जानलेवा छूट

जो व्यक्ति जीवन का लक्ष्य तय नहीं कर सकता, धन के आगे सृष्टि को छोटा मानता है, क्या उसकी समझ समाज या देश के काम आ सकती है? आज ऐसे ही लोग देश-दुनिया में शासन कर रहे हैं।

By: Gulab Kothari

Published: 07 Jun 2021, 07:09 AM IST

- गुलाब कोठारी

जीवन के दो बड़े पहलू हैं-संस्कार और शिक्षा। संस्कार, जीवन की समझ देते हैं तो शिक्षा, बुद्धि का विकास करती है। संस्कार से व्यक्ति बुद्धिमान ही नहीं विवेकवान भी बनता है। बुद्धि बाहर से आती है और संस्कार (विवेक-प्रज्ञा) भीतर से, अन्तर्मन से। आज की शिक्षा में मनोविज्ञान वाला मन तो है, अन्तर्मन नहीं है। जितने बुद्धिजीवी मिलकर देश को चला रहे हैं, नीतियां बना रहे हैं, उनमें कितने प्रज्ञावान हैं, संस्कारवान हैं? इनमें वे भी जो देश की आत्मा को समझते हैं। और, वे भी जो यह जानते हैं कि विकास का अर्थ तो पश्चिम की नकल करना है, अंग्रेजी बोलना है व डॉलर कमाना है।

जो व्यक्ति जीवन का लक्ष्य तय नहीं कर सकता, धन के आगे सृष्टि को छोटा मानता है, क्या उसकी समझ समाज या देश के काम आ सकती है? आज ऐसे ही लोग देश-दुनिया में शासन कर रहे हैं। आज की शिक्षा ने 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की सोच को 'व्यक्तिगत कुटुम्बकम्' (पति-पत्नी-बच्चे) में बदल दिया है। शिक्षा की नीरसता ने संवेदना ही छीन ली। व्यक्ति, अपने स्वार्थ के लिए किसी का भी गला घोंट सकता है। ऐसी सोच वाले यदि सत्ता में बैठ कर नीतियां बनाते हों तो अपने क्षुद्र स्वार्थों की खातिर लोगों का जीवन भी दांव पर लगा सकते हैं। सम्पूर्ण विश्व में यही हो रहा है। आरोप तो यह भी है कि कोरोना वायरस भी किसी शिक्षित संवेदनहीन व्यक्ति के दिमाग की ही उपज थी। विश्व का सारा धन सिमटकर दवा-वैक्सीन निर्माताओं के पास चला गया। सोशल मीडिया पर तो यह भी चला कि जिस संस्थान ने चीन की वुहान लैब में धन लगाया था, उसी ने अमरीका की वैक्सीन निर्माता कंपनी के लिए भी धन लगाया। यह तथ्य कितना सही है कहा नहीं जा सकता, किन्तु मर कितने गए, इसका दर्द कहीं सुनाई नहीं दिया।

यह तो बड़ी घटना है। अपने स्वार्थ के लिए जनजीवन से खिलवाड़ तो आज आम हो गया। हमारे अफसर भी डॉलर के भूखे तो हैं ही। आए दिन रुपयों के लिए ईमान बेचते रहते हैं। अब तो नेता भी जुडऩे लगे। चालू कर दो परिवार नियोजन और गोलियों की दलाली खाओ। भले ही किसी को स्तन कैंसर हो या किसी की बच्चेदानी निकालनी पड़े। आबादी के लिए अनाज कम पड़ता है तो रासायनिक खाद को अनिवार्य कर दो। उन्नत बीज से कीड़े पैदा होने लगे तो कीटनाशक उत्पाद के कारखाने विदेशी तर्ज पर लगा दो। मौत के आंकड़े तो यमराज गिनेंगे-इनको क्या मतलब! लाज-शर्म सब खाक में, क्या रखा है साख में।

डेयरी की अवधारणा इस देश की आवश्यकता ही नहीं थी। विकसित देशों की नकल और यमदूतों का आक्रमण! कितने पशुओं का कच्चा दूध (बीमार भी हो सकते हैं), कितने दिन तक पीते रहने का विज्ञान। कुछ देशों ने तो डेयरी पर प्रतिबंध लगाने शुरू कर दिए। हमारे यहां दो-पांच हजार के मरने का किसी को फर्क ही नहीं पड़ता। बस घडिय़ाली आंसू। बल्कि, आज देशभर में कोरोनाकाल में मरने के बाद भी कमाई का रास्ता निकाल रहे हैं। कैसा लगता है, कभी राष्ट्र पर कुर्बान होने के गीत गाते थे और आज अपने लिए राष्ट्र को कुर्बान तक कर सकते हैं।

