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Rajasthan: राजस्थान के 7 जिलों की बुझेगी प्यास, सोम-कमला-अम्बा प्रोजेक्ट पर खर्च होंगे 5 हजार 900 करोड़ रुपए

Rajasthan Water Project: पाली और पश्चिमी राजस्थान के कई जिलों के लिए सोम-कमला-अम्बा परियोजना को जल संकट समाधान की दिशा में अहम माना जा रहा है। सरकार की डीपीआर और बजट घोषणा के बाद इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को लेकर क्षेत्र में नई उम्मीदें जगी हैं।

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पाली

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Rakesh Mishra

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नागेश शर्मा

May 02, 2026

Rajasthan Water Project

एआई तस्वीर

पाली। पश्चिमी राजस्थान की जल समस्या के समाधान की दिशा में सोम-कमला-अम्बा परियोजना अहम साबित हो सकती है। इस परियोजना की डीपीआर (विस्तृत परियोजना रिपोर्ट) तैयार करने के लिए वित्तीय वर्ष में 100 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे। परियोजना का उद्देश्य मानसून के दौरान व्यर्थ बह रहे अधिशेष जल को संग्रहित कर नहरों के माध्यम से सोम-कमला-अम्बा प्रणाली तक पहुंचाना है, जिससे जवाई नदी को नित्यवाहिनी बनाने और जवाई बांध के पुनर्भरण की संभावनाएं मजबूत होंगी।

परियोजना की क्रियान्विति दीर्घकालिक है, लेकिन यदि यह धरातल पर उतरती है तो पाली-जालोर सहित पश्चिमी राजस्थान के कई जिलों के कृषि क्षेत्र को बड़ा लाभ मिलेगा। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के पाली के रोहट में गुरुवार को जल आवश्यकता की पूर्ति के लिए राम जल सेतु लिंक परियोजना, देवास परियोजना, यमुना जल समझौता तथा सोम-कमला-अम्बा की डीपीआर बनवाने की घोषणा से पाली और जालोर जिले को उम्मीद बंध गई है।

इसलिए प्रोजेक्ट अहम

30 अप्रेल को पाली के रोहट और 17 दिसंबर 2025 को मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने आहोर में इस प्रोजेक्ट को धरातल पर साकार करने का उल्लेख किया था। अब इस प्रोजेक्ट की डीपीआर के लिए वित्तीय वर्ष में 100 करोड़ रुपए की घोषणा ने उम्मीदों को पंख लगा दिए हैं। मानसून अवधि में अनास नदी के व्यर्थ बहकर जा रहे अधिशेष जल को कृत्रिम जलाशय बनाकर फीडर नहर के माध्यम से सोम-कमला-अम्बा तक डायवर्ट करने के लिए 5 हजार 900 करोड़ रुपए की परियोजना प्रस्तावित है।

7 जिलों का भविष्य

इस प्रोजेक्ट की क्रियान्विति से पाली, जालोर, बांसवाड़ा, सलूम्बर, प्रतापगढ़, डूंगरपुर और उदयपुर जिले लाभान्वित होंगे। प्रोजेक्ट का भविष्य डीपीआर बनने और उसके बाद प्रोजेक्ट लागत के आकलन पर निर्भर करेगा। 17 दिसंबर 2025 को जल संसाधन विभाग और किसानों के बीच वार्ता हुई थी।

यों समझें परियोजना को

गुजरात सीमा से पहले साबरमती प्रथम और सेई नदी बांध प्रस्तावित है, जिसकी क्षमता 6 हजार एमसीएफटी है। यहां सीजन में पानी की भरपूर आवक होती है। सेई बांध से करीब 20 किलोमीटर दूरी पर जोगीवर क्षेत्र है, जिसकी समुद्रतल से ऊंचाई 410 मीटर है। यहां लघु सिंचाई परियोजना प्रस्तावित है। गौतम ऋषि नदी के प्रवाह क्षेत्र में लुंदाड़ा बांध की समुद्रतल से ऊंचाई 360 मीटर है।

इसी तरह प्रस्तावित साबरमती प्रथम बांध की ऊंचाई 408 मीटर है। इस तरह लुंदाड़ा नदी क्षेत्र से साबरमती प्रथम और जोगीवर की ऊंचाई अधिक है, जहां से प्राकृतिक प्रवाह से गौतम ऋषि नदी तक पानी पहुंचाया जा सकता है। साबरमती बांध प्रथम तल से लुंदाड़ा गौतम ऋषि नदी की टनल 40 किलोमीटर और जोगीवर लघु सिंचाई परियोजना से साबरमती तक 8 किलोमीटर टनल पानी की उपलब्धता के लिए बनानी होगी। इस तरह करीब 50 किलोमीटर टनल से प्रोजेक्ट की क्रियान्विति हो सकेगी। यही नहीं, यह टनल बन जाती है तो भविष्य में मानसी और वंकल का पानी भी जालोर-सिरोही को मिल सकेगा।

जवाई बांध से 4 गुना अधिक पानी

विभागीय जानकारी के अनुसार कोटड़ा तहसील में गुजरात सीमा के पास बुंजा गांव में सेई नदी चकसांडिया में बांध बनना है। साबरमती प्रथम पर भी बांध बनना है। इस तरह बुंजा और चकसांडिया बांध में पानी की भरपूर आवक जारी रहेगी। इन बांधों से जवाई बांध की तुलना में 4 गुना अधिक पानी उपलब्ध हो सकेगा।

इन्होंने कहा

जल संसाधन विभाग के अधिकारियों के साथ अहम बैठक में इस विषय पर चर्चा हुई थी। पहले डीपीआर में जालोर का नाम शामिल नहीं था, जिसे अब शामिल किया गया है। बैठक में किसानों ने भी अहम सुझाव दिए हैं। किसानों को इसका लाभ मिलेगा।

  • रतनसिंह कानीवाड़ा, अध्यक्ष, भारतीय किसान संघ

राज्य सरकार ने भविष्य को देखते हुए यह अहम घोषणा की है। यह भविष्य से जुड़ा प्रोजेक्ट होगा।

  • वीरेंद्रसिंह सागर, अतिरिक्त मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग