
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चुनावी सभा को संबोधित करती हुई। (Photo Credit - IANS)
West Bengal Elections: ममता बनर्जी (CM Mamata) को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने की पटकथा सिंगूर में ही लिखी गई थी। टाटा मोटर्स (tata motors) के नैनो प्लांट के खिलाफ आंदोलन ने 2011 में 34 साल पुरानी वाम सत्ता को उखाड़ फेंका था। तब से तृणमूल कांग्रेस मजबूत होती गई, लेकिन इस बार जमीन पर खामोशी है।
आलू बाजार में कारोबारी अंतु दास पहले बातचीत से बचते रहे, फिर बोले—'यहां आलू की सबसे ज्यादा खेती होती है, लेकिन 50 किलो की बोरी 2700 रुपए में बिक रही है, लागत भी नहीं निकलती।' वे आगे कहते हैं, 'तब हालात अलग थे, अब फिर वैसा ही माहौल बन रहा है।'
रतनपुर बाजार में चाय की दुकान पर स्थानीय लोग ‘वोटिंग प्रतिशत’ और ‘एसआइआर’ पर चर्चा करते दिखे। बातचीत में बेरोजगारी, पलायन और ‘कट मनी’ प्रमुख मुद्दे बनकर उभरे। आरोप है कि 'हर काम में कमीशन लगता है, घर बनाना हो तो पार्टी से जुड़े लोगों से ही बिल्डिंग मटीरियल लेना पड़ता है।'
सिंगूर स्टेशन के पास वॉलीबॉल खेल रहे युवाओं का कहना है—'दुनिया सिंगूर को जानती है, लेकिन हमने आंदोलन की कीमत चुकाई है।' 997 एकड़ जमीन किसानों को वापस तो मिली, पर 'कंक्रीट के कारण बंजर हो गई।' राजू दास कहते हैं, 'डिग्री लेकर भी रोजगार नहीं, पलायन मजबूरी है।'
यहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी दोनों रैली कर चुके हैं, लेकिन औद्योगिक विकास पर कोई ठोस ऐलान नहीं। राजनीतिक भाषणों के बीच ‘इंडस्ट्री’ अब भी अनुपस्थित मुद्दा है। दिलचस्प है कि '17 साल पहले जिन लोगों ने टाटा को जाने पर मजबूर किया, वही अब उद्योग के लौटने का इंतजार कर रहे हैं।'
स्थानीय समीकरण बताते हैं कि सिंगूर का असर हुगली जिले की 18 सीटों पर पड़ेगा। फिलहाल 14 सीट तृणमूल और 4 भाजपा के पास हैं। एंटी-इंकमबेंसी को देखते हुए तृणमूल ने 10 विधायकों के टिकट काटे हैं। लगभग सभी सीटों पर सीधा मुकाबला तृणमूल बनाम भाजपा है।
2006 में वाम सरकार ने 997 एकड़ जमीन अधिग्रहित कर नैनो प्लांट का रास्ता बनाया। तृणमूल के नेतृत्व में आंदोलन हुआ, ममता बनर्जी ने अगुवाई की। उनका कहना था कि बहुफसली उपजाऊ जमीन पर उद्योग नहीं लगना चाहिए। आंदोलन इतना बड़ा हो गया कि सिंगूर राजनीतिक युद्ध का मैदान बन गया। 3 अक्टूबर 2008 को रतन टाटा ने प्रोजेक्ट हटाने का ऐलान किया। 2016 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जमीन किसानों को लौटाई गई, लेकिन कंक्रीट परत के कारण जमीन खेती योग्य नहीं रही। आंदोलन की लहर ने ही 2011 में सत्ता परिवर्तन का रास्ता तैयार किया।
Published on:
27 Apr 2026 06:46 am
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