
प्रतीकात्मक चित्र
सुनीता नारायण
(सतत विकास की हरित अवधारणा की पैरोकार, सीएसई की महानिदेशक)
क्या हम अब तक भी जीवाश्म ईंधन जलाने के दुष्प्रभावों से कोई सबक ले सके हैं? हम जानते हैं कि जलवायु परिवर्तन ऊर्जा की बढ़ती मांग का ही नतीजा है। जीवाश्म ईंधन, कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस को जलाने के कारण ही आज विश्व जलवायु संकट के कगार पर है। जलवायु परिवर्तन पर अंतरसरकारी पैनल की 2022 की रिपोर्ट में दोहराया गया है कि पृथ्वी ग्रह के अधिक गर्म होने के परिणाम भयावह होंगे। वास्तविकता यह है कि न केवल हमारी दुनिया बल्कि ऊर्जा बाजार उबल रहा है। रूस-यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू होने से पहले ही ईंधन की कीमतें काफी ऊंची चली गई थीं। सवाल यह है कि कीमतों में आया यह उछाल क्या हमें अधिक हरित और साफ-सुथरे भविष्य की ओर प्रवृत्त करेगा? या फिर सरकारें पुराने ढर्रे पर चलते हुए अब भी अपने भरोसेमंद जीवाश्म ईंधन तंत्र में ही दोबारा निवेश करेंगी? दूसरे शब्दों में क्या कीमतों का यह उतार-चढ़ाव ऊर्जा व्यवसाय को पुनर्जीवन देगा? इस पहेली का सामना खास तौर पर यूरोप और जर्मनी कर रहे हैं। यूरोप ने नवीनीकरण योग्य ऊर्जा में निवेश किया है लेकिन साथ ही अपनी ऊर्जा आवश्यकताएं पूरी करने के लिए यह प्राकृतिक गैस के आयात पर भी निर्भर है, जो कोयला व जीवाश्म ईंधन से ज्यादा स्वच्छ है। करीब 40 फीसदी प्राकृतिक गैस यहां रूस से आती है। अब युद्ध के चलते आपूर्ति बाधित हो गई है।
जर्मनी ने रूस से बाल्टिक सागर होकर आने वाली पूर्व निर्मित 'नॉर्ड स्ट्रीम 2' पाइपलाइन की प्रमाणीकरण प्रक्रिया फिलहाल रोक दी है। रूस के साथ मौजूदा गैस अनुबंधों को लेकर दोनों देशों के बीच स्थिति तनावपूर्ण है। जर्मन चांसलर ओलाफ शॉल्त्स ने 7 मार्च को एक वक्तव्य जारी कर कहा कि उनका देश और यूरोप अपनी ऊर्जा जरूरतों जैसे ऊष्मा, परिवहन और विद्युत के लिए पूरी तरह रूस पर निर्भर हैं और इसीलिए वे लघु अवधि में अनुबंध नहीं तोड़ सके। पर एक सच यह भी है कि यूरोप पर यूक्रेन और अमरीका की तरफ से अधिक प्रभावी कदम उठाने का दबाव है।
अमरीकी विदेश सचिव एंटनी ब्लिंकेन ने उसी दिन कहा कि उनका देश रूस से तेल आयात पर प्रतिबंध लगाने की संभावना के लिए यूरोपीय सहयोगियों के साथ समन्वय स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। इससे न केवल बाजार में स्थिति भयावह हुई, तेल की कीमतें बढ़कर 139 डॉलर (10,000 रुपए से ज्यादा) प्रति बैरल (करीब 159 लीटर) हो गई, बल्कि इससे इस बात के भी संकेत मिले कि जैसे-जैसे युद्ध आगे बढ़ेगा, कैसी परिस्थितियां सामने आ सकती हैं। इसलिए जरूरत है कि नीति के केंद्र में जलवायु परिवर्तन से बढ़कर न सही, तो कम से कम इसके बराबर तवज्जो ऊर्जा सुरक्षा को देने की जरूरत है। जर्मनी ने दो तरल प्राकृतिक गैस (एलएनजी) टर्मिनल बनाने का निर्णय किया है ताकि गैस आपूर्ति में विविधता लाई जा सके। इससे अमरीकी प्राकृतिक गैस कम्पनियों के लिए यूरोप नया बाजार बन गया है। दूसरी ओर, यूरोप ऊर्जा नवीनीकरण में निवेश की संभावनाएं खोज रहा है - पवन और सौर। इन स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों को 'स्वतंत्रता की ऊर्जा' मान कर अतिरिक्त महत्त्व दिया जा रहा है। सवाल यह है कि तेल बाजारों में चल रही अस्थिरता क्या ऊर्जा संचरण को पटरी से उतार देगी या इसे गति देगी?
