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संपादकीय: दवाओं में ‘महंगाई के कैंसर’ का उपचार जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने भी समय-समय पर दवाइयों की भारी कीमतों को लेकर चिंता जताई है। वस्तुत: पेटेंट जारी करने का मकसद किसी उत्पाद पर एकाधिकार कर शोषण का जरिया बनाना तो कतई नहीं होना चाहिए।
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महंगी दवाएं आज देशभर में मरीजों और उनके परिजनों पर सबसे बड़े आर्थिक बोझ का रूप ले रही है। कैंसर, स्पाइनल मस्कुलर एट्रॉफी और हिमोफीलिया जैसी बीमारियों में दवाओं की कीमत तो आसमान छूती नजर आ रही है। मरीज पर एक दवा का ही सालाना खर्च करोड़ों रुपए तक पहुंच जाए तो इसे दवाइयों पर 'महंगाई का कैंसर' ही कहा जाना चाहिए। हैरत की बात यह है कि कानून में सस्ते इलाज का रास्ता होने के बावजूद मरीजों को सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने के दरवाजे के सात ताले लगे महसूस होते हैं। उस परिवार के दर्द का अंदाज लगाया जा सकता है, जिसने अपनी जमीन-जायदाद तक गिरवी रखने के बावजूद अपने बीमार परिजन का इसीलिए खो दिया कि महंगी दवाइयां उनके बूते के बाहर की थीं। जबकि गंभीर बीमारियों में तो सस्ता व सुलभ इलाज मिलना ही चाहिए।

दवा बनाने का एकाधिकार और उनकी कीमत तय करने की छूट देने वाला पेटेंट एक्ट दवा निर्माता कंपनियों की मनमानी का आधार भले ही बन गया हो लेकिन चिंता की बात यह है कि पेटेंट एक्ट की धाराओं का इस्तेमाल नहीं होने से यह मनमानी बेलगाम होती जा रही है। केरल हाईकोर्ट ने सस्ती दवाओं को लेकर एक्ट जिन प्रावधानों की याद दिलाई है उन पर अमल मरीजों के लिए राहत वाला हो सकता है। हैरत की बात यह है कि हमारे यहां पेटेंट एक्ट की धारा 92 और 100 का इस्तेमाल ही नहीं किया जा रहा। राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में किफायती स्वास्थ्य सेवाओं को जीवित रहने के और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से जोड़कर देखा था। सुप्रीम कोर्ट ने भी समय-समय पर दवाइयों की भारी कीमतों को लेकर चिंता जताई है। वस्तुत: पेटेंट जारी करने का मकसद किसी उत्पाद पर एकाधिकार कर शोषण का जरिया बनाना तो कतई नहीं होना चाहिए। लेकिन फॉर्मा लॉबी सरकार को मिले अधिकारों को लागू नहीं होने देती, इस तरह के आरोप भी समय-समय पर लगते रहते हैं।

पेटेंट कानून में यह स्पष्ट प्रावधान है कि कोई भी पेटेंट सरकार को सार्वजनिक क्षेत्र के स्वास्थ्य मुद्दों पर फैसले करने से रोक नहीं सकता। बशर्ते सरकार के पास इसके वाजिब कारण हों। पेटेंट कानून की धारा 92 के तहत आपातकाल, तात्कालिक जरूरत या सार्वजनिक गैर व्यावसायिक उपयोग के लिए केंद्र दवा लाइसेंस दे सकता हैै। वहीं धारा 100 के तहत सरकारी उपयोग के लिए पेटेंट इनोवेशन का इस्तेमाल किया जा सकता है। केरल हाईकोर्ट ने इस संबंध में सटीक टिप्पणी की है कि जनता की सेहत की रक्षा भी सरकार का अहम काम है।निश्चित रूप से सरकार को पेटेंट की आड़ में मनमाने दाम वसूलने की फॉर्मा कंपनियों के रवैये का स्थायी उपचार खोजना होगा। कानून में जो प्रावधान हैं उनका तय प्रक्रिया से इस्तेमाल हो तो मरीजों को सस्ती दवा उपलब्ध कराने की राह निकल ही आएगी। जरूरत इ'छाशक्ति की है।