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उग्रवादियों ने मांगी थी 54 करोड़ की फिरौती, रतन टाटा ने पांच लाख भी नहीं दिए

अपने कर्मचारी को बिना फिरौती उग्रवादियों के चंगुल से छुड़ाने पर अड़े थे रतन टाटा, पढ़िए कैसे मिली कामयाबी। रतन टाटा जिस महान शख्सीयत के मालिक थे, वह कोई साधारण बात नहीं थी। उन्होंने जहां कॉलेज में रंगभेद झेला था, वहीं निजी जिंदगी में माता-पिता का अलगाव भी देखा था। इन झंझावातों ने उनके व्यक्तित्व को अलग तरह की मजबूती दी। व्यापार में भी उन्होंने इस मजबूती का दामन नहीं छोड़ा। उन्होंने व्यापार भी उसूलों के साथ किया। उनके के कर्मचारी को जब बोडो उग्रवादियों ने अगवा कर लिया तो वह फिरौती नहीं देने पर अड़ गए। पैसे बचाने के लिए नहीं, बल्कि उसूलों की रक्षा के लिए।
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ratan tata biography by Thomos Mathew, Ratan Tata A Life, story of Tata Tea Employee kidnapping in Assam

रतन टाटा ऐसे ही नहीं थे भारत के रतन!

रतन टाटा एक ऐसे व्यक्ति थे, जो 'शॉर्ट-कट' नहीं अपनाना चाहते थे। वह विपत्तियों से निकलने के लिए भी गलत रास्ता अपनाने के पक्ष में नहीं रहते थे। इसका प्रमाण उन्होंने जीवन में कई बार दिया। रतन टाटा सितंबर 1955 में पढ़ने के लिए अमेरिका के कॉर्नेल यूनिवर्सिटी गए थे। वह कुलीन और धनवान परिवार से ताल्लुक रखते थे। इसके बावजूद अमेरिका में वह रंगभेद और भेदभाव का शिकार होने से बच नहीं सके थे। लेकिन, इसका उन्होंने बहादुरी से सामना किया। रतन टाटा गज़ब के हिम्मती और साहसी थे। अमेरिका में एक बार उनके दो दोस्तों ने रात में उनके कमरे पर धावा बोलने की साजिश रची। पटाखे और शेविंग क्रीम आदि लेकर रात को उन्होंने धावा बोल दिया, लेकिन रतन टाटा ने डरने के बजाय मार्शल आर्ट्स का जबर्दस्त ज़ोर दिखाया और सबको हैरान कर दिया। इससे पहले कम ही लोगों को पता था कि उन्होंने जूडो का प्रशिक्षण लिया हुआ था। रतन टाटा पंजा लड़ाने के खेल में भी उस्ताद थे।

...जब खूनी दौर से गुजर रहा था असम, तब भी अपने फैसले पर चट्टान की तरह अडिग रहे थे रतन टाटा

1989-90 का दौर वह दौर था जब असम एकदम अशांत हुआ करता था। फरवरी 1989 में डी चौधरी को मार डाला गया। वह लेडो टी एस्टेट में असिस्टंट मैनेजर थे। एक साल बाद, मार्च 1990 में टाटा टी एक एक कर्मचारी पीसी स्कारिया को गोली मार दी गई। अगले ही महीने, अप्रैल 1990 में सुरेंद्र पॉल की हत्या कर दी गई। वह कारोबारी लॉर्ड स्वराज पॉल के भाई और असम फ़्रंटियर टी कंपनी के एमडी थे। इन हत्याओं से चाय उद्योग सहमा हुआ था। कई प्लैंटेशन मैनेजर असम छोड़ कर भाग गए थे। नवम्बर 1990 में उल्फा (यूनाइटेड लिब्रेशन फ्रंट ऑफ असम) ने हिंदुस्तान लीवर लिमिटेड से 35 लाख रुपये रंगदारी मांगी। साथी ब्रूक बॉन्ड और लिप्टन के बिजनेस में होने वाले मुनाफे का पांच फीसदी भी देने के लिए कहा। कंपनी ने यह मांग मानने से इंकार कर दिया। यूनीलीवर ने असम में अपना कारोबार ही बंद कर देने का फैसला कर लिया। उसी महीने केंद्र सरकार ने उल्फ़ा को बैन कर दिया और असम में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया।

बोडो उग्रवादियों ने टाटा टी से मांगी थी 54 करोड़ रुपये की फिरौती, रतन टाटा ने नहीं दिया एक भी पैसा

इन परिस्थितियों के बीच रतन टाटा ने टाटा संस के चेयरमैन की ज़िम्मेदारी संभाली थी। 1991 में हितेश्वर सैकिया के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार ने असम में कमान संभाली, लेकिन राज्य के हालात वैसे ही रहे।

8 अप्रैल, 1993 को टाटा टी के गुवाहाटी दफ्तर में जनरल मैनेजर का काम देख रहे बोलिन बोरदोलोई को बोडो उग्रवादियों ने अगवा कर लिया। उनकी रिहाई के बदले 54 करोड़ रुपये की फिरौती मांगी गई।

संकट बड़ा था, पर रतन टाटा घबराए नहीं। उन्होंने उग्रवादियों की मांग के आगे झुकने से साफ मना कर दिया। यह जानते हुए भी कि इसके नतीजे खतरनाक हो सकते हैं। उन्होंने उग्रवादियों से बातचीत कर अपने कर्मचारी को रिहा कराने का रास्ता निकालने के लिए कहा। टाटा टी में कम्यूनिटी डेवलपमेंट एंड सोशल वेलफेयर विंग के सीनियर वेलफेयर ऑफिसर डॉ ब्रोजेन गोगोई को यह ज़िम्मेदारी सौंपी गई।

54 करोड़ से पांच लाख पर आ गए उग्रवादी, रतन टाटा को यह भी नहीं था मंजूर

गोगोई के उल्फ़ा में अपने संपर्क सूत्र थे। उसके जरिए उन्होंने बातचीत की और बड़ी मुश्किल से अंततः उग्रवादियों को पांच लाख रुपये की फिरौती पर तैयार किया। उग्रवादियों का कहना था कि बोरदोलोई को रखने पर इतनी रकम खर्च हो गई है। डॉ थॉमस मैथ्यू रतन टाटा की जीवनी (रतन टाटा-ए लाइफ) में लिखते हैं कि रतन टाटा पांच लाख रुपये देने के लिए भी तैयार नहीं थे। सवाल रकम का नहीं था, फिरौती का था।

बातचीत जारी रही और अंततः 2 मार्च, 1994 को बिना किसी फिरौती के बोरदोलोई की रिहाई हुई। रतन टाटा ने अपनी शर्तों पर यह रिहाई सुनिश्चित कराई थी। इसके बदले में उन्होंने उस क्षेत्र के सूदूर इलाकों में ज्यादा से ज्यादा सामाजिक कल्याण की योजनाएं लागू करने का वादा किया। उन्होंने इस वादे को निभाया भी। और, इसका असर भी अच्छा हुआ।

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