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चिमनी के धुएं से बनेगा सीमेंट और ईंधन: कार्बन कैप्चर पर 20 हजार करोड़ खर्च करेगी सरकार, क्या है प्लान?

भारत सरकार ने उद्योगों की चिमनियों से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड को अब उपयोगी उत्पाद बनाने के लिए कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल करने की तैयारी है। आइए जानते हैं, क्या है सरकार का प्लान?
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भारत

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Vinay Shakya

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Updated: 31 Oct 2026, 6:40 PM IST

Carbon capture to produce fuel

सांकेतिक इमेज (सोर्स- Janani)

कारखानों की चिमनियों से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड को अब कचरा नहीं, कच्चा माल माना जाएगा। भारत सरकार ने कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (सीसीयूएस) तकनीक को बढ़ावा देने के लिए बड़ा दांव लगाया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 1 फरवरी 2026 को बजट 2026-27 के भाषण में अगले 5 साल के लिए 20,000 करोड़ रुपए के परिव्यय का प्रस्ताव रखा था।

कहां लगेगा पैसा?

सरकार की इस योजना से बिजली, इस्पात, सीमेंट, रिफाइनरी और रसायन, इन 5 उद्योगों को कार्बन मुक्त करने में मदद मिलेगी। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए बिजली मंत्रालय के तहत शुरुआती आवंटन 500 करोड़ रुपए का है। यानी 20,000 करोड़ की रकम एक साथ नहीं, किस्तों में खर्च होगी। योजना का अंतिम ढांचा तय होने के बाद ही आगे की दिशा साफ होगी।

कैसे काम करती है तकनीक?

उत्सर्जन से पहले फैक्ट्रियों और बिजली संयंत्रों की गैसों से कार्बन डाइऑक्साइड अलग की जाती है। इसे शुद्ध करके, दबाव देकर सघन करते हैं और पाइपलाइन या जहाज से उपयोग या भंडारण स्थल तक भेजते हैं। इससे कंक्रीट, यूरिया, ग्रीन मेथनॉल और अन्य रसायन बन सकते हैं।

नीति आयोग के मुताबिक कृष्णा-गोदावरी बेसिन, दक्कन ट्रैप और पुराने तेल-गैस क्षेत्रों में सीओ2 भंडारण की बड़ी क्षमता है। नीति आयोग की 2022 की रिपोर्ट में देश की सैद्धांतिक भंडारण क्षमता 600 गीगाटन तक आंकी गई, जिसमें आधे से ज्यादा पश्चिम भारत में है।

सीमेंट बनाने पर खास फोकस

देश के कुल कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में सीमेंट उद्योग की हिस्सेदारी 5.8 प्रतिशत है। नेट-जीरो लक्ष्य के लिए इसे सीसीयूएस से 35 से 45 प्रतिशत कटौती करनी होगी। सरकार पिछले साल सीमेंट क्षेत्र में पांच कार्बन कैप्चर टेस्टबेड को मंजूरी दे चुकी है। इनमें आईआईटी मद्रास और अल्ट्राटेक जैसी साझेदारियां शामिल हैं। यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर टैक्स के खतरे ने भी इस पहल को जरूरी बनाया है।

सरकार के लिए चुनौतियां

विशेषज्ञों का कहना है कि परियोजना की राह आसान नहीं है। देश में अभी कार्बन डाइऑक्साइड की समर्पित पाइपलाइन नहीं है। भंडारण स्थलों का स्वामित्व, दीर्घकालिक जिम्मेदारी और निगरानी के नियम भी तय नहीं हैं। कई जानकार कहते हैं कि दक्कन ट्रैप जैसी बेसाल्ट संरचनाओं में भंडारण तकनीकी रूप से जटिल है और कम परखा गया है।

अतिरिक्त लागत से बिजली, इस्पात और सीमेंट महंगे हो सकते हैं। ग्लोबल सीसीएस इंस्टीट्यूट के मुताबिक दुनिया में करीब 50 सीसीयूएस संयंत्र चल रहे हैं, जो मिलकर सालाना लगभग 5 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड पकड़ते हैं। भारत में इस्पात क्षेत्र में अब तक 2 पायलट परियोजनाएं हुई हैं।

इनमें 2021 में जमशेदपुर में टाटा स्टील का 5 टन प्रतिदिन का संयंत्र है। उत्सर्जित गैसे के उपयोग वाला रास्ता भी हर स्थिति में समाधान नहीं है। सीमेंट या रसायन में इस्तेमाल हुई कार्बन डाइऑक्साइड कई बार फिर वायुमंडल में लौट सकती है। इसलिए असली कसौटी यह होगी कि कितना कार्बन वास्तव में रुका और कितना लंबे समय तक सुरक्षित रहा।