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Shiv Tandav Stotram: रावण ने क्यों रचा था शिव तांडव स्तोत्र? जानिए इसकी कथा और धार्मिक महत्व

Shiv Tandav Stotram: शिव तांडव स्तोत्र की उत्पत्ति रावण और महादेव की उस कथा से जुड़ी है, जब अहंकार टूटने के बाद रावण ने भक्ति में डूबकर इसकी रचना की। जानिए इसके धार्मिक महत्व, तांडव के प्रकार और पाठ से जुड़ी मान्यताएं।”

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भारत

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Manoj Vashisth

Jun 04, 2026

Shiv Tandav Stotram Meaning

Shiv Tandav Stotram: रावण ने क्यों रचा था शिव तांडव स्तोत्र? जानिए कथा (फोटो सोर्स: AI@Gemini)

Shiv Tandav Stotram Meaning: जीवन में सफलता जब अहंकार का रूप ले लेती है, तो पतन निश्चित हो जाता है। सनातन शास्त्रों में दर्ज लंकापति रावण और देवाधिदेव महादेव की यह गाथा इसी शाश्वत सत्य को प्रमाणित करती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार देवर्षि नारद की सलाह पर रावण महादेव को अपनी लंका ले जाने की हठ कर बैठा। जब शिव नहीं माने, तो अपने पराक्रम के घमंड में चूर रावण ने पूरे कैलाश पर्वत को ही उखाड़ने का प्रयास किया। तभी महादेव ने कौतुकवश अपने पैर का अंगूठा थोड़ा सा दबाया और पूरा पर्वत रावण के हाथों पर आ टिका। उस भार से दबे रावण ने पीड़ा में ऐसा भयानक 'राव' (क्रंदन) किया जिससे तीनों लोक कांप उठे।

इसी चीख के कारण महादेव ने उसे रावण नाम दिया।। चौदह दिनों तक असहनीय दर्द में तड़पने के बाद, प्रदोष काल की पावन बेला में रावण ने अपनी भूल स्वीकार की और महादेव को प्रसन्न करने के लिए तत्काल 1008 छंदों वाले एक बेहद शक्तिशाली और लयबद्ध स्तोत्र की रचना कर डाली, जिसे आज हम शिव तांडव स्तोत्र (Shiv Tandav Stotram) के नाम से जानते हैं। रावण द्वारा कैलाश पर्वत उठाने और शिव तांडव स्तोत्र की रचना की यह कथा रामायण के उत्तर कांड, शिवभक्ति परंपराओं और लोक मान्यताओं में प्रचलित रूप में वर्णित मिलती है।

शिव तांडव स्तोत्र और नटराज के तांडव का महत्व

शास्त्रों में भगवान शिव को नटराज यानी 'नृत्यों का देवता' कहा गया है। उनके द्वारा किया जाने वाला अलौकिक तांडव नृत्य महज एक कला नहीं, बल्कि ब्रह्मांड के सृजन, संरक्षण और विनाश के चक्र का आधार है।

क्रमांकतांडव का प्रकारसंक्षिप्त विवरण
1आनंद तांडवयह तांडव भगवान शिव द्वारा आनंद और उल्लास की अवस्था में किया जाता है।
2रुद्र तांडवयह उग्र और विनाशकारी भाव में किया जाने वाला तांडव है।
3त्रिपुर तांडवत्रिपुरासुर के विनाश के उपलक्ष्य में किया गया तांडव।
4संध्या तांडवसंध्या काल में किया जाने वाला दिव्य तांडव।
5समर तांडवयुद्ध और वीरता से संबंधित तांडव।
6काली तांडवदेवी काली से संबंधित उग्र शक्ति का प्रतीक तांडव।
7उमा तांडवमाता उमा (पार्वती) के साथ किया जाने वाला सौम्य तांडव।
8गौरी तांडवदेवी गौरी के साथ जुड़ा हुआ शांत और मंगलमय तांडव।

विद्वानों के अनुसार, भरतमुनि के 'नाट्यशास्त्र' (जिसे पांचवा वेद भी कहा जाता है) के चौथे अध्याय में शिव के इस तांडव का विस्तृत वर्णन है, जो 108 करणों और 32 अंगहारों से सुसज्जित है। जहां शिव का तांडव ऊर्जा और उग्रता का प्रतीक है, वहीं माता पार्वती का 'लास्य' नृत्य इसकी सौम्य, सुंदर और स्त्रीत्व (Feminine) प्रधान प्रकृति को संतुलित करता है।

शिव तांडव स्तोत्र पाठ से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जहां तनाव और नकारात्मकता इंसानी दिमाग को कमजोर कर रही है, वहां भक्तों का मानना है कि शिव तांडव स्तोत्र का पाठ मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। मान्यता है कि नियमित पाठ से मानसिक शांति और आत्मिक संतुलन महसूस होता है।

इन विशेष समयों पर मिलता है सौ गुना फल:

प्रदोष व्रत (त्रयोदशी तिथि): शाम के समय (सूर्यास्त के आसपास) इसका पाठ करने से जीवन के समस्त पापों और संकटों का नाश होता है, क्योंकि रावण को भी इसी समय क्षमादान मिला था।
ग्रहण काल: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ग्रहण के दौरान इस स्तोत्र का पाठ या ध्यान करने से ग्रहों के सभी प्रतिकूल प्रभाव समाप्त हो जाते हैं।
ब्रह्ममुहूर्त और गोधूलि बेला: मान्यता है कि भोर और शाम के समय इसका जाप करने से कार्यक्षमता दोगुनी हो जाती है और मानसिक शांति मिलती है।

अस्वीकरण (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी केवल सामान्य सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। यहाँ दी गई ज्योतिष, वास्तु या धार्मिक जानकारी मान्यताओं और विभिन्न स्रोतों पर आधारित है। हम इसकी पूर्ण सटीकता या सफलता की गारंटी नहीं देते हैं। किसी भी उपाय, सलाह या विधि को अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के प्रमाणित विशेषज्ञ या विद्वान से परामर्श अवश्य लें।