3 अगस्त 2026,

सोमवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

जलवायु संकट से लड़ाई में आदिवासियों का पारंपरिक ज्ञान क्यों बन रहा सबसे बड़ा हथियार?

Indigenous Knowledge Climate Change: जलवायु संकट और जैव विविधता संरक्षण के दौर में आदिवासियों का पारंपरिक ज्ञान भारत के लिए बड़ी उम्मीद बनकर उभर रहा है। इनकी जंगल, जल संरक्षण, बीज संरक्षण और सदियों पुरानी तकनीकें अहम हैं। संयुक्त राष्ट्र, वैज्ञानिक शोध और भारत के कई उदाहरण बताते हैं इनकी भूमिका क्यों महत्वपूर्ण?
5 min read
Google source verification

भारत

image

Sanjana Kumar

Aug 03, 2026

Indigenous Knowledge and Climate Change

Indigenous Knowledge and Climate Change: विज्ञान के दौर में आदिवासियों का हजारों साल पुराना ज्ञान बन सकता है जलवायु संकट से उबरने में भारत की सबसे बड़ी ताकत। (AI Creative)

Indigenous Knowledge Climate Change: प्रकृति के साथ सदियों से जीने वाली आदिवासी सभ्यताएं आज दुनिया को बता रही हैं कि जंगल सिर्फ पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि एक जीवित तंत्र है। जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता संकट और प्राकृतिक आपदाओं के दौर में उनका पारंपरिक ज्ञान वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं के लिए नई उम्मीद बन रहा है।

जब दुनिया जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए आधुनिक तकनीक, नए मॉडल और बड़े-बड़े समाधान खोज रही है, वहीं भारत के जंगलों में रहने वाले आदिवासी समुदाय सदियों पुराने अपने अनुभवों के जरिए प्रकृति संरक्षण का रास्ता दिखा रहे हैं। जंगलों की भाषा समझने वाले ये समुदाय अब सिर्फ वनवासी नहीं, बल्कि जलवायु संकट से लड़ाई के अहम सहयोगी माने जा रहे हैं।

दुनिया की जैव विविधता के सबसे बड़े संरक्षक

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, दुनिया की आबादी में आदिवासी समुदायों की हिस्सेदारी लगभग 6 फीसदी है, लेकिन वे दुनिया के करीब 80 फीसदी शेष जैव विविधता वाले क्षेत्रों से जुड़े हुए हैं। यही वजह है कि वैश्विक स्तर पर उन्हें जैव विविधता संरक्षण का महत्वपूर्ण प्रहरी माना जाता है।

वैज्ञानिक अध्ययनों में बार-बार सामने आया है कि जिन क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों की भागीदारी वन संरक्षण में अधिक होती है, वहां जंगलों की स्थिति बेहतर रहती है। उनकी जीवनशैली प्रकृति के दोहन के बजाय सह-अस्तित्व पर आधारित रही है।

भारत में 10 करोड़ से ज्यादा आदिवासी आबादी

भारत में आदिवासी समुदायों का प्रकृति से रिश्ता हजारों साल पुराना है। जनगणना 2011 के अनुसार, देश में अनुसूचित जनजाति (ST) की आबादी करीब 10.45 करोड़ है, जो कुल आबादी का लगभग 8.6 प्रतिशत है। देश में 700 से अधिक मान्यता प्राप्त जनजातियां हैं, जिनकी अपनी अलग-अलग संस्कृति, परंपराएं और प्रकृति संरक्षण की पद्धतियां हैं।

मध्य भारत के जंगलों से लेकर पूर्वोत्तर के पहाड़ी क्षेत्रों तक आदिवासी समुदायों ने स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार ऐसे तरीके विकसित किए हैं, जो आज जलवायु परिवर्तन के दौर में उपयोगी साबित हो रहे हैं।

