शरीर ही ब्रह्माण्ड : माया शक्ति है - प्रकृति आवरण

कर्म को माया, प्रकृति स्वरूप प्रदान करते हैं। प्रारब्ध कर्मों के फल भी इच्छा को प्रभावित करते हैं। यही ईश्वर की इच्छा कही जाती है। इसमें आगे जीव की इच्छा जुड़ जाती है। यहां प्रकृति के तीन भाव जुड़ते हैं।

By: Gulab Kothari

Published: 03 Jul 2021, 07:44 AM IST

- गुलाब कोठारी

प्रकृति स्वभाव को कहते हैं। एक बाह्य जीवन का स्वभाव है और दूसरा आभ्यन्तर स्वभाव है। बाहरी प्रकृति क्षर सृष्टि-रूप है। पांच महाभूत, मन, बुद्धि, अहंकार को अपराप्रकृति कहा है। दूसरी ओर जीव रूप (अक्षर) पराप्रकृति है। इसके आगे स्वयं ईश्वर है-अव्यय पुरुष।

प्रकृति को त्रिगुणी कहा है। प्रत्येक व्यक्ति का स्वभाव प्रकृति के अधीन है जो तीन प्रकार का होता है-सत्त्व-रजस-तमस प्रधान। तीनों ही गुण मूल में मन-प्राण-वाक् रूप अविनाभाव ही हैं। केवल अल्पता-प्रधानता का भेद रहता है। चूंकि प्रत्येक कर्ता ही त्रिगुणी रहता है, अत: उसके कर्म भी इसी तरह तीन प्रकार के हो जाते हैं, चौथा स्तर तो प्रकृति के पार है। 'निस्त्रैगुण्य भवार्जुन' इसी स्तर की ओर इंगित करता है। तब प्रकृति की भूमिका क्या है? इसका स्वरूप एवं पुरुष केसाथ सम्बन्ध क्या है? माया और प्रकृति में क्या भेद है? क्या क्षेत्र प्रकृति हैï? कृष्ण क्षेत्रज्ञ को पुरुष कहते हैं। पंचमहाभूत, सभी इन्द्रियां-इन्द्रियों के विषय, मन-बुद्धि-अहंकार-जीवात्मा सहित सब कुछ क्षेत्र ही हैं। इच्छा-आसक्ति-अविद्या-विद्या चेतना-धृति सब क्षेत्र में सम्मिलित है। तब क्या शेष रहा? ईश्वर? वही पुरुष है-क्षेत्रज्ञ है।

त्रिगुण का प्रभाव चूंकि प्रत्येक जीव के कर्म में दिखाई पड़ता है, अत: कहा जाता है कि प्रकृति ही जीवन को चलाती है। वास्तव में तो सृष्टि ब्रह्म और माया ही रचते हैं। प्रकृति अपने रंगों से सृष्टि को रंगीन बना देती है। प्रकृति अमृत सृष्टि को प्रभावित नहीं करती। मह:लोक में अव्यय पुरुष बीजारोपण करता है। उसके बाद ही प्रकृति का प्रतिबिम्ब जीव पर पड़ता है। चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब से ही जीव में प्रकृति प्रवेश करती है। सूर्य तथा पृथ्वी से भी क्रमश: अहंकृति और आकृति प्रतिबिम्बित होती है। ये तीनों भी एक साथ रहती हैं। एक के बदलने पर तीनों का स्वरूप बदल जाता है। यही त्रिगुणात्मक स्वभाव कहलाता है। इससे बाहर होने का यह अर्थ कदापि नहीं है कि जीव सृष्टि से बाहर जा चुका है। व्यक्ति के जीवन के ये बाहरी रंग सिमट गए हैं। उसकी इच्छाओं का स्वरूप बदलेगा, कर्म का स्वरूप बदलेगा, निश्चयात्मिका बुद्धि, मन की चंचलता आदि बदलने लगेंगे।

प्रकृति का प्रभाव इन्द्रियों पर पडऩे से सभी विषयों के बारे में निर्णय बदल जाता है। आसक्ति, सुख-दु:ख के प्रभाव त्रिगुणात्मक ही हैं। जहां कुछ नहीं है, वहां ये गुण कुछ न कुछ दिखाते रहते हैं। जैसे दीपक के आगे जिस रंग का कांच/कागज रख देंगे, तो प्रकाश भी उसी रंग का होकर दिखाई पड़ेगा। तीनों गुण भी अलग-अलग रंग के कांच हैं, जो आत्मा को घेरे रहते हैं तथा मिथ्या दृष्टि पैदा करते हैं। अर्जुन के विषाद का जितना विवरण प्रथम अध्याय में किया है, वह सारा प्रकृतिजन्य था।

प्रकृति की भूमिका जीवन को जटिल बना देती है। चौरासी लाख योनियों के निर्माण में इस प्रकृति की मूल भूमिका है। प्रकृति ही फलेच्छा के साथ कर्म करने को प्रेरित करती है। फल प्राप्ति ही पुनर्जन्म और भोग योनियों के निर्माण का मुख्य सूत्र है। यही ब्रह्म का विवर्त है। कृष्ण कह रहे हैं कि प्रकृति में स्थित पुरुष ही प्रकृति से उत्पन्न त्रिगुणात्मक पदार्थों को भोगता है। इन गुणों का संग ही जीवात्मा के अच्छी-बुरी योनियों में जन्म लेने का कारण है।

