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काबुल में फंसे भारतीय शिक्षकों की व्यथा- घबरा रहा हमारा दिल, बस! भारत पहुंचा दो…

शिक्षकों की आपबीती - बना हुआ है डर का माहौल, दो दिन से बाहर कदम नहीं रखा, घबरा रहा हमारा दिल, बस! भारत पहुंचा दो... चारों भारतीय शिक्षक काबुल स्थित बख्तर विश्वविद्यालय Bakhtar University में पढ़ाते हैं, कश्मीर, बिहार और झारखंड के हैं शिक्षक, हर किसी पर डर का साया ।
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काबुल में फंसे भारतीय शिक्षकों की व्यथा- घबरा रहा हमारा दिल, बस! भारत पहुंचा दो...

काबुल में फंसे भारतीय शिक्षकों की व्यथा- घबरा रहा हमारा दिल, बस! भारत पहुंचा दो...

काबुल। अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पर तालिबान के कब्जे के बाद से हालांकि गोलियों की आवाज नहीं सुनाई दे रही है, लेकिन बीतते समय के साथ संकट गहरा रहा है। यह कहना है, अफगानिस्तान में फंसे चार भारतीय शिक्षकों का। उन्होंने तुरंत वहां से निकालने की अपील की है। चारों भारतीय शिक्षक काबुल स्थित बख्तर विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं, जिस पर तीन दिन पहले तालिबान ने कब्जा कर लिया है। मोहम्मद आसिफ शाह ने फोन पर न्यूज एजेंसी से बातचीत में कहा कि हमने भारत में हर संभव मंच पर संपर्क किया। हम उम्मीद कर रहे हैं कि भारत सरकार यहां से हमारी तत्काल निकासी के लिए कुछ न कुछ करेगी। हमने पिछले दो दिन से विश्वविद्यालय परिसर के बाहर कदम नहीं रखा है और हर वक्त बाहर हंगामा होता है, दिल घबरा रहा है।

अब तक सुरक्षित, पता नहीं कब तक-
मार्केटिंग विषय पढ़ाने वाले बिहार निवासी सैयद आबिद हुसैन ने कहा, हम अनिश्चितता में नहीं रहना चाहते हैं। हमारी अब तक सुनी नहीं गई है, पर भरोसा है कि सरकार हमें काबुल से सुरक्षित निकालने के लिए कोशिश कर रही है। विश्वविद्यालय में पत्नी के साथ रह रहे कश्मीर के आदिल रसूल ने कहा, प्रार्थना कर रहे हैं कि स्थिति और खराब नहीं हो। सुरक्षित घर लौट सकें।

बना हुआ है भय का माहौल-
विश्वविद्यालय में कंप्यूटर विज्ञान पढ़ा रहे झारखंड के अफरोज आलम ने कहा कि अब तक यहां कोई खून खराबा नहीं हुआ है, लेकिन भय का माहौल बना हुआ है। हमने शहर में गोलियों की भी आवाज नहीं सुनी है, लेकिन भय है कि कहीं यह शांति क्षणिक न हो। मैं बस यहां से सुरक्षित निकलने की उम्मीद कर रहा हूं।

डर कि अनहोनी ना हो जाए-
कश्मीर के रहने वाले शाह काबुल स्थित विश्वविद्यालय में चार साल से अर्थशास्त्र पढ़ा रहे हैं। उन्होंने बताया कि उन्हें और उनके सहयोगियों को डर है कि मौजूदा माहौल में कुछ भी अनहोनी हो सकती है। शाह ने कहा, मेरी योजना सोमवार को लौटने की थी। टिकट भी बुक करा लिया था, पर स्थिति तेजी से बदली। मुझे हवाई अड्डे पहुंचने में घंटों लग गए और ऐसा लगा कि पूरा काबुल हवाई अड्डे पर जमा हो गया है। उड़ान रद्द कर दी गई। हॉस्टल लौटने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं था।

भारतीयों की वापसी पर फोकस-
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने बुधवार को कहा कि भारत अफगानिस्तान के घटनाक्रम पर 'बहुत करीबी नजर' रखे हुए है। भारत का ध्यान वहां फंसे अपने नागरिकों की सुरक्षा और सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करने पर है। जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र में प्रौद्योगिकी एवं शांति स्थापना पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की खुली बहस की अध्यक्षता के बाद यह बात कही।