अभी पिछले दिनों ही खबर थी कि आस्टे्रलिया में नेस्ले नामक खाद्य पदार्थ बनाने वाली कम्पनी के साठ प्रतिशत से अधिक उत्पाद हानिकारक पाए गए। ये बिक रहे हैं किसके सहयोग से? हमारे यहां अप्रैल २०१५ में उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में मैगी व नूडल्स के सैंपल में हानिकारक मोनो सोडियम ग्लूकोमेट की मात्रा ज्यादा पायी गई। इसलिए भारतीय खाद्य सुरक्षा मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआइ) ने जून 2015 में इस पर बैन लगा दिया। देशभर में सैंपल लिए गए। कम्पनी को करीब 320 करोड़ रुपए कीमत के 38 हजार टन मैगी नूडल्स को बाजार से वापस लेना पड़ा। बाद में अगस्त 2016 में हाईकोर्ट ने इस रोक को सशर्त हटा लिया। पिछले २०-२५ वर्षों में, विश्व में कितने ही पेय पदार्थों और यहां तक कि बोतलबन्द पानी तक में कीटनाशकों के इस्तेमाल की खबरें आ चुकी हैं। पानी के कुछ नमूनों में तो आस्टे्रलिया जैसे विकसित देश में ८२ प्रतिशत तक दूषित स्तर पकड़ा गया। डेयरी उत्पादों में ६० प्रतिशत तक घटियापन।

हमारे यहां सब कुछ धड़ल्ले से बिकता है। देश में एफएसएसएआइ की ओर से स्वीकृत खाद्य पदार्थ ही बेचे जाते हैं। कुछ ऐसे खाद्य पदार्थ हैं, जिनको भारत में तो मंजूरी है लेकिन कई देशों में ये प्रतिबन्धित हैं। अमरीका, कनाडा जैसे देशों में स्वास्थ्य के लिए हानिकारक गैरपाश्चुरीकृत दूध की बिक्री प्रतिबंधित है। वहां केवल पैक्ड दूध ही डेयरी में उच्चतम तापमान पर जीवाणु-कीटाणु रहित कर बेचा जाता है। जैली स्वीट्स में मिलाया जाने वाला खास समुद्री पदार्थ बच्चों का गला खराब कर सकता है। ऐसे खाद्य पदार्थ अमरीका, कनाडा, यूके व कई यूरोपियन देशों में प्रतिबंधित हैं। किंडर चॉकलेट भी कई देशों में प्रतिबंधित है। स्वच्छता के लिए मशहूर सिंगापुर ने तो स्वास्थ्य व सफाई की दृष्टि से उचित नहीं मानते हुए च्यूइंगम को अपने यहां प्रतिबंधित कर रखा है। हमारे यहां तो दूध भी कीटनाशकयुक्त, उसमें पानी, बाद में पाउडर मिल्क! वाह रे गौमाता के देश!

सबसे मजेदार तो नेस्ले के प्रमुख अधिकारी मार्क श्नाइडर का बयान था कि वे भले ही कितना भी सुधार कर लें, फिर भी स्वस्थ तो नहीं होंगे। लोगों को गरिष्ठ खाने का शौक है। जिस प्रकार बीमा कम्पनियां मुआवजा टालने के लिए गलियां निकालती हैं, वैसे ही खाद्य सामग्री उत्पादकों ने गलियां निकल रखी हैं। शाकाहारी और बच्चों के लिए लोकप्रिय खाने के उत्पादों के बारे में डिब्बों व थैलियों पर इतनी भाषाओं में लिखा जाता है कि लोग उसे समझ ही नहीं पाते। हमारे अधिकारी भी उसी मानसिकता के होते हैं। यही कारण है कि आज भी देश में देशी-विदेशी सभी बड़े नाम वाले खाद्य पदार्थ और पेय हानिकारक होने के बावजूद बिक रहे हैं। रोटी खाने के पैसे नहीं हैं। रोग गले पड़ेगे, और घर बिक जाएंगे। फिर भी चाल हंस की ही चलेंगे।

ऐसा नहीं है कि हमारे यहां नियंत्रण तंत्र नहीं है। एक नहीं, अनेकों पद, संस्थान बने हुए हैं, प्रयोगशालाएं हैं, किन्तु वे भी जनता के बजाय खोटा बेचने वालों के लिए ही काम करती हैं। जैसे नगर निगम के लोग पैसा लेकर अवैध निर्माण करवाते हैं, डेयरी वाले मिलावटी दूध खरीद लेते हैं, वैसे ही खाद्य निरीक्षकों का भी एक तबका पैसे लेकर (बंधी) हानिकारक उत्पाद बेचने की छूट देता हैं। आप ने आए दिन हलवाइयों की दुकानों पर अधिकारियों को दूध-पनीर सड़क पर फेंकते देखा होगा। भले ही मिलावटी न हो, फेंकते मिलावट के नाम पर हैं। फिर कभी किसी को जेल जाते देखा क्या? आयकर, पुलिस, आबकारी, ट्रांसपोर्ट जैसे छापे मशहूर हैं।

खाद्य सामग्री में मिलावट व बड़े नामों को अपना घटिया माल बेचने की छूट जानलेवा साबित होती है। कोरोना मारे, महंगाई मारे, बेरोजगारी मारे और ऊपर से खाने में भी बाजार में जहर ही उपलब्ध हो तो? शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता का क्या होगा? सारे शासन-प्रशासन जहर ही परोस रहे हैं-विज्ञान के नाम पर। नवजात शिशु को प्रथम घूंट में जहर पीकर ही जीवन में अवतरित होना पड़ रहा है। जनता के खर्च से पलते जनसेवक, जनता को सीधे-सीधे यमराज के हाथों सौंपने का कार्य कर रहे हैं। इस घर को आग लग रही घर के चिराग से।

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