार किया जाएगा। Campaign for Just and Fair Delimitation यानी JFD और उससे जुड़े संगठनों का कहना है कि राज्य में Census 2027 की प्रक्रिया आगे बढ़ाने से पहले National Register of Citizens (NRC) को अपडेट किया जाना चाहिए।
आंदोलनकारी 1951 को आधार वर्ष मानकर NRC तैयार करने की मांग कर रहे हैं। उनका तर्क है कि इससे राज्य में रहने वाले वास्तविक नागरिकों की पहचान स्पष्ट होगी और उसके बाद होने वाली जनगणना के आंकड़े ज्यादा विश्वसनीय होंगे।
यही मांग अब सड़कों से निकलकर स्कूल-कॉलेजों तक पहुंच गई है। छात्रों के प्रदर्शन और लगातार बढ़ते तनाव को देखते हुए मणिपुर सरकार ने 20 से 22 अगस्त तक शैक्षणिक संस्थानों को बंद रखने का आदेश दिया है।
इंफाल में बड़ी संख्या में छात्र NRC की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। इससे पहले भी छात्र समूहों ने मानव श्रृंखला बनाकर जनगणना से पहले NRC लागू करने की मांग उठाई थी। कई प्रदर्शनकारियों के हाथों में ऐसे पोस्टर थे, जिनमें जनगणना से पहले नागरिकता संबंधी रिकॉर्ड स्पष्ट करने की बात कही गई थी।
आंदोलन की तीव्रता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि 14 अगस्त को बिष्णुपुर जिले में Census कर्मियों के प्रशिक्षण कार्यक्रम को प्रदर्शनकारियों ने बाधित कर दिया था। मोइरांग कॉलेज में प्रशिक्षण शुरू होने से पहले ही प्रदर्शनकारियों के पहुंचने के बाद प्रशिक्षुओं को परिसर से बाहर जाना पड़ा।
JFD ने NRC की मांग को लेकर 48 घंटे के बंद का आह्वान किया। इसका असर खास तौर पर मेइती-बहुल इम्फाल घाटी में दिखाई दिया। कई बाजार बंद रहे, सड़कों पर आवाजाही प्रभावित हुई और सरकारी कार्यालयों के बहिष्कार की अपील की गई।
कुछ इलाकों में बंद का उल्लंघन करने वाली सब्जी दुकानों में तोड़फोड़ की घटनाएं भी सामने आईं। संवेदनशील स्थानों पर सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ाई गई ताकि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान और हिंसा की स्थिति को रोका जा सके।
मामला अब राज्य की सीमाओं से बाहर भी पहुंच चुका है। विभिन्न समुदायों और नागरिक संगठनों का प्रतिनिधित्व करने वाला 10 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल दिल्ली रवाना हुआ है। इसका उद्देश्य केंद्र सरकार, केंद्रीय मंत्रियों और भाजपा नेताओं के सामने NRC से जुड़ी मांग रखना है।
इसके अलावा सत्तारूढ़ गठबंधन के विधायक भी दिल्ली पहुंचकर इसी मुद्दे पर केंद्र के समक्ष अपनी बात रखने की तैयारी में हैं। यानी NRC को लेकर दबाव अब सिर्फ सामाजिक संगठनों तक सीमित नहीं है, बल्कि राजनीतिक स्तर पर भी तेज हो रहा है।
Census 2027 की प्रक्रिया को लेकर मणिपुर में समय बेहद महत्वपूर्ण है। केंद्र की अधिसूचना के मुताबिक देश के अलग-अलग राज्यों में 2026 के दौरान 30 दिनों की अवधि में हाउस-लिस्टिंग ऑपरेशन कराया जाना है। मणिपुर में हाउस-लिस्टिंग 1 से 30 सितंबर के बीच प्रस्तावित है, जबकि सेल्फ-एन्यूमरेशन की सुविधा 17 से 31 अगस्त तक रखी गई है।
यही वजह है कि प्रदर्शनकारी अब तत्काल फैसला चाहते हैं। उनका कहना है कि अगर जनगणना का डेटा तैयार हो गया और बाद में परिसीमन इसी आधार पर हुआ तो राज्य की राजनीतिक तस्वीर पर उसका दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है।