जंगलों के वैज्ञानिक, अनुभव से बनी संरक्षण की तकनीक

आदिवासी समुदाय जंगल को केवल संसाधन नहीं मानते, बल्कि जीवन का आधार समझते हैं। उनके पारंपरिक ज्ञान में कई ऐसे तरीके शामिल हैं, जिनका महत्व अब वैज्ञानिक शोधों में भी स्वीकार किया जा रहा है।

  1. औषधीय पौधों की पहचान : आदिवासी समुदाय पीढ़ियों से जंगलों में मौजूद औषधीय पौधों का उपयोग करते आए हैं। कई आधुनिक शोध संस्थान अब इस पारंपरिक ज्ञान का वैज्ञानिक अध्ययन कर रहे हैं ताकि जैव विविधता और औषधीय संसाधनों को संरक्षित किया जा सके।
  2. जल संरक्षण की स्थानीय तकनीकें : कई आदिवासी क्षेत्रों में छोटे जल स्रोतों, पहाड़ी जल संचयन और प्राकृतिक जल प्रवाह को बचाने की परंपराएं रही हैं। ये तकनीकें कम बारिश वाले क्षेत्रों में भी पानी की उपलब्धता बनाए रखने में मदद करती हैं।
  3. मिश्रित खेती और बीज संरक्षण: आदिवासी किसान एक ही खेत में कई तरह की फसलें उगाने की परंपरा रखते हैं। यह जैव विविधता बढ़ाने के साथ मौसम में बदलाव के खतरे को कम करता है। स्थानीय बीजों का संरक्षण भी जलवायु अनुकूल खेती का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।

जंगल बचाने में सामुदायिक भागीदारी की ताकत

दुनिया भर में हुए कई अध्ययनों से पता चलता है कि जिन क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों को वन प्रबंधन में अधिकार और भागीदारी मिली, वहां जंगलों की कटाई को नियंत्रित करने में मदद मिली।

भारत में भी सामुदायिक वन प्रबंधन और वन अधिकार कानून के तहत स्थानीय समुदायों की भूमिका को बढ़ावा दिया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि जंगल संरक्षण में स्थानीय लोगों को केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि भागीदार बनाना जरूरी है।

जो जंगल बचाते हैं, वही सबसे ज्यादा प्रभावित

जलवायु संकट की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि प्रकृति की रक्षा करने वाले समुदाय ही इसके सबसे गंभीर प्रभाव झेल रहे हैं। बदलता मौसम, अनियमित बारिश, लंबे सूखे, जंगलों में बढ़ती आग और खेती पर बढ़ता संकट आदिवासी आजीविका को प्रभावित कर रहे हैं। जंगल आधारित अर्थव्यवस्था पर निर्भर समुदायों के लिए जलवायु परिवर्तन सीधा जीवन संकट बन रहा है।

वैज्ञानिक भी मान रहे हैं पारंपरिक ज्ञान की अहमियत

आज दुनिया भर में 'क्लाइमेट एडाप्टेशन' यानी जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अनुसार खुद को ढालने की रणनीतियों पर जोर दिया जा रहा है। इसमें स्थानीय और आदिवासी ज्ञान को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि आधुनिक विज्ञान और पारंपरिक ज्ञान का मेल जलवायु संकट से निपटने का मजबूत रास्ता बन सकता है। जहां विज्ञान भविष्य के मॉडल तैयार करता है, वहीं आदिवासी ज्ञान हजारों वर्षों के अनुभव से समाधान देता है।

भविष्य का रास्ता, जंगलों को बचाने वालों के अनुभवों से तैयार करना होगा

जलवायु संकट केवल तकनीक से हल होने वाली चुनौती नहीं है। इसके लिए प्रकृति के साथ संतुलन बनाना भी जरूरी है। आदिवासी समुदायों ने सदियों से यही संतुलन बनाए रखा है। आज जरूरत इस बात की है कि उनके ज्ञान को केवल परंपरा के रूप में न देखा जाए, बल्कि वैज्ञानिक नीति और पर्यावरण संरक्षण की रणनीतियों में सम्मान के साथ शामिल किया जाए। क्योंकि जंगलों को बचाने वाले ये समुदाय शायद दुनिया के पहले 'क्लाइमेट साइंटिस्ट' हैं, जिन्होंने किताबों से नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ रहकर विज्ञान सीखा है।

