
सांकेतिक इमेज (सोर्स- Janani)
दुनिया में प्रदूषण फैलाने के मामले में चीन 'नंबर-1' पर है। UNEP उत्सर्जन अंतर रिपोर्ट 2026 (UNEP Emission gap report 2026), वैश्विक जलवायु रिपोर्टों और EDGAR 2026 Emissions Report के अनुसार, चीन हर साल करीब 1610 करोड़ टन (16 बिलियन टन) ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कर रहा है, जो पूरी दुनिया के कुल उत्सर्जन का लगभग 27% है।
ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन की लिस्ट में भारत तीसरे नंबर पर है। भारत में सालाना 450 करोड़ टन (4.5 बिलियन टन) ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन हो रहा है। रिपोर्ट ने साफ किया है कि भारत ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के मामले में भले ही दुनिया में तीसरे नंबर पर है, लेकिन प्रति व्यक्ति उत्सर्जन के मामले में अभी भी विकसित देशों से काफी बेहतर स्थिति में है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, पूरी दुनिया मिलकर सालाना लगभग 58.4 बिलियन टन ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कर रही है। दुनिया भर से निकलने वाली इन गैसों में दो-तिहाई से अधिक हिस्सा जीवाश्म स्रोतों (Fossil Sources) का है। कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस को जलाने से निकलने वाली कार्बन डाईऑक्साइड इसका सबसे बड़ा हिस्सा है, जो सालाना लगभग 38.1 बिलियन टन है।
कार्बन डाईऑक्साइड के उत्सर्जन के बाद मीथेन का नंबर आता है। यह विशेषकर पशुपालन और धान की खेती, कचरे के ढेरों और गैस पाइपलाइनों के रिसाव से निकलती है। नाइट्रस ऑक्साइड और एफ-गैसें यह खेती में इस्तेमाल होने वाले रासायनिक उर्वरकों और औद्योगिक रेफ्रिजरेशन/एसी से निकलती हैं, जो जलवायु को काफी नुकसान पहुंचाती हैं। इसके साथ ही जंगलों को काटने या जंगलों में लगने वाली आग के कारण भी भारी मात्रा में कार्बन वायुमंडल में मिलता है।
यूएनईपी और यूरोपियन कमीशन की EDGAR 2026 रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के शीर्ष 6 देश मिलकर कुल वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग 62% हिस्सा पैदा करते हैं। इनमें सबसे अधिक चीन (China) उत्सर्जन करता है, जो लगभग 16.1 बिलियन टन है। दूसरे नंबर पर अमेरिका (United States) है जो लगभग 6 बिलियन टन ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन करता है। इसके बाद, भारत (India) लगभग 4.5 बिलियन टन, यूरोपीय संघ (EU) लगभग 3.1 बिलियन टन, रूस (Russia) लगभग 2.67 बिलियन टन, इंडोनेशिया (Indonesia) लगभग 1.2 से 1.3 बिलियन टन ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करता है।
वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड का उत्सर्जन एक सीमा तक जरूरी है। ताकि धरती का तापमान रहने लायक बना रहे। लेकिन, जब उत्सर्जन जरूरत से ज्यादा होने लगता है, तो ये धरती की गर्मी यानी इन्फ्रारेड रेडिएशन को अंतरिक्ष में जाने से रोक देती हैं। इससे गर्मियों में तापमान 48°C से 50°C पार करने लगा है, जिससे हीटस्ट्रोक और मौतों की संख्या बढ़ रही है। साथ ही समंदर का तापमान बढ़ रहा है।
एल नीनो और सुपर एल नीनो सक्रिय हुआ है। समुद्र का तापमान बढ़ने से चक्रवातों और तूफानों की तीव्रता बहुत बढ़ गई है। इसके साथ ही हिमालय, आर्कटिक और अंटार्कटिका की बर्फ तेजी से पिघल रही है। इससे शुरुआत में नदियों में बाढ़ आएगी और बाद में पानी का संकट गहरा जाएगा। समंदर का जलस्तर बढ़ गया है। इससे मुंबई, कोलकाता, न्यूयॉर्क और मालदीव जैसे निचले तटीय इलाकों और द्वीपों के डूबने का खतरा पैदा हो गया है।
बेमौसम बारिश, सूखा और अधिक गर्मी के कारण फसलों का चक्र बिगड़ गया है। गेहूं, धान और मक्के जैसी मुख्य फसलों की पैदावार घट रही है, जिससे दुनिया भर में भुखमरी और महंगाई का खतरा बढ़ रहा है। भूमिगत जल (Groundwater) का रीचार्ज न होने और ग्लेशियर सूखने से करोड़ों लोगों को पीने के साफ पानी के लिए तरसना पड़ रहा है।
यही नहीं, गर्म और नम मौसम के कारण डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया फैलाने वाले मच्छर बढ़ रहे हैं। ये बीमारियां अब उन ठंडे इलाकों में भी फैल रही हैं, जहां पहले नहीं थीं। कार्बन उत्सर्जन के साथ-साथ वायु प्रदूषण भी बढ़ता है, जिससे अस्थमा, फेफड़ों का कैंसर और दिल के दौरे के मामले बढ़ रहे हैं।
Updated on:
31 Oct 2026, 8:22 PM IST
Published on:
31 Oct 2026, 8:22 PM IST
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