
कंपनियों के बोर्डरूम में महिलाओं की भागेदारी (प्रतिकात्मक तस्वीर -AI)
Women Directors in the Boardroom: नवरात्र पर घरों में शक्ति की पूजा की जा रही है लेकिन जिन कंपनियों के प्रोडक्ट हम रोज इस्तेमाल करते हैं, उनके बोर्डरूम के फैसलों में महिलाओं की आवाज आज भी बहुत धीमी है। बीएसई में सूचीबद्ध देश की टॉप 50 कंपनियों में औसतन हर पांच डायरेक्टर में एक महिला भी नहीं है। जो महिलाएं बोर्ड में हैं, उनमें भी ज्यादातर कंपनी के मालिकों के परिवार से हैं। भागीदारी बढऩे की मौजूदा रफ्तार यही रही तो बोर्ड में 30 फीसदी महिलाओं का लक्ष्य पाने के लिए 2058 तक इंतजार करना पड़ेगा।
साल 2013 में भारत का नया कंपनी कानून बना। इसमें प्रावधान किया गया कि शेयर बाजार में सूचीबद्ध सभी कंपनियों और 100 करोड़ रुपए की पूंजी या 300 करोड़ रुपए या अधिक टर्नओवर वाली कंपनियों के बोर्ड में कम से कम एक महिला डायरेक्टर जरूर हो। पुरानी कंपनियों को इसके लिए एक साल और नई कंपनियों को छह माह की मोहलत दी गई। वर्ष 2018 में सेबी ने कहा कि टॉप 500 सूचीबद्ध कंपनियों में अप्रेल 2019 तक और टॉप 1,000 कंपनियों में अप्रेल 2020 तक कम से कम एक स्वतंत्र महिला डायरेक्टर होनी चाहिए। इसके बावजूद अपेक्षित बदलाव नहीं आया।
हकीकत समझने के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय के दयाल सिंह कॉलेज के तीन प्रोफेसरों डॉ. शेषपाल सिंहमार, डॉ. शालिनी अग्रवाल और डॉ. कनिका बजाज ने अप्रेल 2026 तक के आंकड़ों का गहराई से विश्लेषण किया। नतीजे बताते हैं कि कानून बनने के 13 साल बाद भी देश के कॉर्पोरेट बोर्डरूम पुरुषों का क्लब बने हुए हैं। अप्रेल 2026 तक 50 कंपनियों में कुल 531 डायरेक्टर थे, जिनमें केवल 106 महिलाएं थीं, यानी 19.96 फीसदी।
-ब्रिटेन: 2025 तक 40 फीसदी महिला प्रतिनिधित्व का लक्ष्य, लेकिन सजा या जुर्माने का प्रावधान नहीं।
-अमरीका: सूचीबद्ध कंपनी में दो विविधता वाले डायरेक्टर रखने का प्रावधान था, जिनमें एक महिला जरूरी थी। अपीलीय अदालत ने दिसंबर 2024 में इसे रद्द कर दिया।
-जापान: टोक्यो स्टॉक एक्सचेंज की सूचीबद्ध कंपनियों के लिए 2030 तक 30 फीसदी महिला अधिकारियों का लक्ष्य तय, लेकिन सजा का प्रावधान नहीं।
Updated on:
12 Oct 2026 07:28 am
Published on:
12 Oct 2026 07:28 am
Copyright © 2026 Patrika Group. All Rights Reserved.