आदिवासी और जैव विविधता का रिश्ता

1: दुनिया की करीब 80% जैव विविधता उन क्षेत्रों में पाई जाती है, जहां आदिवासी और स्थानीय समुदाय रहते हैं। संयुक्त राष्ट्र (UN) के अनुसार, आदिवासी समुदायों की संख्या दुनिया की आबादी का लगभग 6% है, लेकिन प्रकृति संरक्षण में उनका योगदान बेहद बड़ा है।

2 : भारत में आदिवासी समुदायों की ताकत

  • भारत में अनुसूचित जनजाति (ST) आबादी: 10.45 करोड़ (जनगणना 2011)
  • कुल आबादी में हिस्सेदारी: 8.6%
  • भारत में मान्यता प्राप्त जनजातियां: 700 से अधिक
  • देश के कई आदिवासी क्षेत्र मध्य भारत, पूर्वोत्तर और पश्चिमी घाट जैसे जैव विविधता वाले इलाकों में स्थित हैं।

3 : जंगल और आदिवासियों के अधिकार

  • भारत में वन अधिकार कानून (Forest Rights Act), 2006 के तहत वन पर निर्भर समुदायों को व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकार दिए गए।
  • - सामुदायिक वन अधिकार (Community Forest Rights) का उद्देश्य स्थानीय लोगों को जंगल प्रबंधन में भागीदार बनाना है।

4 : पारंपरिक ज्ञान क्यों वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण?

आदिवासी समुदायों के पास सदियों से विकसित ज्ञान:

  • औषधीय पौधों की पहचान
  • स्थानीय जल संरक्षण तकनीक
  • सूखा सहने वाली फसलों के बीज
  • जंगल की आग को नियंत्रित करने के पारंपरिक तरीके
  • पेड़ों और वन्यजीवों के व्यवहार की समझ

5: जलवायु परिवर्तन का सीधा असर

  • आदिवासी समुदाय अक्सर जंगल, खेती और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर होते हैं।
  • बढ़ता तापमान, अनियमित मानसून, सूखा और जंगल की आग उनकी आजीविका पर सीधा असर डालते हैं।
  • IPCC की रिपोर्टों में भी स्थानीय और स्वदेशी ज्ञान को जलवायु अनुकूलन (Climate Adaptation) के लिए महत्वपूर्ण बताया गया है।

6: दुनिया में आदिवासी संरक्षण मॉडल

  • International Union for Conservation of Nature (IUCN) और संयुक्त राष्ट्र की कई रिपोर्टों में स्थानीय समुदायों की भागीदारी को प्रभावी संरक्षण मॉडल माना गया है।
  • कई क्षेत्रों में सामुदायिक संरक्षण वाले जंगलों में जैव विविधता बेहतर पाई गई है।

7: भारत का अनोखा उदाहरण

  • महाराष्ट्र का मेंढा-लेखा मॉडल
  • गोंड आदिवासी समुदाय ने सामुदायिक वन प्रबंधन का उदाहरण पेश किया।
  • ग्राम सभा आधारित वन प्रबंधन ने स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ाई।

'फॉरेस्ट साइंस' का नया नजरिया

पुराना नजरिया: जंगल = लकड़ी और संसाधन

नया वैज्ञानिक नजरिया: जंगल = कार्बन स्टोर + जल चक्र + जैव विविधता + स्थानीय संस्कृति

कहना होगा कि जब दुनिया जलवायु संकट का समाधान सुपर कंप्यूटर और सैटेलाइट में खोज रही है, तब जंगलों में रहने वाले आदिवासी समुदाय हजारों साल पुराने अनुभव से प्रकृति बचाने का विज्ञान बता रहे हैं।