पश्चिम बंगाल के 200 से ज्यादा लोग अफगानिस्तान में फंसे -
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बुधवार को कहा कि प्रदेश के 200 से ज्यादा लोग अफगानिस्तान में फंसे हुए हैं। इनकी सुरक्षित वापसी के लिए विदेश मंत्रालय को पत्र लिखा गया है। इस संबंध में एक विशेष समिति गठित की गई है।

उथल-पुथल से बेखबर ...हमें तो आगे बढऩा है-
हेरात. तालिबान के कब्जे के कुछ ही दिन बाद हेरात के एक स्कूल में सफेद हिजाब और काले रंग की पोशाक पहने छात्राएं दिखीं। जैसे ही स्कूल ने अपने दरवाजे खोले, छात्राओं ने गलियारों में दौड़ लगाई और आपस में बतियाती रहीं। वे अफगानिस्तान में फैली उथल-पुथल से बेखबर हैं। एक छात्रा कहती है, 'हमें बस आगे बढऩा है।' हालांकि, भविष्य अनिश्चित बना हुआ है। कई रिपोर्टों के अनुसार, तालिबानी कब्जे वाले इलाकों में स्कूल तो दूर की बात है, लड़कियों की आवाजाही की आजादी भी खत्म कर दी गई है।

20 साल पहले के तालिबानी राज के उलट तालिबान के प्रवक्ता जबीहुल्ला मुजाहिद का दावा है कि हम महिलाओं के काम करने और स्कूल जाने के खिलाफ नहीं हैं। लड़कियां पढ़ाई कर सकती हैं, काम पर जा सकती हैं। बुर्का पहने या नहीं, लेकिन हिजाब पहनना होगा। उधर, तालिबान के लौटने के साथ ही बुर्कों की कीमतें 10 गुना बढ़ गई हैं। औरतों को लग रहा है कि बुर्का पहनना उन्हें बचा सकता है, वरना वे मारी जाएंगी। उन्हें घर बैठने का फरमान मिल चुका है।

'खिड़की के पास भी नहीं जा रही मैं'-
एक महिला ने तालिबानी राज में अपनी व्यथा उजागर करते हुए कहा है, कई दिन से घर से नहीं निकली हूं। खिड़की के पास भी नहीं जाती। कैदी की तरह महसूस करती हूं। तालिबान ने लड़कियों को घर बैठने का कह दिया।

पंजशीर में प्रतिरोध का झंडा फहराया-
अफगानिस्तान की पंजशीर घाटी ने फिर से तालिबान के खिलाफ प्रतिरोध का झंडा फहराना शुरू कर दिया है। यही एकमात्र जगह है, जिसे तालिबान कभी नहीं जीत पाया है। उपराष्ट्रपति अमरुल्ला सालेह पंजशीर पहुंच कर खुद को राष्ट्रपति घोषित कर चुके हैं। 'पंजशीर के शेर' कहे जाने वाले अहमद मसूद व रक्षा मंत्री बिस्मिल्लाह मोहम्मदी ने भी तालिबान के खिलाफ सालेह का साथ देने का वादा किया है।

9.5 बिलियन डॉलर संपत्ति अमरीका ने अफगानी खजाने पर लगाई रोक-
अमरीका ने अमरीकी बैंकों में रखी अफगान सरकार की संपत्ति फ्रीज कर दी है। इसके बाद तालिबान अमरीकी बैंकों से अफगानिस्तान के खजाने को नहीं ले पाएगा। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुमान के अनुसार अप्रेल तक अफगान केंद्रीय बैंक की संपत्ति 9.5 बिलियन डॉलर है। इसका एक बड़ा हिस्सा न्यूयॉर्क फेडरल रिजर्व और अमरीका की अन्य वित्तीय संस्थानों के खातों में है।

उधर, अफगानिस्तान पर अमरीकी हमले के बाद से दो दशक में हजारों अफगानी अमरीका में बस गए हैं। उनमें से कुछ हाल में पहुंचे हैं। अफगानिस्तान के हालात देखकर उनकी भूख-प्यास और नींद उड़ गई है।

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