''पुरुष: प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्।
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु।।'' गीता 13.22

माया प्रकृति से भिन्न है। प्रकृति तो पुरुष को आवृत्त करके रखती है। सही अर्थों में तो ब्रह्म और माया दोनों को ही आवृत्त रखती है ताकि इनके स्वरूप को जाना न जा सके।

त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभि: सर्वमिदं जगत्।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्य: परमव्ययम्।। गीता 7.13।

त्रिगुण के कारण माया भी गुणयुक्त नजर आती है। भेद दृष्टि के कारण यहां माया और प्रकृति अभेद दिखाई पड़ती हैं, किन्तु हैं नहीं। माया तो ब्रह्म का बल है, आवरण नहीं। ब्रह्म यदि प्राण है तो माया उसे प्राणवान बनाए रखती है। माया की शिथिलता ही ब्रह्म की शिथिलता होगी। माया ही ब्रह्म में प्राण फंूकती है। ब्रह्म को त्रिगुण से बाहर निकलने को प्रेरित करती है। त्रिगुण से बाहर निकलते ही जीव सांसारिक कामनाओं को समझ पाने की स्थिति में आ जाता है। बुद्धि के संशय मिट जाते हैं। माया ही कामना है। प्रकृति के कारण मायाजन्य कामनाएं भी विकृत दिखाई पड़ती है।

प्रकृति से पार पाना मुक्ति का द्वार खोलता है। यहां जीव और माया का द्वन्द्व रहता है। माया को 'दुरत्यया' कहा है-मम माया दुरत्यया (गीता ७.१४)। यहां कृष्ण कह रहे हैं कि कोई जीव मेरी कृपा के बिना माया का पार नहीं पा सकता। ब्रह्म को सीमित कर देने वाली शक्ति साधारण क्यों कर हो? इसको देखकर ही तो ब्रह्म चलायमान हुए थे। ''एकोऽहं बहुस्याम्'' की इच्छा जागृत हुई थी। निद्रामग्न व्यक्ति के मन में इच्छा नहीं उठती। प्रलयकाल में जलरूपी समुद्र (विष्णु प्राण) शान्त/सुप्त है। मानो शेषनाग हिला, लहरें उठी, बुलबुले बहने लगे। सृष्टि का यही प्रारंभिक रूप है। निद्रा से जागते ही मन में कुछ करने की इच्छा उठ खड़ी होती है। इच्छा, कामना, माया, क्षुधा पर्यायवाची शब्द हैं।

अमृत सृष्टि में शुद्ध कामना होती है। कामना को ही सृष्टि का बीज कहते हैं। इसी कामनामय मन का बीज ईश्वर महद् योनि में वपन करते हैं, बोते हैं।

मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम्।
संभव: सर्वभूतानां ततो भवति भारत।। गीता 14.3

यहां तक कोई प्रकृति नहीं होती। प्रकृति की साम्य अवस्था ही प्रलय कहलाती है। प्रलयकाल में सभी योनियों के कारण शरीर रह जाते हैं, जो सृष्टिकाल में पुन: स्थूल शरीर धारण करते हैं।

कर्म को माया, प्रकृति स्वरूप प्रदान करते हैं। प्रारब्ध कर्मों के फल भी इच्छा को प्रभावित करते हैं। यही ईश्वर की इच्छा कही जाती है। इसमें आगे जीव की इच्छा जुड़ जाती है। यहां प्रकृति के तीन भाव जुड़ते हैं। भोग योनियों में स्वतंत्र कर्म की संभावना कम रहती है। केवल सात्विक/योगी प्रवृत्ति का जीव यदि इन योनियों में जाता है, तो उसका आत्मा जागृत रहता है। गजेन्द्र मोक्ष की कथा इसका उदाहरण है। यह गजेन्द्र पूर्वजन्म में राजा इन्द्रद्युम्न था, जो भगवान का परम भक्त था। पूर्वजन्म के भक्तिपूर्ण संस्कारों के कारण ही गजेन्द्र के प्राणों की रक्षा संभव हुई थी।

आत्मा के साथ कर्म का क्षेत्र वर्ण के रूप में ही आता है। सत्व-रज-तम ही आत्मा के तीन वर्ण ब्रह्म-क्षत्र्-विड् रूप बीज का अंग हो जाते हैं। अब यह जीव किसी भी योनि में जाए, इसका वर्ण साथ रहेगा, सूक्ष्म शरीर में। अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि वर्ण का प्रभाव शुक्र में रहता है, अत: पुरुष की प्रकृति में ही यह प्रभाव प्रतिलक्षित होता है। वीर्य पुरुष सृष्टि के विवर्त का संकेत है। ब्रह्म के वितान रूप में ही सृष्टि आगे बढ़ती है। शोणित ऋत अवस्था का नाम है, निराकार है, पृथ्वी है। उसका स्वयं का वीर्य नहीं होता। तीनों वर्ण ही ज्ञान-क्रिया-अर्थ रूप में मत्र्य सृष्टि का संचालन करते है। अत: प्रकृति का सम्बन्ध कर्म से होता ही नहीं है। वह कर्म को सत्कर्म या दुष्कर्म बना सकती है। परिणाम प्रभावित अवश्य कर देती है।

क्रमश:

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