मणिपुर में NRC की मांग को समझने के लिए परिसीमन यानी Delimitation के सवाल को समझना जरूरी है। परिसीमन का सीधा संबंध जनसंख्या के आंकड़ों से होता है और इसी कारण आंदोलनकारी जनगणना को महज प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं मान रहे।
मणिपुर विधानसभा ने अगस्त 2022 में NRC और State Population Commission से संबंधित प्रस्ताव पारित किया था। विधानसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड में मार्च 2024 में NRC लागू करने से जुड़ा एक और प्रस्ताव भी दर्ज है।
आंदोलनकारियों का कहना है कि यदि नागरिकों की पहचान और आबादी से जुड़े विवाद सुलझाए बिना नए आंकड़े तैयार किए गए, तो भविष्य के परिसीमन पर उसका असर पड़ सकता है।
NRC का सवाल मणिपुर में बेहद संवेदनशील है। मेइती समुदाय से जुड़े कई संगठन पड़ोसी देशों से कथित रूप से आए अवैध प्रवासियों की पहचान की मांग करते रहे हैं। उनका कहना है कि 1951 को आधार वर्ष बनाकर नागरिकों की पहचान की जानी चाहिए।
दूसरी ओर, कुकी संगठनों ने इस तरह की मांगों को लेकर चिंता जताई है। उनका आरोप है कि NRC की बहस के नाम पर पूरे कुकी समुदाय को संदिग्ध प्रवासी के रूप में पेश करने की कोशिश नहीं होनी चाहिए।
यही विरोधाभास इस मुद्दे को और जटिल बनाता है। इसलिए NRC का सवाल केवल कागजी दस्तावेजों का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह समुदायों के बीच भरोसे, पहचान और राजनीतिक अधिकारों से भी जुड़ चुका है।
मणिपुर मई 2023 से लंबे समय से जातीय हिंसा और विस्थापन की समस्या से जूझ रहा है। मेइती और कुकी समुदायों के बीच संघर्ष के बाद राज्य के कई हिस्सों में सामाजिक और भौगोलिक विभाजन गहरा हुआ है। हजारों लोग विस्थापित हुए और बड़ी संख्या में परिवार राहत शिविरों में रहने को मजबूर हुए।
इसी पृष्ठभूमि में अब जनगणना और NRC का मुद्दा सामने आया है। आंदोलनकारी यह भी चाहते हैं कि विस्थापित लोगों के पुनर्वास और नागरिकता से जुड़े सवालों को स्पष्ट किए बिना जनसंख्या का आंकड़ा तैयार न किया जाए।
मणिपुर में NRC की मांग के बीच असम का उदाहरण भी बार-बार सामने आ रहा है। असम में NRC अपडेट करने की प्रक्रिया 2019 में पूरी हुई थी और वहां नागरिकता संबंधी दावों तथा दस्तावेजों की व्यापक जांच की गई थी।
हालांकि, असम का अनुभव भी विवादों से अछूता नहीं रहा। यही कारण है कि मणिपुर में NRC की मांग के साथ उसके आधार वर्ष, प्रक्रिया, दस्तावेजों और संभावित प्रभावों पर भी गंभीर राजनीतिक और कानूनी सवाल खड़े हो रहे हैं।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या केंद्र और राज्य सरकार प्रदर्शनकारियों की NRC की मांग को देखते हुए मणिपुर में जनगणना की समय-सारिणी में बदलाव करेंगी या निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
सरकार के सामने चुनौती दोहरी है एक तरफ Census 2027 की प्रशासनिक प्रक्रिया को समय पर पूरा करना और दूसरी तरफ ऐसे संवेदनशील राज्य में कानून-व्यवस्था तथा सभी समुदायों का भरोसा बनाए रखना।
स्कूल-कॉलेजों का बंद होना इस विवाद की गंभीरता का संकेत है। आने वाले दिनों में यदि बातचीत का रास्ता नहीं खुलता है, तो सितंबर में शुरू होने वाली हाउस-लिस्टिंग से पहले मणिपुर में ‘पहले NRC, फिर Census’ की मुहिम और ज्यादा तेज हो सकती है।
Updated on:
20 Aug 2026 01:22 pm
Published on:
20 Aug 2026 12:51 pm
