मेरठ। चुनावी मौसम में महिला शक्ति अपनी अहम भूमिका रखती हैं लेकिन अभी भी राजनीतिक दल उन्हें वह मुकाम नहीं दे रहे हैं जिसकी वह हकदार हैं। इतना ही नहीं राजनीतिक दलों के लिए महिला सुरक्षा कोई मुद्दा नहीं है। राजनीतिक पार्टियों को समझना होगा कि अगर आगामी चुनाव में जीत दर्ज करनी है तो महिलाओं को नजरअंदाज न किया जाए। मेरठ शहर में महिलाओं से बात की गई तो उन्होंने इस बारे में अपने विचार प्रकट किए।

आरएसएस कार्यकर्ता तरूणा का कहना है कि महिलाओं की सुरक्षा समाज में एक बड़ी चुनौती है। इसके लिए जहां पुरुष मानसिकता जिम्मेदार है वहीं राजनीतिक दल या सरकारें भी जिम्मेदार हैं जो महिलाओं के लिए एक सुरक्षित माहौल पैदा नहीं कर पाई हैं। राजनेताओं को इस बारे में सोचना पड़ेगा और इस मुद्दे को चुनावी एजेंडे में महत्वपूर्ण जगह देनी होगी वरना उन्हें चुनाव में भारी नुकसान उठाना होगा।
एबीवीपी की प्रांत छात्रा प्रमुख मीनल गौतम का कहना है कि महिलाओं के लिए मौजूदा सरकार ने कुछ नहीं किया। इतना ही नहीं यूपी में बीती सरकारों ने भी कोई खास उपाय नहीं किए हैं। यूपी में पूरी तरह से जंगल राज चल रहा है। ऐसे में सभी राजनीतिक दलों को आधी शक्ति की सुरक्षा के बारे में सोचना होगा। इसके साथ ही कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में भी छात्राओं की सुरक्षा पर ध्यान रखना होगा।

बीजेपी कार्यकर्ता राकेश सिरोही का कहना है कि बसपा हो या सपा यूपी में किसी ने भी न तो महंगाई को कभी मुद्दा माना है न ही महिला अधिकारों की बात की है। ऐसे में आगामी चुनाव में तमाम राजनीतिक दलों से उम्मीद की जा रही है कि वह महिलाओं को उचित स्थान दें। केवल महिला सुरक्षा ही मुद्दा नहीं है राजनीति में भी महिलाओं को उनकी हिस्सेदारी मिलनी चाहिए।
आरएसएस प्रचारक अलका का कहना है कि आजादी के 70 साल के बाद भी ऐसा माहौल नहीं बन पाया है कि बेटियां सड़क पर सुरक्षित चल सकें। राजनीतिक दलों को दलगत राजनीति से उठ कर बेटे बचाओ और बेटी पढ़ाओ की रणनीति पर काम करना होगा।