यूनाइटेड किंगडम में भी ऐसा ही है, जिसने आक्रामक कटौती लक्ष्यों के साथ स्वयं को जलवायु नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित किया है। पर विडम्बना यह है कि जलवायु परिवर्तन पर यूके की समिति ने उत्तरी सागर में तेल और गैस निस्सरण को बढ़ाने में आ रही अड़चनों को दूर कर दिया है। यूके अपनी ऊर्जा आपूर्ति जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस पर उतना निर्भर नहीं है लेकिन इसकी घरेलू ऊर्जा कीमतें अप्रेल में दोगुनी हो जाएंगी। इसके ऊर्जा नियामक ने कीमतों की सीमा हटा दी है। जिसका असर तेल और गैस की बढ़ती कीमतों के साथ घरेलू बिल में दिखाई देगा। इसलिए यूके को चिंता है कि जनता को कहीं ऊर्जा की कमी का सामना न करना पड़े और वह इस वजह से आक्रोशित न हो जाए। इसलिए, जिस सरकार ने यह प्रचार किया था कि विकासशील विश्व को जलवायु परिवर्तन को देखते हुए कोयले से परहेज करना चाहिए, वही अब अपने जीवाश्म ईंधन उद्योग में पुन: निवेश करने का निर्णय कर रही है। तब क्या जलवायु परिवर्तन से जंग के प्रयासों का नतीजा ऊर्जा युद्ध की समाप्ति के रूप में सामने आएगा?
तेल व गैस की कीमतों में बढ़ोतरी का कारण पिछले दो सालों में कोविड-19 के कारण पूरी दुनिया में आई आर्थिक गिरावट है। नतीजतन ऊर्जा की मांग घट गई, निवेश घट गया और नई संभावनाएं नहीं जुड़ीं। लेकिन उसके बाद लॉकडाउन हटे और विभिन्न देशों में सामान्य व्यवसाय बहाल होने लगे तो ऊर्जा की मांग फिर बढ़ी। और इसी वजह से कीमतें बढ़ीं। युद्ध से यह स्थिति बिगड़ी ही है। साथ ही अब यह सुविधाजनक धारणा भी बन गई है कि जलवायु परिवर्तन से त्वरित मुकाबला करने के लिए ऊर्जा परिवर्तन पर ज्यादा जोर देना अनियोजित और अव्यावहारिक था। इससे बड़े पैमाने पर उथल-पुथल मची है और यह कारगर साबित नहीं होगा। इसके बजाय जरूरत इस बात की है कि ऐसे परिवर्तन की योजना बनाई जाए जो व्यावहारिक और संतुलित हो। तब यही पारम्परिक ऊर्जा व्यवसाय के उत्थान का तर्क बन जाता है। हालांकि इसमें कुछ अंतर है। यह तर्क जीवाश्म ईंधन से होने वाले उत्सर्जन की रोकथाम की बात करता है। साथ ही मीथेन कम करने और कार्बन अवशोषण तकनीक में निवेश की जरूरत बताता है ताकि रिफाइनरियों से होने वाला उत्सर्जन वापस जमीन में निस्तारित कर दिया जाए और हाइड्रोजन को अगली पीढ़ी का ईंधन बनाने में निवेश किया जाए।
इस प्रकार, मौजूदा ऊर्जा संकट के चलते विश्व एक बार फिर जीवाश्म ईंधन की ओर लौट सकता है, जिसे कई वर्षों से पृथ्वी पर जीवन दूभर बनाने और वातावरण में उत्सर्जन घोलने के लिए दोषी ठहराया जाता रहा है। लगता है हम अब भी जीवाश्म ईंधन जलाने के दुष्प्रभावों से सबक नहीं ले सके हैं। आज जब विश्व वक्त और 'कार्बन स्पेस' की कमी से जूझ रहा है, यह परिदृश्य वाकई बेहद चिंताजनक है।
Published on:
21 Mar 2022 04:40 pm
Copyright © 2026 Patrika Group. All Rights Reserved.
