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तेजस्वी यादव के सामने कठिन फैसला; मुस्लिम चेहरा या सवर्ण कार्ड, कौन होगा RJD का MLC कैंडिडेट?

Bihar MLC Election: बिहार विधान परिषद की 10 सीटों के लिए होने वाले चुनावों को लेकर राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई है। NDA ने अपने नौ उम्मीदवारों की घोषणा करके स्थिति स्पष्ट कर दी है, लेकिन राजद में अभी भी सस्पेंस बना हुआ है।
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पटना

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Anand Shekhar

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Updated: 7 Jun 2026, 11:09 AM IST

Tejashwi Yadav

राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव (Photo - ANI)

Bihar MLC Election: बिहार में विधान परिषद की 10 सीटों (9 द्विवार्षिक और 1 उपचुनाव) पर होने जा रहे चुनाव ने राज्य के राजनीतिक गलियारों में भारी हलचल पैदा कर दी है। NDA ने अपने उम्मीदवारों के नामों की घोषणा कर अपनी स्थिति पूरी तरह साफ कर दी है। एनडीए की तरफ से भाजपा ने चार, जेडीयू ने चार और चराग पासवान की पार्टी लोजपा (रा.) ने एक उम्मीदवार के नाम का ऐलान कर दिया है। लेकिन असली सस्पेंस राजद में देखने को मिल रहा है, जिसने अब तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं। विधान परिषद के मौजूदा संख्या बल के गणित को देखें तो विपक्ष के खाते में केवल एक ही सीट आती दिख रही है। ऐसे में इस इकलौती सुरक्षित सीट के लिए आरजेडी के भीतर दावेदारों की लंबी कतार लग गई है।

वोटों का गणित

बिहार विधान परिषद के नियमों के मुताबिक, एक एमएलसी उम्मीदवार को सीधे जीत दर्ज करने के लिए कम से कम 28 विधायकों के प्रथम वरीयता के समर्थन की आवश्यकता होती है। वर्तमान में आरजेडी के पास अपने केवल 25 विधायक हैं। इसका मतलब साफ है कि विपक्ष के इकलौते उम्मीदवार को जिताने के लिए तेजस्वी यादव को अपने बूते के अलावा कांग्रेस या असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM के विधायकों के समर्थन की सख्त जरूरत होगी। सहयोगियों पर यही निर्भरता उम्मीदवार के चयन को और अधिक पेचीदा बना रही है।

राजद का मुस्लिम चेहरा या सवर्ण कार्ड?

आरजेडी के भीतर इस इकलौती सीट के लिए दो अलग-अलग विचारधाराओं और सामाजिक समीकरणों के बीच लॉबिंग चल रही है। हाल ही में हुए राज्यसभा चुनाव के दौरान AIMIM के विधायकों ने महागठबंधन के उम्मीदवार के पक्ष में वोट किया था। अब ओवैसी की पार्टी इसके बदले आरजेडी से एमएलसी की सीट की डिमांड कर रही है। यदि तेजस्वी यादव किसी मुस्लिम चेहरे को उम्मीदवार बनाते हैं, तो ओवैसी की पार्टी शायद राजद उम्मीदवार का समर्थन करे, लेकिन यदि राजद के निर्णय से AIMIM संतुष्ट नहीं होती है तो एक सीट पर चुनाव रोचक हो सकता है।

दूसरी तरफ पार्टी के सबसे पुराने सांगठनिक और आर्थिक स्तंभों में से एक सुनील सिंह (बिस्कोमान के पूर्व चेयरमैन) की दावेदारी भी बेहद मजबूत मानी जा रही है। राजपूत (सवर्ण) समाज से आने वाले सुनील सिंह को पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी का मुंहबोला भाई भी कहा जाता है। बिस्कोमान का चुनाव हारने के बाद उनके सियासी वजूद को बचाए रखने और सवर्ण समाज में एक सकारात्मक संदेश देने के लिए पार्टी का एक बड़ा धड़ा उनके नाम की पैरवी कर रहा है।

उपेंद्र कुशवाहा पर भी टिकी नजर

बिहार की इस राजनीतिक जंग में एक और दिलचस्प मोड़ आ सकता है। एनडीए गठबंधन का हिस्सा होने के बावजूद राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा के बेटे मंत्री दीपक प्रकाश के लिए एनडीए ने कोई सीट घोषित नहीं की है। यदि दीपक प्रकाश विधान परिषद नहीं जा पाते हैं, तो उन्हें मंत्री पद गंवाना पड़ सकता है। अब यह देखना दिलचस्प होगा की कुशवाहा क्या करते हैं। हालांकि, यह पूछे जाने पर कि अब आगे क्या करेंगे, उपेंद्र कुशवाहा ने कहा कि इंतजार कीजिए, अभी बहुत समय है।

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