8 जनवरी 2026,

गुरुवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

catch_icon

प्लस

epaper_icon

ई-पेपर

profile_icon

प्रोफाइल

जंग पर जाने से पहले… अरुण ‘इक्कीस’ खेत्रपाल की मां ने उनसे कही थी ये बात

Arun Khetarpal Story: अरुण खेत्रपाल भारतीय सेना के टैंक कमांडर थे। उन्होंने 10 पाकिस्तानी टैंकों को नष्ट किया। वे 1971 के युद्ध के प्रमुख नायकों में से एक थे। अरुण खेत्रपाल की बहादुरी की कहानी दिल्ली से शुरू होकर युद्ध भूमि में अमर हो गई। वे न केवल एक सैनिक थे, बल्कि युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा।

3 min read
Google source verification
Arun Khetarpal Story

शहीद अरुण ‘इक्कीस’ खेत्रपाल की शौर्यगाथा। (फोटो डिजाइन: पत्रिका)

Arun Khetarpal Story: आईआईटी दिल्ली के 70 पार कर गए पुराने बहुत से स्टूडेंट्स 'इक्कीस' फिल्म देख रहे हैं। उनमें प्रेम भुटानी भी हैं। वे आज जब 'इक्कीस' फिल्म देखने जा रहे थे तब उनके सामने भारत-पाकिस्तान के बीच 1971 की जंग की यादें चलचित्र की तरह से चल रही थीं। वे तब आईआईटी दिल्ली में पढ़ रहे थे। वहां उनके क्लासमेट मुकेश खेत्रपाल भी थे। मुकेश के बड़े भाई सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल के शौर्य की जानकारियां सबको मिल रही थीं। उन्हें याद है कि जब अरुण खेत्रपाल के रणभूमि में शहीद होने का समाचार आया तो आईआईटी दिल्ली के दर्जनों स्टूडेंट्स अरुण खेत्रपाल के राजधानी दिल्ली के नारायणा स्थित घर में गए थे। फिल्म 'इक्कीस' की कहानी सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की वीरता पर आधारित है।

कौन सी मोटर साइकिल थी?

अरुण खेत्रपाल का परिवार देश के विभाजन के वक्त पाकिस्तान के शहर सरगोधा से दिल्ली आकर बसा था। अरुण का बचपन और शुरूआती शिक्षा दिल्ली में हुई। उनके पास जावा मोटर साइकिल हुआ करती थी। उन्होंने कुछ समय तक सेंट कोलंबस स्कूल में भी पढ़ाई की। दिल्ली अरुण के लिए सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि घर और यादों का केंद्र था। वे 1971 के युद्ध से पहले अरुण दिल्ली आए थे। उनके भाई मुकेश खेत्रपाल ने एक बार बताया था कि 1971 की एक सर्द शाम को अरुण घर पहुंचे। डिनर टेबल पर हमारी मां महेश्वरी खेत्रपाल ने कहा, "शेर की तरह लड़ना अरुण, कायर की तरह वापस मत आना।" अरुण मुस्कुराए और फिर ट्रेन से जम्मू के लिए रवाना हो गए जम्म-तवी एक्सप्रेस से।

इंडिया गेट से नोएडा तक

उसके बाद जंग में जो कुछ हुआ वो सबको पता है। इंडिया गेट के राष्ट्रीय युद्ध स्मारक में उनकी कांस्य प्रतिमा परम योद्धा स्थल में स्थापित है, जो दिल्ली वालों के लिए गर्व का प्रतीक है। उनके नाम पर ही नोएडा का अरुण विहार है। मात्र 21 वर्ष की आयु में उन्होंने असाधारण शौर्य दिखाया और मरणोपरांत परम वीर चक्र (PVC) से सम्मानित हुए, जो भारत का सर्वोच्च युद्ध कालीन वीरता पुरस्कार है। उनकी मां ने यह सम्मान राष्ट्रपति वी.वी. गिरी से गणतंत्र दिवस परेड में 1972 में ग्रहण किया था।

अरुण खेत्रपाल भारतीय सेना के टैंक कमांडर थे। उन्होंने 10 पाकिस्तानी टैंकों को नष्ट किया। वे 1971 के युद्ध के प्रमुख नायकों में से एक थे। अरुण खेत्रपाल की बहादुरी की कहानी दिल्ली से शुरू होकर युद्ध भूमि में अमर हो गई। वे न केवल एक सैनिक थे, बल्कि युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा।

पिता-पुत्र दोनों दुश्मन की कमर तोड़ रहे थे

अरुण खेत्रपाल के परदादा महाराजा रणजीत सिंह की सिख खालसा आर्मी में थे, दादा प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटिश आर्मी में थे, और पिता ब्रिगेडियर एम.एल. खेत्रपाल भारतीय सेना के कोर ऑफ इंजीनियर्स में थे। वे भी 1971 के युद्ध में लड़े थे। यानी पिता-पुत्र दोनों दुश्मन की कमर तोड़ रहे थे।

प्रेम भुटानी बता रहे थे कि युद्ध की समाप्ति के बाद अरुण खेत्रपाल की स्मृति में आईआईटी, दिल्ली में एक शोक सभा भी आयोजित हुई थी। अब अपने मित्र मुकेश खेत्रपाल और आईआईटी के अन्य दोस्तों के साथ भी इक्कीस देखने की योजना बना रहे हैं।

इस बीच, अरुण खेत्रपाल की शहादत के बाद एक भावुक कहानी जुड़ी। 2001 में उनके पिता ब्रिगेडियर खेत्रपाल पाकिस्तान गए। वहां पाकिस्तानी ब्रिगेडियर ख्वाजा मोहम्मद नासिर (13 लांसर्स) ने माना किया कि उन्होंने ही अरुण का टैंक नष्ट किया था। नासिर ने कहा, "आपका बेटा बहुत बहादुर था, वह हमारी हार का कारण बना।" उन्होंने अरुण के टैंक की तस्वीरें भेजीं और लिखा कि अरुण "अटूट चट्टान" की तरह खड़े थे। उनकी वीरता ने भारत को गर्व दिया, और दिल्ली का उनका संबंध हमें याद दिलाता है।


बड़ी खबरें

View All

Patrika Special News

ट्रेंडिंग