
मौलाना साजिद रशीदी के 'इस्लामिक कानून' वाले बयान पर संतों ने जताई नाराजगी। (फोटो सोर्स-ANI)
Islamic Law India: भारत में 'इस्लामिक कानून' लागू करने को लेकर मौलाना साजिद रशीदी के बयान पर विवाद बढ़ता जा रहा है। उनके बयान के बाद कई साधु-संतों ने इसका विरोध किया है। संतों का कहना है कि भारत में कानून संविधान के हिसाब से चलता है और किसी एक धर्म के कानून को पूरे देश पर लागू नहीं किया जा सकता।
राम कचहरी चार धाम मंदिर के महंत ने मौलाना के बयान पर नाराजगी जताते हुए कहा कि भारत में इस तरह की मांग पूरी नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि देश के कानून और संविधान का सम्मान करना हर किसी की जिम्मेदारी है। उनके मुताबिक, अपराध रोकने और कानून व्यवस्था बेहतर करने के लिए मौजूदा कानूनी व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत है।
संत शशिकांत दास ने भी मौलाना के बयान पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है और यहां सभी के लिए कानून एक ही संवैधानिक व्यवस्था के तहत काम करता है। ऐसे में धार्मिक मुद्दों को लेकर ऐसा बयान देना सही नहीं है।
वहीं संत सत्येंद्र दास वेदांती ने इस बयान को गैर-जिम्मेदाराना बताया। उन्होंने कहा कि धर्म से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर बोलते समय सावधानी रखनी चाहिए। ऐसे बयान लोगों के बीच गलतफहमी पैदा कर सकते हैं और सामाजिक माहौल भी खराब हो सकता है।
एक अन्य संत ने भी कहा कि धार्मिक मामलों को लेकर ऐसी बयानबाजी से बचना चाहिए, जिससे समाज में तनाव बढ़े। उनका कहना था कि अलग-अलग धर्मों और समुदायों के लोग भारत में लंबे समय से साथ रहते आए हैं और इस सामाजिक एकता को बनाए रखना जरूरी है।
विवाद के बीच मौलाना शहाबुद्दीन ने भारत की संवैधानिक व्यवस्था का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां अलग-अलग धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं। संविधान हर नागरिक को अपने धर्म का पालन करने की आजादी देता है।
उन्होंने कहा कि देश की कानून व्यवस्था संविधान के अनुसार चलती है। इसलिए किसी एक धार्मिक व्यवस्था को पूरे देश में लागू करने की मांग को लेकर टकराव की स्थिति पैदा करना सही नहीं होगा।
मौलाना साजिद रशीदी के बयान और उसके बाद आई संतों की प्रतिक्रियाओं ने धार्मिक कानून को लेकर बहस फिर तेज कर दी है। एक तरफ मौलाना के बयान को लेकर विरोध हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ संविधान और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की चर्चा भी शुरू हो गई है।
भारत में सभी नागरिकों के अधिकार और कानून संविधान के दायरे में आते हैं। ऐसे में इस तरह के संवेदनशील मुद्दों पर बयानबाजी के बीच सबसे बड़ी चुनौती यही है कि बहस कानून और संविधान की सीमा में रहे और किसी भी समुदाय के बीच तनाव की स्थिति पैदा न हो।
Updated on:
29 Aug 2026 04:19 pm
Published on:
29 Aug 2026 04:16 pm
