
पाली जिले के वरकाणा िस्थत एक खेत में उगे ड्रेगन फ्रूट।
किसान, जो धरती के सीने पर हल चलाकर पसीने की बूंदों से सभी की जठराग्नि को शांत करते हैं। वे आज के समय में नवाचारों के साथ पसीना बहाकर नई इबारत लिख रहे हैं। ऐसी फसलों का उत्पादन कर रहे हैं, जिसके बारे में मारवाड़-गोडवाड़ क्षेत्र में सोचा तक नहीं जाता था। उन्होंने परम्परागत खेती को पीछे छोड़कर फसलों के उद्यान लगा दिए हैं। इससे उनकी आर्थिक िस्थति को सम्बल मिलने के साथ मारवाड़-गोडवाड़ में खेती के नए रास्ते भी खुले हैं। इसी का परिणाम है कि आज पाली जिले में 22 हैक्टेयर से अधिक भूमि में नींबू, बेर, अनार, आंवला, गूंदा, ड्रेगन फूड आदि के बगीचे लहलहा रहे हैं। कई किसानों ने रसायनों का उपयोग भी खेती में करना बंद कर दिया है। अब वे ऑर्गेनिक खेती से ही उत्पादन ले रहे हैं। वहीं कई नई तकनीक पॉलीहाउस आदि बनाकर खेती कर रहे हैं।
उचित बाजार का किसानों को इंतजार
किसानों ने नवाचार कर पसीने की बूंदों से भूमि को सिंचा, लेकिन उनकी मेहनत का फल देने वाले बाजार विकसित करने के किसी स्तर पर प्रयास नहीं हुए। नींबू तो स्थानीय स्तर पर बिक जाते हैं, लेकिन आंवरा, बेर, अनार, ड्रेगन फ्रूट जैसे उत्पाद बेचने के लिए उनको जिले से बाहर या राज्य से बाहर जाना पड़ता है। इससे लागत बढ़ जाती है और उनका मुृनाफा कम रह जाता है।
करीब 800 हैक्टेयर क्षेत्र बढ़ा
उद्यानिकी की फसलों का पहले जिले में चलन नहीं के बराबर था। इसका बड़ा कारण यह था कि उद्यानिकी के तहत उगाई जाने वाली फसलों से उत्पादन आने में तीन से चार साल का समय लग जाता। ऐसे में किसान परम्परागत खेती पर ही निर्भर थे, लेकिन अब उसके लाभ के कारण पिछले दस साल में जिले में करीब 800 हैक्टेयर में उद्यानिकी की फसल अधिक बोई जा रही है। किसानों का रुझान भी बढ़ता जा रहा है।
पाली में लगे बगीचों से इतना हो रहा उत्पादन
नींबू: करीब 1650 हैक्टेयर में लगे बगीचों से हर साल 23-24 हजार मैटि्रक टन उत्पादन
बेर: करीब 140 हैक्टेयर में बुवाई से प्रति वर्ष 280 मैटि्रक टन उत्पादन
अनार: 115 हैक्टेयर के बगीचों में लगी फसल से हर साल 650 मैटि्रक टन उत्पादन
आंवला: 245 हैक्टेयर में लहलहाने वाली फसल से साल में 500 मैटि्रक टन उत्पादन
लसोड़ा (गूंदा): 60 हैक्टेयर क्षेत्र की फसल से हर साल 160 मैटि्रक टन उत्पादन
ड्रेगन फ्रूट: जिले में करीब 14 हजार हैक्टेयर में उगाया जा रहा
गुजरात के कच्छ में देखा और पाली में उगा दिया
वरकाणा के जब्बरसिंह सोलंकी गुजरात गए थे। वहां कच्छ के भूज में ड्रेगन फ्रूट देखा तो अपने खेत में भी उगाने का विचार किया। जानकारी जुटाकर गांव लौटे और एक हैक्टेयर में ड्रेगन फ्रूट की खेती शुरू कर दी। वे इसके साथ ही नींबू का भी उत्पादन करते हैं। उन्होंने बताया कि वर्ष 2019 में उन्होंने ड्रेगन फ्रूट की बुवाई की थी। इससे पहली बार फसल 2021 में मिली। इसके बाद वर्ष 2022 में उत्पादन बढ़ा और 2023 में उत्पादन और बढ़ गया। उनको भी बाजार नहीं मिलने के कारण फसल बेचने के लिए अलग-अलग जगह जाना पड़ता है। उन्होंने उदयपुर, जोधपुर व अजमेर में फ्रूट बेचा। अहमदाबाद तक गए। नींबू की फसल तो स्थानीय स्तर पर बिक जाती है, लेकिन ड्रेगन फ्रूट के लिए मशक्कत करनी पड़ती है।
Updated on:
23 Dec 2023 09:52 am
Published on:
23 Dec 2023 09:52 am
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